वे लोग जो आत्म-प्रचार से मुक्त हैं /शाह उर्फी रज़ा जैदी (https://alpst-poltics.blogspot.com/2023/03/blog-post_11.html)

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स्वर्गीय डाक्टर सैयद आफ़ाक़ अली ज़ैदी (निवासी क़स्बा बाड़ी, जिला सीतापुर, उत्तर प्रदेश की वंश-बेल परम्परा के अंतर्गत) उनका सिलसिला ए नस्ब.....डाक्टर सैय्यद आफाक़ अली ज़ैदी के पांच पुत्र और दो बेटियां हुईं. इनमें बड़े बेटे सैयद बुरैर अहमद ज़ैदी (रिटायर्ड सब-रजिस्ट्रर, बदायूं (उ.प्र.), हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार रंजन ज़ैदी (पैतृक नाम डॉ. सय्यद ज़ुहैर अ.ज़ैदी, पूर्व संयुक्त निदेशक (मीडिया) केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली), सैय्यद मुहम्मद जाबिर ज़ैदी व तीन छोटे भाई डॉ. सैय्यद अबुज़र ज़ैदी, जयपुर,(राज.), और सैय्यद अम्मारे यासिर ज़ैदी सहित दो छोटी बहनें, सुश्री सैय्यद शमा परवीन (सेंथल),और सैय्यद शहनाज़ नसरीन, फर्रुखाबाद, यूपी) हैं. ( इन सब की जड़ों के सिरे सादात बारहा के मौज़ा कैथोडा की महमूदखानी शाख यानी सैय्यद महमूद खान इब्ने सैय्यद सालार औलिया के छातरोड़ी सिलसिले से जाकर मिलते हैं. ये सिलसिला औरंगजेब आलमगीर के अहद के मंसबदार व जागीरदार, नवाब सैय्यद परवरिश अली खान बहादुर मुखातिब ब खिताब सैयद पहाड़ ख़ान नाजिम व सूबेदार बिहार, उड़ीसा व अज़ीमाबाद (पटना) से मिलता है। नवाब परवरिश अली खान साहब का मकबरा जिला गाज़ीपुर में है। इनके बेटे नवाब सैयद मौहम्मद ख़ान 'सलावत जंग' थे जिनका 'सादाते बारहा' के मनसबदारों के रूप में नुमाया मक़ाम था । नवाब सलावत जंग के बेटे और बादशाह मुहम्मद शाह के मनसबदार दीवान सैय्यद ज़ुल्फिकार अली खान थे । अपने समय के प्रारंभिक काल में दीवान ज़ुल्फ़िकार अली खान साहब सरकार संभल के फौजदार रहे हैं। इन्हीं दीवान सैयद ज़ुल्फ़िकार अली खान साहब ने कैथोडा में गढ़ी की तामीर करवायी थी जिसमें एक दरवाजा 'बाबे फतह' के नाम से बनवाया था जो आज भी बाकी है। इसी खानदान में एक और महा-पुरुष दीवान सैयद ज़ुल्फ़िकार अली खान साहब के चचाज़ाद भाई व बहनोई नवाब सैय्यद नज़र मुहम्मद खान 'रुक्नुद्दौला' गुज़रे हैं। नवाब नज़र मुहम्मद रुकनुद्दौला मुग़ल बादशाह शाहजहां के दौर में सरकार बदायूं के नाजिम रहे हैं जिनके बेटे नवाब नुसरत यार खान थे जिनका अस्ल नाम नुसरत यार खान नहीं था, यह नाम उन्हें बतौर खिताब बादे-फतहे-जंगे 'जाजूज़न' दिया गया था और इसी नाम से ये तारीख़ में मशहूर हुए)। नवाब नुसरत यार खान सूबा अजमेर के सूबेदार होने के साथ-साथ मुग़ल दरबार में पञ्च-हज़ारी( 7000) मंसबदार रहे हैं। दीवान सैय्यद ज़ुल्फिकार खान व नुसरतयार खान रुक्नुद्दौला के दौर मे जिसमें अली मुहम्मद खान वालीये रियासते रामपुर और ऐतमातुद्दौला मुहम्मद अमीन खान वगैरह शामिल थे, जिन्होंने जानसठ के सैय्यद सैफुद्दीन खान (सैय्यद बरादरान, जानसठ) के खिलाफ 'जंगे भैसी' लड़ी थी ! दीवान सैय्यद ज़ुल्फिकार खान व नुसरत यार खान रुक्नुद्दौला जोकि दरबारे मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के आला मन्सबदार थे, उनके मरासिम सादत खान बुरहानुलमुल्क सूबेदार अवध, मीर क़मरउद्दीन खान आसफजाह सूबेदार दक्कन (दक्षिण) व मुर्शिद कुली खान सूबेदार बंगाल आदि से थे. इसी सिलसिले के चलते अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने दीवान सैय्यद ज़ुल्फिकार खान के पोते नवाब सैय्यद खैरात अली व उनके भाइयो शुजाअत अली व लताफत अली को रियासते अवध मे क़स्बा बाडी जिला सीतापुर व सुल्तान पुर में एक कसीर मवाज़आत पर मुश्तमिल एक जागीर दी । इसी खानदान में एक मशहूर-ए-ज़माना शख्सियत नवाब रौशन अली खान साहब गुज़रे हैं जो रियासत ए हैदराबाद के मंसबदार थे। इन्होंने तारीख़ की मशहूर किताब "सय्यदअल तारीख़" लिखी है। दीवान ज़ुल्फ़िकार अली खान साहब की विरासत को उनकी ज्यादातर नस्लों की हिजरत के सबब कैथोढा में नवाब सैय्यद रौशन अली खान ने संभाला । दीवान ज़ुल्फ़िकार अली खान के सिलसिले के कुछ लोग जिनको रियासत दतिया (मध्य प्रदेश) में एक जागीर मिली वहीं आबाद हो गये, इसके अलावा ढकिया नगला (बिजनौर) , रामपुर व हरियाणा मे भी इस सिलसिले के लोग आज भी आबाद हैं. दीवान ज़ुल्फ़िकार अली खान के बेटे, नवाब सैय्यद खैरात अली के बेटे सैय्यद सादिक़ अली व उनके बेटे सैय्यद हाफिज़ अली व उनके बेटे सैय्यद फरज़न्द अली व उनके बेटे अहमद अली व उनके बेटे सैय्यद आशिक़ अली, उनके बेटे डॉ. सैय्यद आफाक़ अली और उनके पुत्र (हिंदी के जाने-माने वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार डॉ. रंजन ज़ैदी) डॉ. जेड.ए. ज़ैदी यानि मेरे मामूजान ) हैं. नोट: किताब "सैयद उल तारीख़" असिस्टेंट कमिश्नर और बाद में रियायत हैदराबाद के मंसबदार, सैयद रौशन अली साहब रईस ए कैथोडा ने लिखी है जो दीवान ज़ुल्फ़िकार अली खान की नस्ल से होने के नाते हमारे ननिहाल से ताल्लुक रखते हैं। रौशन अली साहब से 1864 ई0 में मिस्टर ग्रांट ने इस किताब की मसौदे को लेकर मुज़फ्फर नगर गजेटियर के एक बड़े हिस्से को तरतीब दिया था। इसकी मूल पांडुलीपि इंडियन आफिस लाईब्रेरी, लंदन में सुरक्षित है। ___________________________________________________________ (रिपोर्ट: नवाब ग़ालिब अली तातारी ऑफ़ सैंथल 'शाह उर्फी रज़ा जैदी', द्वारा सत्यापित व ज़िला बरेली द्वारा प्रसारित)पुस्तक : 'सैय्यदुल-उल-तवारीख़', लेखक : सैय्यद रौशन अली (रईस-ए- कैथोड़ा, जिला मुज़फ्फर नगर, उत्तर प्रदेश), तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर व् रियासत हैदराबाद के मनसबदार

टिप्पणियाँ

  1. 'कृपया अपनी राय से हमें अवश्य अवगत कराएं.....' शाह उर्फी रज़ा ज़ैदी, सेंथल

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