मस्जिद की लड़ाई हार भी गए तो सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएंगे'
Thursday, September 30, 2010
अयोध्या. राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे बुजुर्ग मुद्दई मोहम्मद हाशिम अंसारी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष लखनऊ पीठ के आने वाले ऐतिहासिक फैसले से कुछ घंटे पहले कहा कि इस मसले पर चाहे जो भी निर्णय आए, वह उच्चतम न्यायालय नहीं जाएंगे।
इस मसले को लेकर हो रही राजनीति गहमागहमी से दुखी करीब ९0 वर्षीय श्री अंसारी ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करेंगे लेकिन यदि फैसला उनके खिलाफ आता है तो भी वह उच्चतम न्यायालय नहीं जाएंगे।
श्री अंसारी ने कहा कि इस विवाद से देश को काफी नुकसान हो चुका है। वह चाहते हैं कि अब इस विवाद का समापन हो और अयोध्या देश के विकास में भागीदार बने। अयोध्या के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाबलों की तैनाती से वह आहत दिखे और इसके लिए उन्होंने एक हद तक मीडिया को भी जिम्मेदार ठहराया।
बाबरी मस्जिद की लड़ाई के सबसे बड़े योद्धा की बात की जाए तो उसमें सबसे ऊपर 90 साल के बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी का नाम आता है। अंसारी पिछले साठ साल से बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहे हैं लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी है देश की शांति और अम्न। अंसारी भले ही बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहे हों लेकिन स्थानीय हिंदू साधु-संत हों या फिर राम मंदिर की लड़ाई लड़ रहे निर्मोही अखाड़े के संत, उनकी सभी से दोस्ती रही है. इधर आज शुक्रवार, एक अक्टूबर को Aपक (ALPS-POLITICS.COM) के प्रतिनिधि से बात करते हुए शिया प्वाईंट के अध्यक्ष श्री ज़हीर जैदी ने सम्भावना व्यक्त की कि शायद वख्फ़ बोर्ड उच्चतम न्यायालय न जाये. किन्तु ये उसी शर्त पर संभव होगा जब प्रतिवादी पक्ष लिखित रूप में उच्चतम न्यायलय के समक्ष गारंटी दे कि वह भविष्य में अब किसी भी मस्जिद को लेकर देश को आन्दोलन, हिंसा और साम्प्रदायिक राजनीति का शिकार नहीं बनने देगा. श्री ज़हीर का मानना है कि अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला एक साफ़-सुलझे हुए सेकुलर न्यायविदों की सोच का नतीजा है जिनपर राजनीतिक दबाओं का कहीं कोई संकेत दिखाई नहीं देता है. उन्होंने APC को बताया कि अब लडाई के मुद्दे दूसरे होंगे जिनका सम्बन्ध अशोक सिंघल, मंदिर न्यास और उन लोगों से होगा जो इस मुद्दे को हवा देकर न केवल अपनी रोटी सेकते रहे हैं बल्कि करोणों का चंदा भी एकत्र कर चुके हैं.
अयोध्या. राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे बुजुर्ग मुद्दई मोहम्मद हाशिम अंसारी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष लखनऊ पीठ के आने वाले ऐतिहासिक फैसले से कुछ घंटे पहले कहा कि इस मसले पर चाहे जो भी निर्णय आए, वह उच्चतम न्यायालय नहीं जाएंगे।
इस मसले को लेकर हो रही राजनीति गहमागहमी से दुखी करीब ९0 वर्षीय श्री अंसारी ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करेंगे लेकिन यदि फैसला उनके खिलाफ आता है तो भी वह उच्चतम न्यायालय नहीं जाएंगे।
श्री अंसारी ने कहा कि इस विवाद से देश को काफी नुकसान हो चुका है। वह चाहते हैं कि अब इस विवाद का समापन हो और अयोध्या देश के विकास में भागीदार बने। अयोध्या के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाबलों की तैनाती से वह आहत दिखे और इसके लिए उन्होंने एक हद तक मीडिया को भी जिम्मेदार ठहराया।
बाबरी मस्जिद की लड़ाई के सबसे बड़े योद्धा की बात की जाए तो उसमें सबसे ऊपर 90 साल के बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी का नाम आता है। अंसारी पिछले साठ साल से बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहे हैं लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी है देश की शांति और अम्न। अंसारी भले ही बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहे हों लेकिन स्थानीय हिंदू साधु-संत हों या फिर राम मंदिर की लड़ाई लड़ रहे निर्मोही अखाड़े के संत, उनकी सभी से दोस्ती रही है. इधर आज शुक्रवार, एक अक्टूबर को Aपक (ALPS-POLITICS.COM) के प्रतिनिधि से बात करते हुए शिया प्वाईंट के अध्यक्ष श्री ज़हीर जैदी ने सम्भावना व्यक्त की कि शायद वख्फ़ बोर्ड उच्चतम न्यायालय न जाये. किन्तु ये उसी शर्त पर संभव होगा जब प्रतिवादी पक्ष लिखित रूप में उच्चतम न्यायलय के समक्ष गारंटी दे कि वह भविष्य में अब किसी भी मस्जिद को लेकर देश को आन्दोलन, हिंसा और साम्प्रदायिक राजनीति का शिकार नहीं बनने देगा. श्री ज़हीर का मानना है कि अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला एक साफ़-सुलझे हुए सेकुलर न्यायविदों की सोच का नतीजा है जिनपर राजनीतिक दबाओं का कहीं कोई संकेत दिखाई नहीं देता है. उन्होंने APC को बताया कि अब लडाई के मुद्दे दूसरे होंगे जिनका सम्बन्ध अशोक सिंघल, मंदिर न्यास और उन लोगों से होगा जो इस मुद्दे को हवा देकर न केवल अपनी रोटी सेकते रहे हैं बल्कि करोणों का चंदा भी एकत्र कर चुके हैं.
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