अपने ही हम रकीब हैं, अपने हबीब हैं./---रंजन ज़ैदी
'चिड़ियों ने अपने-अपने ठिकाने बदल दिए, बुलबुल की है खबर के शिकारी क़रीब हैं. शेर पढ़कर 'डॉ.एहसान रज़ा' ने पूरी ग़ज़ल पढ़ने का इज़हार किया था. 'डॉ.एहसान रज़ा' मेरे अज़ीज़ दोस्त हैं, सऊदी अरब में रहते हैं और शाइर भी हैं . उनकी फ़रमाइश पर ग़ज़ल के चंद अशआर पेशे-ख़िदमत है. पसंद आऐं तो दाद चाहूँगा। इसे साहिबे-अदब मेरी वेबसाईट पर भी देख सकते हैं. 'http://dayar-e-urdu.com' पर भी. अपने ही हम रकीब हैं, अपने हबीब हैं. ...