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कांग्रेस को छलनी में बर्फ ज़माने की आदत अब छोड़ देनी चाहिए/-डॉ. रंजन ज़ैदी

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मेरी नज़र में स्मृति ईरानी एक   नेक और अच्छी महिला है लेकिन-/डॉ. रंजन ज़ैदी .         शपथ लेते समय  स्मृति ज़ुबीन ईरानी स् मृति ईरानी की तरक्की से देश नाखुश नहीं हैं. उसने अपने अस्तित्व के स्थायित्व के संघर्ष का लम्बा रास्ता तय किया है. संघर्षशील लड़कियों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। अभावग्रस्त परिवेश में आर्थिक विषमताओं और दुश्वारियों के बीच निश्चय ही वह अपनी पढाई पूरी नहीं कर पाई होगी।         मेरी नज़र में वह   एक   नेक और अच्छी महिला है. उसका महत्वकांक्षी होना भी गलत नहीं है. हाँ! उसके पास शिक्षा का होना ज़रूरी था. जो इस समय उसके पास नहीं है. शिक्षा के साथ-साथ उसके पास प्रशासकीय अनुभव भी नहीं है. यह और भी दुखद बात है.         ऐसे में स्मृति ईरानी को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय दे दिया जाना वैसे ही है जैसे ऑपरेशन थियेटर में लाकर किसी स्कूल-गर्ल से कहा जाये कि   बेटा , कर अपनी माँ के हार्ट का ऑप्रेशन। जेट विमान के कॉकपिट में बिठाकर स्काउट-गाइड लड़की स...

लकीर गांधी की तस्वीर तो बना सकती है, गांधी को नहीं पैदा कर सकती / डॉ. रंजन ज़ैदी

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दिल्ली के तख़्त पर अब किरण बेदी ---? /डॉ. रंजन ज़ैदी अयोग्य मित्रों के कारण अरविन्द केजरीवाल बहुत पीछे छूट गए हैं .   य ह सच है कि समय धूप-छाँव की तरह होता है. धूप आती है, चली जाती है. साया रहता है, लुप्त हो जाता है जिसे हम छू भी नहीं पाते हैं.        सच्चाई यह भी है कि हम दोनों स्थितयों को पकड़ भी नहीं पाते. धूप में गुनगुनाहट, गर्मी और तपिश के महसूसने का अहसास होता है. इसे हम देख भी सकते हैं, किसी भी मोटे लैंस से धूप की किरणों को समेट कर रुई या घास-फूस में आग पैदा कर सकते हैं. लेकिन साये को न हम छू पाते हैं और न ही उसकी ठंडक को सहेज पाते हैं. उससे दूसरा व्यक्ति सियाही की तरह लिपट सकता है, उसमें डूब सकता है, लेकिन परछाईं का मालिक से रिश्ता नहीं कटता.        इस रहस्य को देखकर व्यावहारिक व्यक्तियों ने इसपर मुहावरे गढ़े, कवियों ने धूप को प्रतीक बनाया. चिंतकों और विचारकों ने कहा कि समय हवा के झोंके की तरह है जो बालों की लटों को लहराता हुआ आगे गुज़र जाता है और लौटकर फिर कभी नहीं आता.     ...

तख़्त सजा है आ जाने दो/रंजन ज़ैदी

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      मे रे विचार से इस बार केंद्र में कांग्रेस की सरकार शायद ही बन पाये. भारतीय राजनीति का भी यह एक सूरज आजा पास हमारे, ढेर से ज़ख्म दिखाऊंगा। टर्निंग पॉइंट होगा। कारण यह है कि इस बार कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी जैसी नेता नही है. सोनिया गांधी कांग्रेस के लिए मात्र संयोग थीं जिन्होंने राजीव गांधी के रास्ते उनके बाद नेहरू खानदान की विरासत को सहेजे रखा जबकि न तो वह राजनेता थीं, न उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी थी. अपने बच्चों के भविष्य और नेहरू-एम्पायर को छोड़कर उस देश में भी नहीं लौट सकती थीं जहाँ का मायका इस उम्र तक पहुँचते-पहुँचते अजनबी बन चुका था। बेटियां शादी के बाद हर मुल्क में मायके के लिए पहले जैसी नहीं रह जाती हैं. उन्हें ससुराल का सुख और आतंक सहना ही पड़ता है. राजीव गांधी की हत्या के बाद  सोनिया गांधी ने वे सारी यातनाएं सहीं, शब्दों के बाण झेले, अपनों के आतंक सहे, रिश्तों की साज़िशों का मुक़ाबला किया, डार्क-रूम में फूट-फूटकर रोई कि खुदा ने उसे इतनी बड़ी सजा क्यों दी? लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कांग्रेस के इतिहास में सोनिया गांधी हमेशा इज़...