इतिहास के झरोखे से/Dr. Ranjan Zaidi* ( 2 )

Recent Book/ History Past:  By Dr. Ranjan Zaidi      
Ancient Delhi
    
 
क़िस्सों को कभी-कभी दोहराते रहना चाहिए।)
गतांक से आगे-२ 


दिल्ली:अतीत्  से

      मुद्र-तट से 239 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह शहर अपने सीने में 3000 वर्षों से भी पूर्व के समय का इतिहास छुपाये गलियों, गलियारों और शानदार ऐतिहासिक इमारतों का गवाह बनता अरावली की पहाड़ियों को लांघता आधुनिकता की चकाचौंध में डूबता-उतराता रहा है लेकिन जिसे इतिहास में दिलचस्पी है, वह कान लगाकर अरावली की पहाड़ियों में घोड़ों के टापों की आवाज़ें साफ़तौर पर सुनते हुए बता सकता है कि इसे कोई लूटे या इसकी धरती को रक्त-रंजित करे, यह दिल्ली कभी नहीं मर सकती क्योंकि यह शह्र नहीं, अरूसुलबलाद है यानी, वह शहर जो नई दुल्हन की तरह लगे।
      कितनी दास्तानों ने हज़ारों साल का सफ़र तयकर महरौली की पथरीली चट्टानों और मक़बरों की लखौरी ईंटों से झांकती हुई आंखों ने शाहजहांनाबाद की रौनके़ें देखी हैं। आज भी उन आंखों में इब्राहीम लोदी, तैमूर लंग, नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली की तलवारों के आतंक की परछाइयां दिख जाएंगीं। दिल्ली, बर्बर हमलावरों के तीरों, तलवारों, भालों, बंदूकों और तोपों के गोलों से ज़ख्मी तो हुई लेकिन उसने अपने कालजयी ज़िरहबख़्तर को बदन से अलग नहीं होने दिया, इसीलिए वह आज भी ज़िन्दा है और तमाम रोशनियों रंगीनियांे से पूरी तरह से आबाद भी। 

      जब दिल्ली नहीं थी तब भी इस क्षेत्र में तक्षिला की सभ्यता से भी पुराना एक शहर आबाद था, योगिनी पुरा। इसका पता 1000 वर्ष ईसा पूर्व पुराने किले के निर्माण के तहत बुनियादांे की खुदाई के समय लगा जब उसके नीचे मिट्टी, चीनी-मिट्टी, लोहे, तांबे और पीतल के बर्तनों तथा कच्ची-पक्की दीवारों के मकानों वाले एक ऐसे शहर के चिन्ह बरामद हुए जो दूसरी या चौथी शताब्दी . के हो सकते थे।

      तत्कालीन पुरातत्ववेत्ताओं का एक मत यह भी था कि योगिनी पुरा पाण्डव काल के इंद्रप्रस्थ राज्य की राजधानी हस्तिनापुर भी हो सकती है लेकिन खेजबीन से पता चलता है कि यह अनुमान सही नहीं है। पुरातत्ववेत्ताओं का मत है कि इस शहर में मूलतः जैनियांे की आबादी हुआ करती थी जो तोमर-वंशीय राज्य को करों का भुगतान किया करते थे, इसलिए हस्तिनापुर की बात को सही ठहराना उचित नहीं होगा।   
      खुदाई के स्थान पर जिस किले की बुनियाद डाली गई उसका नाम लालकोट था और इसे तोमर वंश के किसी राजा ने बनवाया था। 13वीं शताब्दी में योगिनी पुरा का नाम बदलकर पहली बार देहरी या दिल्ली तोमर राजा ने ही रखा था, कारण था यहां से सेना दोआबा की ओर बढ़कर अपने राज्य की सीमाएं बढ़ा सकती थी, लेकिन कालांतर में जब तोमरवंशी राजा चौहानों से पराजित हो गये तो इसी किले का नाम बदलकर किला राय पिथौड़ा रख दिया गया और दिल्ली पर पृथ्वीराज चौहान का कब्ज़ा हो गया।
     पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल में बाहरी हमलावरांे की कमी नहीं थी। अकेले शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ौरी ने दिल्ली पर अनेक असफल आक्रमण किये। हर बार ग़ौरी पराजित होकर लौट जाता था। 1093 में उसने अपनी डेढ़ लाख सेना के साथ दिल्ली पर पुनः आक्रमण किया। आक्रमण से पूर्व लाहौर में डेरा डालकर उसने सर्व-प्रथम पृथ्वीराज चौहान को एक पत्र भेजा जिसमें उसने लिखा था, या तो हमारा आधिपत्य स्वीकार कर लो या फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। राजमहल की सात ड्येढ़ी पार कर पृथ्वीराज चौहान की प्रिय महारानी संयोगिता के समक्ष राजा के अत्यंत प्रिय दरबारी कवि चंद्रवरदाई ने सुल्तान मुहम्मद ग़ौरी के दूत को सामने ला खड़ा किया। 
      महारानी संयोगिता पत्र पढ़कर हत्प्रभ रह गईं। पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंचकर उन्होंने ग़ौरी के पत्र को पढ़कर सुनाया, कहा, ‘‘महाराज, राष्ट््र की सम्प्रभुता खतरे में है।  शत्रु मुल्तान से लाहौर तक पहुचा है। आपके शौर्य के प्रदर्शन का पुनः समय गया है। उठिये और गौरी को पराजित कर पहले की ही तरह विजयी बनिये। सेनाएं आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रही हैं...        
      पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता को अंकपाश में भर लिया, कहा,‘महारानी का आदेश सिर-आखों पर। चौहान राजवंश की महारानियां तो स्वयं नेतृत्व करती हैं, आपको तो और भी गर्व होना चाहिए कि आप पृथ्वीराज चौहान की प्रिय महारानी हैं जिसने मुहम्मद गौरी को अभी पिछले साल ही पराजित किया है। आप ग़ौरी से भयभीत क्यों हो रही हैं?’  
      महान राजाओं का कर्तव्य होता है कि वे अपनी प्रिय प्रजा की रक्षा करें। अपने पति की वीरता पर हमें गर्व है। वह एक चक्रवर्ती महाराज हैं जिनसे हम उस समय भी प्रेम करते थे, जब हमने उन्हें देखा भी नहीं था। इसी गर्व को हम चौहानों की अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहते हैं। 
      आप शायद जानती हों, जब सरहिन्द का किला फ़तह कर मुहम्मद गौरी ग़ज़नी लौट रहा था तब (1191 .) हमने उसे अपने 100 मित्र राजाओं की सेना के साथ 80 मील दूर थानेसर के निकट लौटने से रोक लिया था। वह युद्ध आप देखतीं तों आश्चर्य-चकित रह जातीं। उस युद्ध में हमारा भाई खांडे राव चौहान भी था। वह निर्णायक युद्ध था। गौरी घायल होकर भाग खड़ा हुआ था। हमारी सेना ने 40 मील तक उसका पीछा भी किया किन्तु वह हाथ नहीं सका। उसकी पराजित सेना बिखर गई। इसलिए हम उसके आक्रमण से भयभीत नहीं हो सकते। हां, उस युद्ध में खांडे राव चौहान को हमने ज़रूर खोया। इस बार हम उसका भी बदला ले लेंगे, यह राजपूत का वचन है। आप राजकवि चंद्रवरदाई को आदेश दें कि कल दरबार में मुहम्मद ग़ौरी के दूत को प्रस्तुत करें। 
   
      चाखच भरे दरबारे-खास में पृथ्वीराज चौहान ने दूत से कहा, ‘अपने सुल्तान को जाकर बता कि निरंतर पराजित होते रहने वाले आक्रमणकारी को विजयी सम्राट लिखित में उत्तर नहीं दिया करते हैं। यदि तेरा सुल्तान फिर से हमारे राज्य पर आक्रमण करना चाहता है तो इसबार उसके लिए परिणाम घातक होगे। दिल्ली उससे युद्ध करने के लिए तैयार है।          
      आदेश ने समस्त राज्य में उत्साह का वातावरण पैदा कर दिया। हर ओर नारे गूंजने लगे। युद्ध की तैयारियां शुरू होने लगीं। पास-पड़ोस के राजे-महाराजाओं से पृथ्वीराज चौहान अनुरोध करने लगा
कि दिल्ली तुर्कों के हमले से जूझने वाली है। यदि मुहम्मद गौरी विजयी हो गया तो अन्यों के लिए भी घातक सिद्ध होगा।            
      राजे, महाराजे, सामंत और आमजन के प्रतिनिधि साथ आने भी लगे लेकिन पृथ्वीराज चौहान के हाथों हुई अपनी पराजय को राजा जय चंद नहीं भुला पा रहा था। वह प्रतिशोध की आग में जल रहा था। वह चाहता था, मुहम्मद गौरी हमला करे और इस बार पृथ्वीराज चौहान मारा जाये।
      ऐसा होने पर जहां एक ओर प्रतिशोध की आग ठंडी होगी, वहीं वादे के अनुसार सुल्तान खुश होकर उसे दिल्ली की हुकूमत सौंप देगा। यह एक ऐसा अवसर होगा जब वह अपने शत्रुओं से बूंद-बूंद का हिसाब ले सकेगा। दिल्ली का सिंहासन उसका होगा।            
      इसी सपने के साथ उसने मुहम्मद गौरी को दिल्ली पर हमला करने का निमंत्रण भेजा जिसे गौरी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया लेकिन जब राजा जयचंद के पास पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी के विरुद्ध हमले में साथ देने का अनुरोध किया तो जय चंद की आंखें ईर्ष्या और क्रोध से जल उठीं।
      जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान के अनुरोध को सिरे से ही नकार दिया। वह कदापि नहीं चाहता था कि इस बार पृथ्वीराज चौहान की विजय हो। वह उससे घृणा करता था। वास्तविकता यह है कि घोर पराजय और सभागार में हुए अपमान ने राजा जय चंद को मानस-विष से भर दिया था।
      स्वयंबर से सजे सभागाार में उसकी बेटी राजकुमारी संयोगिता ने वर के रूप में आये राजपूत राजाओं, राजकुमारों और सामंतों में से किसी एक के गले में डालकर उनके स्थान पर पुष्पगुच्छ उस पीतल की मूर्ति के गले में डाल दी थी जिसे अपमानित करने के लिए राजा जयचंद ने सभागार के द्वार पर रखवा दी थी ताकि उसकी जग-हंसाई हो सके।
      जब भी कोई सभागार में प्रवेशकर पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति को देखता तो ठिठक जाता था। जयचंद आगंतुकों से उसकी मूर्ति का परिचय कराते हुए कहता, ‘यह हमारे सभागार का पृथ्वीराज दरबान है।दुर्भाग्य से संयोगिता ने अपने पिता राजा जयचंद के प्रतिशोध की आग पर पानी फेर दिया। संयोगिता वरमाला लिये प्रस्तावित वरों के गले में माला डालने के लिए बारी-बारी से सबके सामने से गुज़रती और आगे बढ़ जाती थी।
      वह एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंच गई लेकिन उसकी पसंद का वर उसके सामने नहीं आया। पीछे लौटने से पूर्व अचानक उसने द्वार पर एक नई मूर्ति देखी और उसके चरण स्वतः ही उसकी ओर आगे बढ़ने लगे।
      क्रोध की ज्वाला तब और भड़क उठी जब पृथ्वीराज चौहान ने राजा जयचंद की आंखों में धूल झोंककर संयोगिता का अपहरण कर लिया। संयोगिता मूर्ति के पास पहुंची तो राजा जयचंद अन्यनमस्क सा हो तेज़ी से उसकी ओर बढ़ा किन्तु उसके निकट पहुंचने से पूर्व ही उसने पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी। राजा जयचंद के लिए यह बहुत बड़ा आघात था।
      राजकुमारी को बंदी बना कर जेल में डाल दिया गया लेकिन इससे भी बड़ी घटना तब घटी जब पृथ्वीराज चौहान ने अपने सौ बहादुर सैनिकों के साथ जेल पर हमला कर राजकुमारी संयोगिता को मुक्त कराकर उसका अपहरण कर लिया। अब वह पृथ्वीराज चौहान की प्रिय महारानी थी।

      अंततः 1192 . में मुहम्मद ग़ौरी की सेनाओं ने जहां सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक के नेतृत्व में दिल्ली की ओर कूच किया, वहीं राजा जयचंद ने अपनी सेनाओं को फ़तह का जश्न मनाने के लिए तैयार होने के आदेश दे दिये। समय आने पर घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में शामिल संयुक्त सेनाओं के हज़ारों जवान मारे गये। जीत, मुहम्मद गौरी के पक्ष में आई और पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना लिया गया। 
     
      इब्ने बतूता अपने यात्रा-संस्मरण में क़ाज़ी-उल-क़ुज़्ज़ाक़ अल्लामा कमालुद्दीन के हवाले से लिखता है कि दिल्ली-फ़तह का सेहरा मूलतः कुतुबुद्दीन ऐबक के हिस्से में जाता है जो सुल्तान मुहम्मद ग़ौरी का टर्किश-ग़ुलाम था। छुटपन में ही उसे उसके बड़े भाइयों ने गुलामों के बाज़ार में लेजाकर बेच दिया था। गुलामी की निशानी के रूप में उसके कान में लोहे की बाली झूलती रहती थी।
      तुर्कमिनिस्तान स्थित गुलामों के बाज़ार में एक व्यापारी ने उसे खरीदा और नीशापुर के अमीर क़ाज़ी फ़ख़रुद्दीन के हाथों बेच दिया। क़ाज़ी फ़ख़रुद्दीन, मस्जिद के इमाम अबू हनीफ़ा के पुत्र थे जिन्होंने ऐबक को अपने परिवार में बच्चों की तरह रखा, उसे पढ़ाया और उसके भीतर छुपी हुई क्षमताओं को उजागर होने का पूरा अवसर प्रदान किया।    
      क़ाज़ी फ़ख़रुद्दीन के देहावसान के बाद वहीं एक दिन एक बड़े व्यापारी की उस पर नज़र पड़ी तो पारखी नज़र भांप गई कि गुलाम अमूल्य है और सौदागरों के पास अमूल्य वस्तुएं या तो मंहगे दामों पर बेचने के लिए होती हैं या किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को भेंट करने के लिए। यदि सौदागर की पहुंच बादशाह तक हो तो उससे बड़ा महत्वपूर्ण व्यक्ति और कौन हो सकता है?
      अतः उसने उस बहुमूल्य गुलाम को तत्कालीन मुद्रा 50,000 रु. मेें खरीद लिया। उसने वही गुलाम जब बादशाह को उपहार में दिया तो बादशाह देखता का देखता रह गया। तब भला कौन जानता था कि 50,000 रु. में खरीदा गया वही गुलाम एक दिन गुलाम-वंश की बुनियाद डालेगा जिसका वंश हिन्दुस्तान में 1206 से 1290 . तक राज करेगा।.…… (क्रमशः जारी/-3)
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पाठकों से- E-Book का ब्लॉग पर प्रस्तुतीकरण मेरा पहला प्रयोग है. उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। एक-एक कर मेरी सभी पुस्तकें ई-बुक फार्म में आयेंगीं। 'दिल्ली : अतीत के झरोखे से' मूलतः हिंदी की रचना है लेकिन यह अबतक कई भाषाओँ में अनूदित हो चुकी है. इस E-Book के अगले पड़ावों पर आपको दिल्ली के बारे में अनेक दिलचस्प जानकारियां पढ़ने को मिलेंगीं। जो पत्र-पत्रिकाये इसकी कड़ियाँ प्रकाशित कर रहे हैं या करने के इच्छुक हैं, उनसे अनुरोध है कि वे हमें प्रकाशन की जानकारी अवश्य दें. प्रकाशक, संपादक व पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं…।                                                                                                 

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