व्यंग्य-(Short Story) : बकरा.कॉम/ --रंजन ज़ैदी
कुर्बान अली को मां ने पाला था. व्यंग्य: बकरा.कॉम --रंजन ज़ैदी --रंजन ज़ैदी (बक़रीद के अवसर पर विशेष) ध र्म भी कभी-कभी कैसे संकटों में घसीट लेता है. बकरे को मां ने पाला था, कुरबानी की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी। बकरे को मां 'ललतू' कहकर पुकारती थीं, मैं इसे ग़लत मानता था. व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति का उपहास उड़ाना मुझे पसंद नहीं था। शायद इसीलिए. पापा साब की सोच भी मेरी ही जैसी थी. सोच के मामले में वह कमाल के आदमी थे। पेशे से साधारण दर्जे के पेंटर थे लेकिन उनकी पेंटिंग्स और रंगों से मां बहुत परेशान रहा करती थीं। जब भी 'कुरबानजी,' पापा साब के स्टूडियो से बाहर निकलते, सारा घर हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता था। कुरबानजी भी सर्कस के किसी जोकर से कम नहीं लगते थे। पता नहीं रंगों की महक का नशा वह कैसे एंज्वॉय करते थे कि इधर पापासाब ने स्टूडियो में कदम रखा, उधर पीछे से कुरबानजी दन से दरवाज़े को धकियाकर अन्दर जा पहुंचते। एक दिन तो पापासाब ने मां को चिढ़ाने क...