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व्यंग्य-(Short Story) : बकरा.कॉम/ --रंजन ज़ैदी

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कुर्बान अली को मां ने पाला था. व्यंग्य: बकरा.कॉम  --रंजन ज़ैदी  --रंजन ज़ैदी      (बक़रीद के अवसर पर विशेष)   ध र्म भी कभी-कभी कैसे संकटों में घसीट लेता है.      बकरे को मां ने पाला था, कुरबानी की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी। बकरे को मां 'ललतू'  कहकर पुकारती थीं, मैं इसे ग़लत मानता था. व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति का उपहास उड़ाना मुझे पसंद नहीं था। शायद इसीलिए.       पापा साब की सोच भी मेरी ही जैसी थी. सोच के मामले में वह कमाल के आदमी थे। पेशे से साधारण दर्जे के पेंटर थे लेकिन उनकी पेंटिंग्स और रंगों से मां बहुत परेशान रहा करती थीं। जब भी 'कुरबानजी,' पापा साब के स्टूडियो से बाहर निकलते, सारा घर हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता था। कुरबानजी भी सर्कस के किसी जोकर से कम नहीं लगते थे। पता नहीं रंगों की महक का नशा वह कैसे एंज्वॉय करते थे कि इधर पापासाब ने स्टूडियो में कदम रखा, उधर पीछे से कुरबानजी दन से दरवाज़े को धकियाकर अन्दर जा पहुंचते।        एक दिन तो पापासाब ने मां को चिढ़ाने क...

'आगमन' का विशेषांक अब बाजार में है.

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गीतकार गोपालदास नीरज  के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता  आगमन। सफलता सरोज  का कौशल था कि अँधेरे को धरा पर रुकने नहीं दिया। प्रस्तुत अंक महाकवि गीतकार गोपालदास नीरज के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालता है जिन्हें अभी हाल में कानपुर स्थिति डीएवी कॉलेज के सभागार में छात्रों ने सम्मानित किया था. सफलता सरोज ने इसी कालेज से पीएचडी की उपाधि ली थी.   आगमन के   विशेषांक की वह संपादिका हैं. इस अंक में  खुद नीरज ने अपने जीवन के कई पोशीदः राज़ों पर से परदे उठाये  हैं. 'सूंघने पर पुष्प भी कब अर्चना के काम आया....' 'आदमी हूँ, आदमी के काम आता हूँ.' शेर जंग गर्ग ने कहा, यह तार सप्तक के बाद का करिश्मा था कि गीत-काव्य के आसपास  (1941 में)   नीरज कवि का उदय हुआ. जिसने, कुंअर बेचैन के शब्दों में न घमंड का सहारा लिया न किसी तरह के गुमान का ताप, वह तो भारतीय संस्कृति की पावन सुगंध को सुवासित करता हुआ समाज को आंदोलित करता रहा. उन्हीं के शब्दों में नीरज के काव्य लेखन की एक  विस्तृत काल-अवधि है जिसमें उन...