हर-हर मोदी, घर-घर मोदी..../ डॉ ज़ैदी ज़ुहैर अहमद*

उत्तर प्रदेश  विधान-सभा के चुनाव सम्पन्न हो गए. बीजेपी ने भारी बहुमत से अपनी जीत दर्ज कराली . निश्चय ही बीजेपी के वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह के कुशल प्रबंधन और कार्य-शैली की यह एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक जीत  
पूर्व मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश 
मानी जाएगी. यह गुजरात में किये गए प्रयोग का यथार्थ परीक्षण था जो पूरी तरह से सफल हो चुका है. यानि अब भावी चुनावों में मुस्लिम वोटों या उनके ध्रुवीकरण की ज़रुरत नहीं रहेगी. हालाँकि लीपापोती में यह कहा जा रहा है  कि उत्तर प्रदेश के 20 
 करोड़ मुस्लिम मतदाताओं में 10 % मत मुस्लिम (महिला) मतदाताओं के हो सकते हैं. यानि, उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं में भी बीजेपी को महिलाओं का ही समर्थ तीन तलाक़ के मुद्दे को उठाने के कारण ही मिला है जबकि सच्चाई यह नहीं बताई जा रही है कि यह मुद्दा आम मुसलमानों से किसी भी कोण से जुड़ा हुआ नहीं है , यह तो वोट के ध्रुवीकरण के तरकश से निकाला गया बीजेपी का तीर था जिसने कहीं तक निशाने पर वार तो नहीं किया, हाँ, वोटों के ध्रुवीकरण के खालीपन को अवश्य भरने का काम किया जबकि ऐसा न करने पर भी इस बार बड़ी तादाद में मुस्लिम वोट बीजेपी को ही मिलने वाले थे.

      इसके कारण अनेक थे. ज़िला आजमगढ़  की एक तहसील से मुस्लिम लड़कियां आज़मगढ़ कालेज व स्कूलों में पढ़ने जाती हैं. अकसर कुछ असामाजिक तत्व उन लड़कियों का अपहरण कर बलात्कार करते हैं. लड़कियां भय और आतंक के कारण अपने घरों में ऐसी वारदातों का ज़िक्र नहीं करती हैं. वजह यह है कि खाड़ी  देशों से आने वाले पैसे से मुस्लिम बहुल क़स्बे, वहां की कोठियां और बंगले आर्थिक रूप से तो सम्पन्न हैं लेकिन बसावट में उनके मालिक वर्षों से अपने वतन में बहुत कम आते हैं. युवक पढ़ने के उद्देश्य से बड़े शहरों में जाकर बस जाते हैं.  
      एक नेशनल टीवी के जाने-माने पत्रकार ने जब इन इलाकों का दौरा किया तो पता चला कि अधिकतर पुरुष वर्षों से खाड़ी के देशों  में रहकर वहां नौकरियां करते हैं और उनकी औरतें वतन में अपने बच्चों को आला-तालीम दिलाने का काम कर रही हैं. उसी दौरान टीवी पत्रकार से एक महिला ने सुबकियां लेते हुए गुहार की कि  वह बड़े अधिकारियों के कानों तक किसी तरह से यह बात पहुंचा दे कि इस इलाके की बेटियां दबंगों के रहते सुरक्षित नहीं हैं. पुलिस और प्रशासन के कान  बहरे  हैं, प्रदेश के नेता गूंगे हो चुके हैं और गुंडों को राज्य सरकार के पुलिस-प्रशासन ने  अपनी पनाह में ले रखा है. शिकायत करने पर पुलिस उलटे शिकायतकर्ता को ही थाने में बुलाकर उनसे न केवल पैसा वसूलती है, बल्कि डरा धमकाकर वार्निंग भी देदेती है कि भविष्य में रिपोर्ट लिखाने आये तो कसाब बनाने में पुलिस को देर नहीं लगेगी. 
      डॉक्युमेंट्री व अन्य स्रोतों से प्राप्त यह जानकारी अखिलेश सरकार के समय की है. मुज़फ़्फर नगर का दंगा भी उन्हीं  दिनों की शर्मनाक घटना है.  उन्हीं दिनों मुलायम सिंह यादव का बयान भी आया था कि 'बच्चे हैं, उनसे ग़लतियाँ हो ही जाती हैं.'  मुज़फ़्फर नगर दंगों के बारे में भी जानने वाले जानते हैं कि  इसमें कौन आगे था, कौन पीछे और किसका किसको समर्थन प्राप्त हो रहा था. प्रदेश के मुसलमानों को भी इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी थी लेकिन वे मौन थे. क्योंकि वे कुछ भी करने में असमर्थ थे. 
      जानकार जानते हैं कि दंगों के दौरान मुज़फ्फर नगर के घने अंधेरों में मुस्लिम लडकियाँ  वहशियों की बाँहों में सामूहिक बलात्कार का शिकार हो रही थीं, परिवार उजड़ रहे थे, घर-दर लूटे  जा रहे थे लेकिन सैफ़ई का वारिस  और प्रदेश का तत्कालीन  मुख्यम मंत्री अपनी एमपी पत्नी के साथ एक वार्षिक आयोजन की रंगशाला में फ़िल्मी कलाकारों के डांस और गानों की प्रस्तुति के दौरान मज़े ले रहा था. कुछ दिनों बाद एक प्रेस-मीट में जब एक पत्रकार ने इसी मामले  पर एक सवाल का जवाब माँगा तो मुख्यमंत्री ने उसे ही लताड़ दिया. लोकशाही का यह भी एक अद्भुत कमाल था. नरेंद्र मोदी के शब्दों में कहें तो लोकतंत्र का एक बेहद भद्दा मज़ाक़ था. 

      उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में जब हर तरफ यादवों का जंगल नज़र आने लगा तब अन्य समुदायों की तरह मुसलमानों के दिलों में भी बेचैनी पैदा होनी शुरू हो गई. मुसलमानों का अपना विकास भी अब कहीं नज़र नहीं आ रहा था. मायावती ने भी अपने हाथियों के हौदों पर उन होनहार मुस्लिम नौजवानों को बैठने की जगह नहीं दी जो उत्तर प्रदेश का गौरव बन सकते थे. उन्होंने तो ऐसे मुस्लिम आढ़तियों और गुंडे माफियाओं को पैरों में जगह दी जो उन्हें ख़ज़ाने दे सकते थे, बागियों को हाथियों के पैरों से कुचल सकते थे. ऐसे लोगों ने अपनी क़ौम से वोट तो लिए लेकिन विकास का काम धेले भर नहीं किया.  
      अखिलेश यादव सरकार ने भी मुसलमानों के विकास के लिए कोई बड़ा काम नहीं किया. कुछ पद उर्दू अध्यापकों के भरे गए. लेकिन पुलिस-प्रशासन में मुसलमानो के लिए दरवाज़े नहीं खोले गए. . हज़ारों बेरोज़गार मुस्लमान युवा महानगरों में स्थित मल्टीनेशनल कंपनियों में कम वेतन पर नौकरियां करने पर मजबूर हो गए. मुलायम सिंह यादव की सरकार के समय बेरोज़गार युवाओं की बेचैनी को देखते हुए सिमी जैसे आतंकवादी संगठन के भय को हवा दी गई. कितने ही बेरोज़गार युवाओं को जेलों में डाल दिया गया. अखिलेश के समय ही मुज़फ्फर नगर का दंगा भड़काया गया.  दरियादिली का हाल यह कि पीड़ितों की मदद के नाम पर कुछ लाख-हज़ार रुपये देकर मामले को शांत कर दिया गया  मानों  तैयार फसल में से मुस्लिम समुदाय को भी कुछ अनाज (सीधा) दे दिया गया हो लेकिन जो अपने घरों से उजड़कर छिटक गए थे, उन्हें उनके इलाक़ों में अभी तक नहीं बसाया जा सका है.
      कभी न भरने वाला यह और हाशिम पुरा-मलियाना कांड के मुजरिमों के बेदाग़ छूट जाने के ज़ख्म
मुसलमानों को चुनाव तक याद रहे हैं.  इसलिए उनके इलाक़ों में बीजेपी ने जीत का कमल खिलाकर अवाम ने नरेंद्र मोदी को अपनी किस्मत की चाबी हवाले कर दी. यह अवाम का खामोश फैसला था जिसने मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट न देकर एक बेहतर फैसला किया था। 
      अवाम जानते हैं कि मुस्लिम-टिकट-खोलिया जीतकर हज-कमेटियों, वक़्फ़ की ज़मीन और क़ब्रिस्तान की लूट में उलझ जायेगा और मुस्लमान फिर तनोतनहा अकेला रह जायेगा. मुस्लिम युवाओं ने  आगे बढ़कर हौसला दिखाया कि उन्हें मोदी के सपनों में एक खुशहाल भारत दिखाई देता है. इसलिए उन्होंने मोदी को वोट दिए.  वे जानते हैं कि मोदी एक नए भारत का निर्माण कर रहे हैं जिसमें नेता नहीं, विकास की प्रमुखता होगी विकास की तो मुसलमानों को भी ज़रुरत है. 
*लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी है.  
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