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मुसलमानों को अब अपना विकास करना ही होगा. /डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद

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                                                                                छाया :ANI :  मुसलमानों को अब अपना विकास करना ही होगा. /डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद          आ ज के भारतीय मुस्लिम समुदाय का युवा मुसलमान अत्यंत कठिन दौर से गुज़र रहा है. उसके पास रोज़गार नहीं है. शिक्षा है तो नौकरी नहीं है. सरकारी बैंक रोज़गार के लिए न तो लोन देते हैं और न ही नौकरियां. कमज़ोर वर्ग के बच्चे झुग्गियों से निकल कर या तो कूड़ा बीनते हैं, या 'छोटू' बनकर दुकानीं, ढाबों और दुकानदारों के यहाँ नौकरियां करते है. गाँव जावर से शहरों तक पहुँचने वाले बच्चे मुस्लिम यतीम खानों या चैरिटेबिल ट्रस्टों द्वारा चलाये जा रहे बच्चो के घर जैसे मदरसों अथवा स्कूलों में तालीम हासिल करते हैं. ढेर से मदरसे मस्जिदों में चलाये जाते हैं. शिया समुदाय के लिए मनसबिया या नाज़्मीयां जैसे  असंख्य काले...

हर-हर मोदी, घर-घर मोदी..../ डॉ ज़ैदी ज़ुहैर अहमद*

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उत्तर प्रदेश  विधान-सभा के चुनाव सम्पन्न हो गए. बीजेपी ने भारी बहुमत से अपनी जीत दर्ज कराली . निश्चय ही बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह के कुशल प्रबंधन और कार्य-शैली की यह एक  अविस्मरणीय ऐतिहासिक जीत     पूर्व मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश  मानी जाएगी. यह गुजरात में किये गए प्रयोग का यथार्थ परीक्षण था जो पूरी तरह से सफल हो चुका है. यानि अब भावी चुनावों में मुस्लिम वोटों या उनके ध्रुवीकरण की ज़रुरत नहीं रहेगी. हालाँकि लीपापोती में यह कहा जा रहा है  कि उत्तर प्रदेश के 20   करोड़  मुस्लिम मतदाताओं में 10 % मत  मुस्लिम (महिला) मतदाताओं के हो सकते हैं. यानि, उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं में भी बीजेपी को महिलाओं का ही समर्थ तीन तलाक़ के मुद्दे को उठाने के कारण ही मिला है जबकि सच्चाई यह नहीं बताई जा रही है कि यह मुद्दा आम मुसलमानों से किसी भी कोण से जुड़ा हुआ नहीं  है   , यह तो वोट के ध्रुवीकरण के तरकश से निकाला गया बीजेपी का तीर था जिसने कहीं तक...

8 March! बेटियां, ज़मीन की शायरी की तरह हैं./

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8 March! बेटियां, ज़मीन की शायरी की तरह हैं. उगती हैं तो फूल और फलों की शक्ल में ग़ज़लें और गीत देती हैं, मिटती हैं तो मर्सिया बनकर. उगती हैं तो छतनार दरख़्त बनकर, जहाँ चिड़ियाँ अपने आशियाने बनाती हैं, कोयल के सुर में बुलबुल नग़मे गाती है.  अगर ज़िन्दगी से शायरी निकाल दी जाये, ज़मीन बंजर बन जाती है. इसीलिए हमारे वजूद का हर शेर, फ़िराक़ की रुबाई जैसा है, जिसमें उमर ख़य्याम भी है, मिल्टन की पैराडाइज़.... भी. तुलसी का सोशल-स्ट्रक्चर है तो पद्मावत की खूबसूरत उपमाओं का हुस्न भी. इसीलिए हमारे मुल्क की ज़मीन मंदिरों, मस्जिदों-मज़ारों की खानकाहों, मैं महिलाओं, बच्चों और बच्चियों को मुबारकबाद देता हूँ. गुरुद्वारों की अरदासों के लोबानो और अगर की खुशबुओं का गहवारा है, जहाँ के माहौल में शंखों और अज़ानों का शोर शिवालों के घंटों का निनाद गूंजता हुआ नृत्य करती देवदासियों के पैरों में बिंधे घुंघरुओं की गूँज माहौल में बिखरी रहती है.... अंतरराष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण के इस पावन पर्व पर मैं दुनिया की तमाम महिलाओं, बच्चों और बच्चियों को मुबारकबाद देता हूँ. जय भारत. डॉ. ज़ैदी ज़ुहैर अहमद,(alias रंजन ज़ैदी); कथा...

Life of an assistant director: From spending time with Bachchan to slogging daily/byKeyur Seta

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From : https://i2.cinestaan.com Ashish Desai shares some interesting aspects of his career so far as an assistant director.  career so far as an assistant director. When we see a film, we see a number of actors on the screen. But a film involves painstaking efforts by more than 200 people. Among these, assistant directors are the unsung heroes. They end up slogging rigorously for little or no credit. https:// Cinestaan.com got talking to assistant director (AD) Ashish Desai  to find out more about the life of an AD and his experience with biggies like Amitabh Bachchan and Anil Kapoor. Excerpts: When did you decide to venture into films? Firstly, I would like to thank Cinestaan for interviewing me. I have seen people like film directors, actors, producers, music directors, art directors, costume designers etc getting interviewed. But to get interviewed as an assistant director, I feel humbled and privileged. Right from my childhood, I have b...