लकीर गांधी की तस्वीर तो बना सकती है, गांधी को नहीं पैदा कर सकती / डॉ. रंजन ज़ैदी

दिल्ली के तख़्त पर अब किरण बेदी---? /डॉ. रंजन ज़ैदी
अयोग्य मित्रों के कारण अरविन्द केजरीवाल बहुत पीछे छूट गए हैं. 

ह सच है कि समय धूप-छाँव की तरह होता है. धूप आती है, चली जाती है. साया रहता है, लुप्त हो जाता है जिसे हम छू भी नहीं पाते हैं. 

      सच्चाई यह भी है कि हम दोनों स्थितयों को पकड़ भी नहीं पाते. धूप में गुनगुनाहट, गर्मी और तपिश के महसूसने का अहसास होता है. इसे हम देख भी सकते हैं, किसी भी मोटे लैंस से धूप की किरणों को समेट कर रुई या घास-फूस में आग पैदा कर सकते हैं. लेकिन साये को न हम छू पाते हैं और न ही उसकी ठंडक को सहेज पाते हैं. उससे दूसरा व्यक्ति सियाही की तरह लिपट सकता है, उसमें डूब सकता है, लेकिन परछाईं का मालिक से रिश्ता नहीं कटता. 
      इस रहस्य को देखकर व्यावहारिक व्यक्तियों ने इसपर मुहावरे गढ़े, कवियों ने धूप को प्रतीक बनाया. चिंतकों और विचारकों ने कहा कि समय हवा के झोंके की तरह है जो बालों की लटों को लहराता हुआ आगे गुज़र जाता है और लौटकर फिर कभी नहीं आता. 

       समय हवा के झोंके की तरह तो हो सकता है लेकिन हवा का झोंका समय नहीं हो सकता क्योंकि उसमें शीतलता भी होती है और आंधी-तूफ़ान का स्वाभाव भी. समय की गति एकसमान रहती है जैसे शून्य में पृथ्वी की गति.सोचो, यदि यह गति तेज़ हो जाये तो हवा की रगड़ से उसकी त्वचा जल सकती है. यह अप्राकृतिक स्वाभाव होगा. 

      तो हमें मालूम हुआ कि जो स्वाभाव कृत्रिम होंगे, वे हमारे समय के अनुकूल नहीं होंगे. एक व्यक्ति अधिक खा जाता है, उसका स्वस्थ्य ख़राब हो जाता है. एक बोतल में निरंतर पानी डालते रहने से पानी छलकने लग जाता है. स्वभाव के विपरीत व्यक्ति तेज़ दौड़ता है तो हांफने लगता है, यह सब समय और स्वाभाव के अनुकूल नहीं है. फिर भी हम प्रकृति के विरुद्ध कार्यों में लिप्त रहते हैं, नहीं समझ पाते कि समय का संकेत क्या है? समय एक चलायमान स्थिति को कहते हैं जो जीवन के विभिन्न पड़ावों से हमें परिचित कराता है. जैसे बचपन का अहसास, अर्थात पराश्रय के दौरान सीखने-समझने और सबकुछ जान लेने का समय. फिर युवावस्था यानी क्रियेशन का समय. फिर ठहराव और तदुप्रांत पतन की यात्रा.
       संख्या के एतबार से देखें तो हम उम्र की सीमा को निर्धारित कर सकते हैं. जैसे टीन एज के बाद युवावस्था, फिर प्रौढ़ावस्था, तदुपरांत वृद्धावस्था. हमारा रचनाकाल युवास्था से प्रौढ़ावस्था तक ही ऊर्जावान रहता है, तदुपरांत...पलायन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. यानी ९ से २५, २० से ३५, ३५ से ४५. जिसे खुद को पूर्ण विकसित करना होता है, वह ३५, ४०, हद से हद ४५ तक कर लेता है, बाद में वह पलायन करता है. यानी जो कमाया, उसे खाता है. इसलिए मैं कहता हूँ कि समय को पहचानो. इसे बेकार मत जाने दो क्योंकि ये लौटकर नहीं आता है. इसमें मायावाद कहीं नहीं है. 


राजनीति इतिहास को जन्म देती है, उस पर दया नहीं करती।
      केजरीवाल फोबिया धीरे-धीरे दम तोड़ने लगा है. क्योंकि केजरीवाल ने समय और उपलब्ध राजनीतिक अवसर व प्रकृति के सन्देश को नहीं पहचाना कि अवाम व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे, चाहते हैं। उसके कथित मित्र यह भी नहीं समझा पाये कि कांग्रेस और बीजेपी का आलोचनात्मक-प्रोपेगंडा सुनियोजित और प्रायोजित था. वे प्रोफेशनल पॉलिटिशियन्स हैं और सीज़ंड भी. अरविन्द को समझना चाहिए था कि  स्टील के गर्डर को काटने के लिए ब्लेड नहीं बड़ी रेती की ज़रुरत होती है. लेकिन वह फरार हो गए?
 
       आम आदमी पार्टी को जनता विकल्प  और उम्मीद के रूप में देख रही थी. दिल्ली विजय ने भविष्य का आधार तैयार कर दिया था, लेकिन केजरीवाल  उस मीडिया को गाली देने लगे  जिसने उन्हें पलकों पर बिठाया था. उससे हमदर्दी जताने लगे जो कुछ दिन बाद मीडिया हाउस से निकाला जाने वाला था. जिसकी न तो अपनी छवि थी और न ही आधार। एक आरएसएस मानसिकता वाले कवि का हाथ पकड़ा जो चुनाव में यही बताता रहा कि वह ब्राह्मण है और मोदी का सम्मान करता है. पराजय के बाद उसने केजरीवाल के विरुद्ध ही बयान  दे दिया। केजरीवाल गंगा नहाने वाराणसी चले गए.  यानि
केजरीवाल अपने प्रकाशवर्ष से के दायरे से बाहर निकल गए. 
      राजनीति इतिहास को जन्म देती है, उस पर दया नहीं करती। मैंने पहले भी कहा था कि अरविन्द केजरीवाल की सियासत का डीएनए ख़राब है. उसकी राजनीतिक प्रयोगशाला के अधिकतर वैज्ञानिक अवसरवादी है. सियासत का जहाज़ डूबेगा तो चूहे भाग खड़े होंगे. अब सब देख रहे है कि वे भागने भी लगे हैं. अरविन्द जेल में हैं. विपक्ष अब उन्हें संभालने भी नहीं देगा। 
      अरविन्द केजरीवाल की तारीफ  मैं  अब भी करता हूँ लेकिन उसके सलाहकारों की नहीं। सियासत और शराफत दो किनारे हैं, किनारे कभी लकीर नहीं बना करते। लकीर गांधी की तस्वीर तो बना सकती है, गांधी को नहीं पैदा कर सकती है .
      दिल्ली के तख़्त पर अब किरण बेदी ने दस्तक देनी शुरू कर दी है. वह मुख्य-मंत्री बनी तो इतिहास बनेगा और अरविन्द केजरीवाल बहुत पीछे छूट जायेंगे।
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