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जनवरी, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सलाम है विशाल भरद्वाज को /रंजन ज़ैदी

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सलाम है विशाल भरद्वाज को /रंजन ज़ैदी बा त श्रीनगर स्थित होटल सेतूर की है . वहां के सभी जगह टीवी स्क्रीन पर श्रेया घोषाल का गाया गीत बज रहा था जिसे मैंने लिखा था ,' अब हमको आगे बढ़ना है , अपना इतिहास बदलना है .' लाबी में एक प्रकाश्य बुकलेट पर बहस चल रही थी   कि मैंने उस नेता को हाइलाइट क्यों नहीं किया जो सोनिया गांधी की होने वाली रैली में हज़ारों की भीड़ जुटाने वाला है . खुद नेता जी भी मुझे धमका रहे थे लेकिन मैं उन्हें कन्विंस कर रहा था कि मेरा काम सोनिया जी के होने वाले भाषण को हाइलाइट करना है न कि उस नेता को .           बात बढ़ी तो मैं वहां से उठकर रेडिओ श्रीनगर के उस अधिकारी के पास चला गया जो होने वाले कार्यक्रम के सम्बन्ध में तफ्सील से जानकारी जुटाना चाहता था . वहीँ मुझे लोगों की ज़बानी   ' दरद पुरा ' गाँव की तस्वीर सामने आई जहाँ ( बताया गाया कि ) सिर्फ गुर्जर मुस्लिम विधवाएं रहती है...

शान्ति भूषण के वक्तव्य की पीड़ा/ -डॉ. रंजन ज़ैदी

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शान्ति भूषण के वक्तव्य  की पीड़ा     शा न्ति भूषण जी पुराने समाजवादियों में से हैं. प्रोफेशनल अधिवक्ता. ईमानदार लोगों में डूबता सितारा. डूबता इसलिए कि जिसने 'आम आदमी पार्टी' को जन्म दिया उसी में उसकी उपेक्षा कर दी गई.   अंतिम दिनों में गांधी जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.   शान्ति भूषण जी जब कुछ कहते हैं तो उसके माने होते हैं. किरण बेदी के बारे में उन्होंने जो कुछ कहा, उनके भीतर रुकी हुई वह सच्चाई थी जिसे आज के सन्दर्भ में मैं भी पसंद करता हूँ. शान्ति भूषण जी के वक्तव्य को उनके मन की पीड़ा कह सकते हैं.               किरण बेदी को मैंने तब जाना जब मैंने राही मासूम रज़ा के उपन्यासों पर शोध करना शुरू किया. मालूम हुआ कि उनपर पहला एम.फिल किरण बेदी का है. यानि अवचेतन में आगे बढ़ने की जिजीविषा. जब मैं समाज कल्याण बोर्ड में संपादक था तो अनेक कार्यक्रमों में वह आती थीं. बहुत जुझारू महिला लगीं थीं. उनके भाषणों से लगता था, कोई भीतर आग उन्हें भड़का रही है. ये एक तरह का जूनून होता है जो अब राजनीति में विस्फुटित होना चा...