कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई/ज़फर नक़वी
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वे भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बटवारा किया, वह अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्त बनने और दिखाने की जो तात्लिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है। यह बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट अंतिम पड़ाव होने की वजह से प्रतिक्रियाएं अभी उन्माद में परिवर्तित नहीं हुई हैं लेकिन उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव नज़दीक आते-आते इनके उन्मादी होने की प्रबल संभावनाएं नज़र आ रही हैं। भले ही राजनीति की बिसात पर यह प्रयास चारों खाने चित हो जाएं। कुल मिलाकर यही सार निकला है कि अयोध्य...