मुक़द्दमे का फैसला अगया.../ रंजन जैदी

मुक़द्दमे का फैसला अगया- सदायें दो कि मुहब्बत के शंख गूंजे हैं, अजां  सुनो तो अक़ीदत से सिर झुका लेना. अयोध्या में पसरा खौफ का सन्नाटा छट गया. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और सुनहरी अध्याय आ जुड़ा. अयोध्या में बनवास से राम लौटे तो पूरे देश के मुसलमानों के होठो प़र मुस्कान थिरक उठी..यह अयोध्या वासियों के भाग्य के उदय का वह उजाला था जो अब अयोध्या मे फैलकर अपने नूर की चकाचौंध से सारी दुनिया को आश्चर्यचकित कर देगा. सरयू की गुनगुनाती हुई धाराएँ अब खुश है कि इसके पानियों में अब न तो खून से सनी हुई किरपाने धुलेंगीं, न बेकुसूर ज़ख़्मी मासूम लाशें बहाई जायेंगीं. कल इस पर एक पुल ज़रूर बनेगा, जो अयोध्या को दूसरे शहरो और हिमालय से जोड़ेगा और यह नगरी हिन्दुस्तानी सभ्यता और संस्कृति का इस देश के बाशिंदों के लिये खानए-काबा बन जायगा. राम के बनवास से पहले राजा दशरथ की अयोध्या में इस्लाम नहीं था,और न ही मुसलमान. लेकिन राम के बनवास से लौटते ही युग बदल गया, राजा दशरथ चल बसे, भाई भरत ने राम की खडाव उन्हें वापस लौटा दी, अबतक अयोध्या में कलयुग आगया था. राम आस्था से ऊपर उठ चुके थे और वह घट-घट में ऐसे समां गए कि उनके पथराये बदन की मूर्तियाँ ५-५ रूपये में बाज़ार में बिकने लगीं.अब राम को ख्याल आया कि यह युग मार्केटिंग का है, उनका नाम लेकर लोग सत्ता की कुर्सी तक पहुँच जाते हैं और उनके लाखों बेगुनाह बन्दों को जान गंवां देनी पड़ती है तो क्यों न ऐसी ही मार्केटिंग कर अयोध्या का झगड़ा ही निबटा दिया जाए.रियाया में  धोबी से लेकर कमज़ोर वर्ग की जानता दुखी है. अयोध्या में कोई विकास नहीं हो पाया है.मन्थ्राएँ आती हैं, उत्पात मचाकर हस्तिनापुर लौट जाती हैं. इससे उनकी प्रजा आतंकित हो जाती है. उन्हें अब भयमुक्त अयोध्या का राज देना होगा. ऐसा सोचते ही उन्होंने भरत, शत्रुघ्न और बाहुबली हनुमान की एक कमिटी का गठन कर आदेश दिया कि तुरंत उनके जन्मस्थली को मुक्त कराने की व्यवथा कर एक नए युग की शुरुआत करें.यह भी पता करें कि उनके नाम से जो एक ईंट और ११-११ रूपये कर-कर के करोणों का धनार्जन हुआ है, वह किसके पास है और उसका क्या हिसाब-किताब है.यह व्यवस्था करते ही भागवान राम ने  उन कारीगरों को जिन्हें रोज़गार की ज़रूरत थी, उन्हें रोज़गार देना शुरू कर दिया. राम ने यह नहीं सोचा कि उनकी खडावों का कारोबार करने वाले कारीगर मुसलमान हैं और उनके राजशाही कपड़ों को मुस्लिम दर्जी सिया करते हैं.बात सही भी थी.जब इंसान, इंसानियत की बुलंदी छू लेता है तब वह देवतुल्य हो जाता है. भगवान, अपने भक्तों में हिन्दू-मुसलमान कहाँ तलाशता है.यह एक सिम्बोलिक कोलाज़ था. वास्तविकता यह है कि अयोध्या अब नयी गंगा-जमुनी संस्कृति के केंद्र के रूप में उभरेगा. इसकी खुशबू सारी दुनिया के मुसलमान भी महसूस करेंगे. तीन जजों की अदालत द्वारा किये गए फैसले ने खौफ के पसरे हुए सन्नाटे से हिंदुस्तान के मुसलमानों को बाहर निकल लिया है और उन साम्प्रदायिक शक्तियों को मुंह के बल गिरा दिया है जो इस तरह का खौफ क्रियेट कर सत्ता के गलियारों तक पहुंचा करते थे और मज़हबी दुकानदार अपनी दुकानदारी करते थे. हो सकता है अब ऐसे साम्प्रदायिक लोग कोई नई शतरंज की बिसात बिछा रहे हों. लेकिन यह भी सच है कि राम के लौट आने तक अयोध्या काफ़ी बदल चुकी है. अब यहाँ विकास की फिजा तैयार चुकी है.  केन्द्रीय सरकार को अब इस नए युग का स्वागत कर सम्पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास की कमान अपने हाथ में लेनी hogi. हालांकि यह रास्ता अभी इतना आसान नहीं होगा, लेकिन मुश्किल भी नहीं है.क्योंकि वर्तमान केन्द्रीय सरकार मंदिर विवाद से शुरू से ही जुड़ी रही है और उसने बहुत कुछ खोया भी है. आश्चर्य की बात यह है किमंदिर-मस्जिद मुद्दे से जुड़ा हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में दण्डित हुआ है. अरुण नेहरू की शह प़र मंदिर का ताला खोला गया तो अरुण नेहरू का राजनीतिक बनवास हो गया. राजीव गाँधी अपनी सरकार के मुखिया थे और उनके कार्यकाल में ही मस्जिद का ताला खोला गया तो कालांतर में उनकी हत्या हो गयी. नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे, उनके आदेश प़र राम जन्म भूमि प़र पूजा की गयी तो तिवारी जी का बुढ़ापा बलात्कार-काण्ड का शिकार हो गया.अडवाणी जी सत्ता में आकर सत्ता से दूर हो गए और उन्हें जिन-जिन मानसिक यातनाओं से गुज़ारना पड़ा, उससे सारा देश परिचित है.भारतीय जानता पार्टी न केवल अपना आधार गँवा बैठी बल्कि वह अपने गंभीर और अनुभवी नेताओं से भी हाथ धो बैठी. फायर साधुवी अडवाणी जी से ही भिड गयीं और सत्ता भी हाथ से निकल गयी, अब वह फिर बीजेपी में लौटने की जुगत भिड़ा रही हैं. इस मुद्दे प़र शिव सेना ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया तो बालठाकरे का परिवार बिखर गया और आज शिवसेना अपने ही बैरिक में बंद होकर रह गयी है. गुजरात के मुख्य मंत्री ने गुजरात में कितना ही विकास किया हो, वह आज भी अमेरिका तक नहीं जा सकते हैं. उनकी जो छवि बन चुकी है, वह शायद ही कभी स्वच्छ हो सके. उत्तर प्रदेश के जो भी मुख्यमंत्री-संत्री मंदिर-विवाद मे बढ़-चढ़ कर आगे बढ़ा, वह जनाधार खोकर गुमनामी के अंधेरों में दफ़्न हो गया. यह अध्याय माननीय न्यायधीशों के फैसले ने बंद कर दिया है. मुस्लिम तंज़ीमें भी अबतक बेहद शर्मसार हो चुकी हैं. कुदरत हिंदुस्तान को एक ताक़तवर सेकुलर मुल्क के रूप में ज़िदा रखना चाहती है जिसमें मज़हब का कोई दखल नहीं होगा. मज़हब बंद कमरों का अहसास बन कर रह जायेगा. क्योंकि इस देश का आम आदमी हर मज़हब से मुहब्बत करता है.मुहब्बत जहां भी परवान चढ़ी, वहां वह लोकगीतों मे अमर हो गयी. चाहे हीर-रांझे की कहानी हो या ससी-पन्नो की, रोमयो-जूलियट की कहानी हो या लैला-मजनू की. ज़ालिम और ज़ुल्म की उम्रें ज्यादा नहीं होती हैं. मुहब्बत हमेशा जिंदा रहती है. अदालत का यह फैसला मुहब्बत का पैगाम है और उन नफरत का पैगाम देने वालो को नसीहत भी कि गाँधी की अहिंसात्मक सोच हमेशा विजयी रहेगी और नेहरू का लोकतंत्र इस देश में कभी नहीं मर पायेगा. अगर नेहरू ने इस देश को लोकतंत्र न दिया होता तो यह देश अबतक बिखर गया होता. पाकिस्तान हमारे सामने एक उदाहरण है जहाँ तख़्त और तख्ते का खेल चलता रहता है. वहां मुहब्बत नहीं पनप पाती है. कभी कादियनों प़र ज़ुल्म होता है तो कभी शियों का कत्ले-आम होता है. कभी कबायलियों प़र बम गिराय जाते हैं तो कभी अफगानों की बस्तियां उजाड़ दी  जाती हैं. इस देश के मुसलमानों को मान लेना चाहिए कि इस मुल्क की खुशबू का एहसास कर ही सूफीवाद की जनक राबिया बसरी ने कहा था कि हिन्दुस्तान पैगम्बरों और फ़रिश्तों की ज़मीन है. खुद कर्बला में मुहम्मद साहब (रसव) के निवासे हज़रत इमाम हुसैन ने यजीद से कहा था कि तू अगर यह चाहता ही कि मेरे अरब में रहने से तेरी हुकूमत को खतरा पैदा होता रहेगा तो तू मुझे इजाज़त दे कि हम अपने साथियों के साथ हिंदुस्तान जा सकें. लेकिन यज़ीद ने उनका क़त्ल कर दिया. तो मालूम हुआ कि हुसैन क़त्ल  तो  होते  रहेंगे  बरसों-बरस,  हुसैनियत  कभी  पामाल  हो  नहीं  सकती / हरेक  ज़ुल्म  के  पीछे  छुपा  है  एक  यज़ीद, यज़ीदियत  की कहानी  बड़ी  नहीं  होती / छुआ  नमाज़  में  खाके-शिफ़ा  तो  इल्म  हुआ, खुदा  गवाह  के  कर्बोबला  पे  क्या  गुजरी/ ये शामे-गरीबां है आओ मिल-बैठें/न जाने फिर कभी हम हों न हो के ये हिजरी / दुआ करो के हमेशा मुहब्बतें बरसें, मुहब्बतें हैं  इबादत की कीमती गठरी/ न कोई ज़ुल्म न ज़ालिम हमारे बीच रहे, ज़मीं पे अम्न  का रुतबा हो, खुश हो हर बशरी. 
         अब हिन्दुस्तान बदल रहा है और अब हमें इस बदलाव का स्वागत करना होगा. नयी नस्ल को  उस ज़हर से बचाना होगा जिसनेहमारे  जिस्मों को अबतक ज़ख्मों से भर दिया था. अब हमें एक नए देश के विकास में जुट जाना होगा,  कालांतर में फिर किसी मस्जिद और मंदिर के हादसे को नहीं दोहराना होगा. अदालत के फैसले ने फिजा ज़रूर बदली है लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि अब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का काम शुरू होते ही ज़मीन के भाव महंगे हो जायेंगे. गरीब किसानों, मजदूरों की ज़मीने भू-माफिया खौफ क्रियेट कर सस्ते दामों प़र खरीदना शरू कर देगा. बड़े-बड़े साधु-संत यहाँ पंचतारा-आश्रम बनायेंगे. .(अभी-अभी मेरे पास एक टीवी चैनल के रिपोर्टर के माध्यम से फोन प़र सूचना आई है कि स्वामी रामदेव ने अयोध्या में एक योगाश्रम खोलने की योजना बनानी शुरू कर दी है). इस प्रकार की योजनाओं की शुरुआत हो भी चुकी है. पर्यटकों और रामलला के दर्शनार्थियों के ठहरने के लिये ५,४,३,२,१ तारा होटलों, खाने के लिये रेस्तराओं और इनसे जुड़ी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये स्तरीय बाज़ार कुछ ही महीनों, सालों में अयोध्या में उग आएंगे. रेडियो, टीवी स्टेशंस और सांस्कृतिक केंद्र, हस्पताल, अंग्रेजी पब्लिक स्कूल, कालेजेज़, टेक्नीकल इन्स्टिच्युट्स, हेल्थ सेंटर्स (जिम), तथा विस्तार लेते हुए अयोध्या नगरी में  हर संवेदनशील जगह प़र स्थायी पुलिस थाने नज़र आने लगेंगे तथा केंद्र व राज्य सरकार अयोध्या का जीर्णोद्धार करने लगेंगे.विस्तार लेती अयोध्या पंचतारा सिटी तो बन जाएगी किन्तु भय इस बात का भी है कि वहां से राम की खडावें और राम लला के दर्जियों और धोबियों के पास शायद ज़मीन न रह सके.गाँधी जी ने संघर्ष किया था किन्तु जब देश आजाद हुआ तो उनकी हत्या कर दी गयी थी और सत्ता प़र दूसरे लोग काबिज़ हो गए थे. अब राम की नगरी में सदियों से रह रहे मुसलमानों को यह जान लेना चाहिए कि हज़रत रसूल (SA)  के  दामाद हज़रत अली ने एक बार कहा था कि इंसानियत की बका (हिफाज़त) के लिये अगर उनसे खाना-ए-काबा को छोड़ने के लिये कहा जायेगा तो वह उसे भी छोड़ देंगे. अगर अयोध्या का अम्न ३० मीटर का ज़मीन का टुकड़ा देकर बहाल होता है तो उन्हें हिन्दुओं को दे देना चाहिए.यह फैसला एक आवाज़ में सारे देश के मुसलमानों को करना होगा, उन मज़हबी दुकानदारों को नहीं जिनकी मज़हबी दुकानें मास्टरप्लान में आगई हैं और वह स्टे लेने के लिये उच्चन्यायालय की चौखट प़र जाना चाहते हैं. क्योंकि कोर्ट ने इसे आस्था के रूप में देखा है.यह फैसला अब एक नज़ीर बन चुका है. अब होना यह चाहिए कि...तुम्हारे राम का हो ज़िक्र मेरी मस्जिद में, मेरे खुदा की सदा आ बसे शिवालों में / न तुमको खौफ हो मस्जिद में आने-जाने प़र,  न हमको डर हो कि मंदिर है बुत्परस्तों का. इसी तरह से मुहब्बत को आओ शहद  कर लें.  सम्भावना यह भी है कि सुन्नी वख्फ़-बोर्ड के चेअरमैन ज़फर फारूकी सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर सकते हैं और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सय्यद शहाबुद्दीन प्रतिवादी-पक्ष के प्रतिनिधियों से बात करने के लिये उन्हें मना सकते हैं. यदि ऐसा होता है तो ९० दिनों की मिली मोहलत में अयोध्या गुलज़ार हो जाएगी और दोनों पक्षों के बीच संशय और संदेह की खड़ी दीवार स्वतः ही ढह जाएगी. ऐसे में कट्टरपंथी मुस्लिम जमातों और मौलवियों को ऐसे बयान देने से बचना होगा जो मुसलमानों की आम-सहमति के विरुद्ध हो.     .

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