महाभारत युद्ध नहीं, एक युग था./ रंजन ज़ैदी
भाई जनार्दन मिश्र जी !
मुझे अपनी प्रशंसा कभी अच्छी नहीं लगी. यह अतिशियोक्ति है, हज़म नहीं हुयी. कारण भी हैं.
शेरलॉक होम्स (1887) ब्रिटिश लेखक और चिकित्सक आर्थर कॉनन डॉयल का क्रिएटेड फिक्श्नाईट कैरेक्टर है। आर्थर कॉनन डॉयल के लिए शेरलॉक होम्स, उनकी जासूसी कहानियों में 'लंदन के एक गुप्तचरी करने वाले बौद्धिक व कुशल मगर काल्पनिक पात्र के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं. गूगल में भी इसे दिया गया है.
कह सकते हैं कि आर्थर कॉनन डॉयल इस काल्पनिक पात्र को इस ढंग से अपनी कहानियों में लाते रहे मानो वह आज भी जीवित हो, उसके सामने आर्थर कॉनन डॉयल यानि मूल लेखक दूसरी पंक्ति का कोई जासूस महसूस होने लगता है. मुझे भी इस पात्र ने शुरुआतों दिनों में काफी प्रभावित किया था.
अपने शुरुआती दिनों में ही मैं आर्थर कॉनन डॉयल के उपन्यास या कहानियां, और वरिष्ठ उर्दू कहानीकर इब्ने सफ़ी को जितना पढ़ सकता था, पढ़ा. ये दोनों महान लेखक अपने समय के प्रतीक रहे हैं. मेरठ प्रवासकाल के दौरान प्रसिद्ध वरिष्ठ जासूसी लेखक ॐ प्रकाश शर्मा से जब घनिष्ठ सम्बन्ध बने और उनके जीवन पर मुझे एक लेख लिखने का अवसर मिला (जो संग्रह में सम्मिलित है) तो मैंने जनप्रिय लेखक ॐ प्रकाश शर्मा को भी गहराई से पढा. वह भी बहुचर्चित उपन्यासकार थे लेकिन तब मैंने महसूस किया कि उनका जगन या जगत भी शेरलॉक होम्स ही हैं, या इब्ने सफ़ी के भारतीय जासूस विनोद-हमीद, इमरान और क़ासिम.
उन दिनों के दोस्तों में मेरा दोस्त परशुराम शर्मा भी था. वह भी जासूसी लेखक था. मदन सेन जैन हमलोगों का प्रकाशक था. एक शाम मैंने ओमप्रकाश जी (व्यक्तिगत रूप से मैं उन्हें पापा जी कहा करता था) से सूरजकुंड की अनौपचारिक बैठक के दौरान कहा कि हिंदी के लेखकों का बैकग्राउंड अंग्रेजी साहित्य से दूरियाँ बनाये रखता है इसलिए सुरेंद्र मोहन पाठक अंग्रेजी के पात्रों से फायदा उठा लेता है.
शर्मा जी अपनी इस कमज़ोरी से परिचित थे
पापा जी दिल्ली क्लॉथ मिल में नौकरी करते थे. पढाई का बैकग्राउंड भी नहीं था. जनवादी लेखक बने तो चल गए. अब वह देवकीनंदन खत्री तो थे, जिस स्तर के थे, वही जन-साहित्य को रचते रहे. जो अनुभव था उसे विकसित किया, उसी में से जगन और जगत पैदा हुए. पापा जी को अपार लोकप्रियता भी मिली. किन्तु जगत-जगन शरलॉक होम्स नहीं बन पाया. यह बात और है कि आज भी वे विदेशी प्रति- छायाएँ दुनियाभर के पाठकों के बीच पहले की ही तरह लोकप्रिय हैं. उन दिनों के दोस्तों में मेरा दोस्त परशुराम शर्मा भी था. वह भी जासूसी लेखक था. मदन सेन जैन हमलोगों का प्रकाशक था. एक शाम मैंने ओमप्रकाश जी (व्यक्तिगत रूप से मैं उन्हें पापा जी कहा करता था) से सूरजकुंड की अनौपचारिक बैठक के दौरान कहा कि हिंदी के लेखकों का बैकग्राउंड अंग्रेजी साहित्य से छिटका हुआ है इसलिए सुरेंद्र मोहन पाठक अंग्रेजी से फायदा उठा लेता है, पापा जी जड़ों से जुड़े हैं तो उनका जगन जेम्सबांड या हमीद या शरलॉक होम्स नहीं बन पाता. आज भी वे विदेशी जासूस चोरी हो जाने के बाद भी अपने पाठकों के बीच पहले की ही तरह लोकप्रिय हैं.
मैं डॉ॰ जॉन एच. वाटसन जैसा कभी नहीं रहा. 'द मुस्ग्रेव रिचुअल' और 'द अडवेंचर ऑफ़ ग्लोरिया स्कॉट जैसी कहानियां भी मैंने न कभी सुनीं, न किसी को कभी सुनाईं. उसका क़िस्सा तो बिलकुल अलग है.
हमारे ज़माने में बौद्धिक लोग समुच पढ़ने, तर्कों से पराजित कर देने के बहुत शौक़ीन हुआ करते थे. महिलाएं बहुत पढ़ती थीं. एक एक दिन में 5 -5 उपन्यास पढ़ लेती थीं. साहित्य में भी महिलाओं की बहुत रुचि रही है. समय पहले जैसा अब नहीं रहा है. महिलाएं भी अब बहुत व्यस्त रहने लगी हैं. (वे लिखने की शौक़ीन तो हैं, कनाडा में तो मानो कविता और कहानियों की बारिश होती रहती है. भले ही कोई न पढ़े. कोई तर्क न करे, पर पुस्तक का लेखन भी गति पकड़े हुए है.
अब मैं अपने मुद्दे पर आता हूँ
पहली बार मैं मैत्रेयी कॉलेज के एक कार्यक्रम में गया तो डॉ. शशि शर्मा ने वहां वरिष्ठ साहित्यकार केवल सूद से मेरा परिचय कराया. वरिष्ठ कवि लक्ष्मी शंकर वाजपेयी भी निर्णायक मंडल के सदस्यों में थे.
केवल सूद मेरे पास ही बैठे थे. उनकी ओर मेरा ध्यान तब गया जब अंग्रेजी साहित्य की एक प्रतिभाशाली छात्रा ने केवल सूद से वाद-संवाद कार्यक्रम के दौरान पहला सवाल किया,
'हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति जानता है कि महाभारत युद्ध नहीं, एक युग था. उसका एकलव्य आज भी हमारी छाती की नसों को दर्द देने के उद्देश्य से खीचता है. महर्षि वेदव्यास आज भी इंसाफ की प्रणाली पर एक सवालिया निशान की तरह मौजूद हैं. अदालतों में आज भी वेदव्यास के इंसाफ हमें पीड़ा पहुंचा रहे हैं. आप क्या कहना चाहेँगे?'
मैंने चौंककर पहली बार केवल सूद को नज़र भर कर देखा. मैं उनसे पहले कभी नहीं मिला था हालाँकि मैं उनके साहित्य से अपरचित नहीं था. (-/2 जारी.......) https://alpst-poltics.blogspot.com/2021/05/blog-post.html
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