अहमद बुखारी प्रकरण/रंजन जैदी

अहमद बुखारी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. ऐसा व्यवहार उनके नेतृत्व की अपरिपक्वता को दर्शाता  है. मरहूम शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी भी उनके इस उग्र स्वभाव से खुश नहीं थे. इसकी स्वीकारोक्ति उन्होंने अपने एक इंटरव्यू के दौरान मुझसे कही भी थी. तब मैं पोलिटिकल जर्नल खुशबू (हिंदी) में विशेष संवाददाता था. यह वह ज़माना था जब अहमदाबाद में साम्प्रदायिक दंगे हो चुके थे और मुझे राहुल (विज्ञापन प्रबंधक खुशबू) के साथ अहमदाबाद जाना था. क्योंकि खुशबू का राजीव गाँधी विशेषांक निकलने वाला था. उन दिनों गुजरात में कांग्रेस के मुख्यमंत्री चौधरी अमर सिंह की सरकार थी और श्री  एके दुग्गल  होम सेक्रेटरी थे.  दिल्ली प्रवास के दौरान चौधरी अमर सिंह और  मंत्री विट्ठल भाई पटेल मुझे गुजरात आने का निमंत्रण दे चुके थे.यह प्रकरण मैं यहाँ इस लिये दे रहा हूँ कि मुझे ऐसे हालात में अपने कार्यक्रम को इस लिये आगे बढ़ाना पड़ा था कि जामा मस्जिद में उन दिनों ताला डाल दिया गया था. वहां नमाज़ें बंद थीं. अधीर तिवारी खुशबू के कार्यकारी संपादक थे. उन्होंने तब मुझे बताया कि स्थिति  नाज़ुक मोड़ ले चुकी है, मैं तत्कालीन शाही इमाम से मिलकर पता करूं कि ताला कब खुलेगा? मुझे पता था कि उन दिनों शाही इमाम श्री अब्दुल्ला बुखारी और नायब इमाम श्री अहमद बुखारी के बीच मदभेद चल रहे हैं. अहमद बुखारी उन दिनों जामा मस्जिद  के इकबाल अंडा मार्केट में रहा करते थे. समय लेकर मैं अपने एक टाईम्स अफ इण्डिया के पत्रकार मित्र के साथ अहमद बुखारी के निवास प़र पहुंचा. जहाँ मेरी उनसे ढाई घंटे तक बातचीत हुई.  मेरे पास अथेंटिक सूचना थी कि यदिआने वाले जुमे को मस्जिद का ताला नहीं खुला तो दोनों पिता-पुत्र की गिरफ़्तारी हो जायगी और तत्कालीन सरकार जबरन मस्जिद का ताला खोल देगी. उस दिन रात १२ बजे तत्कालीन राज्यपाल के साथ शाही इमाम की बैठक होनी थी और उसी में यह मसला तय किया जाना था. मेरी मीटिंग से यह लाभ हुआ कि अहमद बुखारी अपने पिता से मतभेद ख़त्म करने को राज़ी हो गए और मामला परवान चढ़ गया. अगले दिन १२-०१ बजे अहमद बुखारी का मेरे पास फोन आया कि 'मस्जिद का ताला खोल दिया गया है., तब मैंने उन्हें मुबारकबाद दी थी. इस प्रकरण में अहमद बुखारी की समझदारी साफ़ झलकती है. अब वह शाही इमाम हैं. उनमें उग्र-स्वभाव अभी भी है लेकिन अब उनके इर्द-गिर्द न तो शाही इमाम जैसे परिपक्व और अनुभवी पिता हैं और न ही अच्छे हितैषी और योग्य सलाहकार. समुदाय के नेतृत्व में सहनशीलता, परिपक्वता, विषयिक अध्ययन, अनुभव और फैसले लेने की क्षमता होनी ज़रूरी होती है. मीडिया से जुड़ा हुआ पत्रकार छोटा हो या बड़ा, उसके पास भी आत्म-सम्मान का उत्स होता है. वह भी चाहता है कि लोग उसकी इज्ज़त करें. उसकी इज्ज़त करना ज़रूरी भी है. वह हमारे समाज  के चौथे खम्भे  के सुतून का हिस्सा है. उसके द्वारा पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देने ज़रूरी है. जवाब न देना भी कभी-कभी मुसीबतों को बुलावा देने के बराबर सिद्ध हो जाता है. कभी-कभी मीडिया की उपेक्षा महंगी भी पड़ जाती है. अहमद बुखारी शाही मस्जिद के इमाम हैं, देश के २० करोड़ मुसलमानों और इस्लाम धर्म के प्रवक्ता नहीं हैं. जो लोग इसे इस्लाम और मुसलमानों से जोड़ कर उलाबे-कुलाबे मार रहे हैं, वे नहीं जानते कि अब्दुल्ला बुखारी गलती कर सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि वह उतने बुरे नहीं हैं, जितने उन्हें प्रचारित किया जाता रहा  है. उनकी उन सभी नादानियों की मैं घोर निंदा करता हूँ जो वह अपने कथित अयोग्य सलाहकारों के उकसाने प़र करते रहे हैं, जिनके काकस में वह घिरे हुए हैं. याद रहे, जब राजा के इर्द-गिर्द अत्यधिक विश्वसनीय सलाहकारों का कोकस मज़बूत घेराडाल दे,  तो समझ लेना चाहिए कि उसी कोकस के उसके विश्वसनीय सलाहकार अपने राजा को बेखबर पाकर उसकी हत्या करने जा रहे हैं.यही सत्ता की राजनीति है. जो अक्लमंद होते हैं, वे हवा के रुख को पहचान लेते है. अहमद बुखारी की समझदारी इसी में है कि वह उर्दू के पत्रकार अब्दुल वाहिद चिश्ती से बिना समय गंवाय माफ़ी मांग लें, अन्यथा यह प्रकरण आने वाले दिनों में तूल पकड़ लेगा और लाभ उठाने वाले लाभ उठाने से बाज़ नहीं आयेंगे. मरहूम  अब्दुला बुखारी साहब अगर जिंदा होते तो शायद वह भी यही राय देते. बड़े दरख़्त की कमज़ोर शाख को पकड़कर अगर कोई मनचला लटक भी जाय तो उससे पेड़ हिलने ज़रूर लगता है, लेकिन गिरता नहीं है.  यह बात अहमद बुखारी को सझनी ज़रूरी है.   

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