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मार्च, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संघ, साबिर अली को लेकर पार्टी के शीर्ष-नेतृत्व से नाराज़ था./रंजन ज़ैदी

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मुख़्तार अब्बास नक़वी   आत्म-सुरक्षा को लेकर आतंकित  मु स्लिम राजनीति की ज़मीनी हकीकत यह है कि मुख़्तार अब्बास नक़वी के पास जन-शक्ति का आभाव है. मुस्लिम समुदाय से उनका कोई भावनात्मक जुड़ाव भी नहीं है. यदि उनका नाम 'मुकुन्दी लाल चिरैयाकोटी' रख दिया जाये तो शायद लोग उन्हें पहचान भी न पाएं कि मियां मुख़्तार अब्बास नक़वी का जन्म किसी शिया मुस्लिम घराने में हुआ था. कभी बीजेपी ने उन्हें मुस्लिम कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया था जैसे सिकंदर बख्त और मास्टर नूरुद्दीन के बाद अनवर देहलवी का इस्तेमाल जनसंघ (बीजेपी) ने किया था. और बाद में उसने  आरिफ़ मुहम्मद खान का भी इस्तेमाल किया। वह अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ऐसा करते हुए किसी भी हद तक जा सकती है लेकिन अटल विहारी बाजपयी के बैकफुट पर जाते ही और बीजेपी के भीतर खतरनाक हदतक हो रहे उथल-पुथल से अब संघ पार्टी पर हावी हो चुका है और वह किसी भी स्थिति में अपनी इस राजनीतिक इकाई में उसी के दबाव पर वह मुसलमानों को  नेतृत्व देने के पक्ष में नहीं है. इसलिए उसके दबाव पर ही साबिर अली की पार्टी-सदस्यता आनन-फ़ानन में समाप्त...

मेरे सवाल, मेरी शंकाएं और संभवतः मेरे पूर्वाग्रह!./अशोक गुप्ता

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दे श के नेताओं के संज्ञान में मेरे कुछ सवाल अशोक गुप्ता:कथाकार व स्वतंत्र पत्रकार  संदर्भ : श्रीनगर कश्मीर के शंकराचार्य मंदिर का नाम बदल कर उसे शंकर च्युत किया जाना.   इ स निर्णय का मूलबिंदु कहाँ है, यानी इसका मूल प्रस्तावक कौन है?  (इतना तो स्पष्ट है कि इसमें केन्द्र सरकार  की सहमति अन्तर्निहित है.   इस निर्णय से कश्मीर या देश के अन्य भागों में बसे मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक व शेष विस्तृत समाज में उनकी हैसियत में क्या बढ़ोतरी होगी और कैसे...? (इस निर्णय पर कॉंग्रेस की भी चुप्पी है और भाजपा की ओर से हिंदुत्व के झंडाबरदार नरेंद्र मोदी की भी. )  मेरी सोच है कि कॉंग्रेस तो हमेशा से मुसलामानों को जनसंघ व भाजपा का हौआ दिखाकर अपने दामन में समेटती रही है, और उसकी ओर से मुसलामानों को मिली यह सुरक्षा ही उसकी नियामतें हैँ. (वरना, विकास, सम्मान शिक्षा और रोज़गार की दिशा में उसने मुसलामानों को पनपने देने की दिशा में  ठेंगा ही दिखाया है. यह लॉलीपॉप  देकर कॉंग्रेस की ‘चुप्पी भरी’ खुशी समझ में आती है.) नरेन्द्र मोदी, गुजरात में हुए मुसलामान...

जो है, जो नहीं है./रंजन ज़ैदी

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व्यंग्य       रा जनितिक 'स्पेस' के 'अल्फ़ा' में बैठा ६५ या ७५ वर्ष का बूढा राजनीतिज्ञ राजनीति के 'इवेंट- होराइज़न' में देश के 'जेनविन-यूथ' को ब्लैक-होल की तरह निगल जाने की तैयारी कर रहा है.       बहुत कम लोग जानते होंगे कि इवेंट-होराइज़न से निकलने वाला सघन-ताप ही न दिखाई देने वाले असंख्य धब्बेदार 'ब्लैक-होल' को जन्म देता है. ऐसे 'इवेंट होराइज़न' अपने समीप से गुजरने वाले किसी भी चमकदार तारे को साबुत नहीं जाने देते, उसे अपने   ताप से कणों में बदलकर बिखेर देते हैं.       १७८३ में वैज्ञानिक 'जॉन मिशल' अगर साहित्यकार बन जाता तो उसकी थ्यूरी का मुहावरा होता कि घनेरे वृक्ष के नीचे घास नहीं उगा करती। पोलिटिकल इलेक्ट्रान डी-जेनरेट करने वाले एलके अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की पीड़ा को अपने समय के वैज्ञानिक सुब्रमनियम चन्द्र शेखर समझ सकते थे क्योंकि उनके अस्तित्व को भी तो उनके समकालीनों ने मान्यता नहीं दी थी.       राजनीति-विज्ञानं के विशेषज्ञ जानते होंगे कि राजनीति में 'पोलिटिकल न्यूट...