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वे लोग जो आत्म-प्रचार से मुक्त हैं /शाह उर्फी रज़ा जैदी (https://alpst-poltics.blogspot.com/2023/03/blog-post_11.html)

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उर्दू शायर शकूर अनवर की शायरी / रंजन ज़ैदी https://alpst-poltics.blogspot.com/2023/03/blog-post.html

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शकूर अनवर, जिसके शब्द-नाद में राजस्थान के लोक-गीतों की मस्ती, उसकी सांसों में उर्दू की महक, विचारों में दार्शनिक-चिंतन और गीतों में मस्तिए-रिन्दाना की दिलकशी ऐसे फूटकर मन-मस्तिष्क पर जादू बनकर फुहारों की शक्ल में ऐसे बरसने लगती है मानो राजमहल पर चारों ओर से बर्फ़ के तोदे फूल बनकर गिर रहे हों जैसे चमेली उसे नहलाने लगी हो और उर्दू उन फूलों को चुन-चुनकर अपनी चुनरी में इकठ्ठा करने लगी हो, वह भीग गई हो और पार्श्व में अनेक राग तड़पने लगे हों.... बचाव आबरू उर्दू की लुट न जाये कहीं ग़ज़ल के जिस्म को लोगों ने बे-लिबास किया यह शेर शकूर अनवर का है. व्यक्तिगत रूप से मैं उन्हें नहीं जानता लेकिन उनका काव्य-संकलन 'शेर-दर-शेर आईना'. उन्होंने बीकानेर से मुझे यह संकलन बड़ी मुहब्बत के साथ डाक से भेजा था. दरअस्ल उनका यह तोहफ़ा मेरे लिए उनकी एक महत्वपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति का आईना जैसा ही है जिसमें मैं खुद को भी झांक कर देखते रहने का अभ्यास करने लगा हूँ. शकूर अनवर पेशे से उर्दू के अध्यापक रहे हैं. उनका मानना है कि ग़ज़ल मात्र, इश्क़-आशिक़ी, मुहब्बत के अतिरिक्त और भी बह...