संदेश

अक्टूबर, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-8 /डॉ. रंजन ज़ैदी

चित्र
शा हजहां को अपनी बनाई हुई जन्नत रास नहीं आई।        ठीक 7वर्ष बाद पुत्र औरंगज़ेब ने उन्हें 1558 ई. में गद्दी से उतारकर आगरे में लेजाकर कैद कर दिया। यहीं से मुग़ल सल्तनत के पतन का प्रारब्ध शुरू हो जाता है क्योंकि औंरंगज़ेब एक कुशल योद्धा तो था लेकिन अपने मुग़ल पूर्वजों की तरह राजनीतिज्ञ नहीं था।       दिल्ली में भी उसके पांव कभी जम नहीं पाये और उसके संकीर्ण विचारों, कठोर व्यवहारिक समीकरणों और शासनिक व प्रशासनिक त्रुटियों के कारण मुग़लों के एकजुट किये गये देश में विभिन्न तरह की बग़ावतों ने उसे कभी आराम से रहने नहीं दिया।           यही नहीं बल्कि औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में किले की तमाम परम्पराओं को एक-एक करके समाप्त कर दिया जैसे बादशाहत की वर्षगांठ, दरबार में संगीतकारों के संगीत का प्रदर्शन और वर्षगांठ पर बादशाह को सोने-चांदी के सिक्कों से तोले जाने की परम्परा आदि।       इस परम्परा के बंद होने से गरीब अवाम में गहरी मायूसी छा गई, क्योंकि तोल के सिक्के बाद में गरीब ...

पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 7) /डॉ. रंजन ज़ैदी

चित्र
श मसुद्दीन इतगाह खान के मक़बरे का निर्माण (1566-67 ई.पूर्व के मध्य) उसकेे पुत्र मीरज़ा अज़ीज़ कोकलताश की देख-रेख में किया गया था। कोकलताश टर्किश भाषा का शब्द है। मुग़लों की मातृ-भाषा तुर्की बताई जाती है। तुर्की भाषा में कोकलताश का अर्थ होता है सौंतेला भाई।         चूंकि बादशाह अकबर ने बचपन में अंगाह का दूध पिया था, इस नाते अंगाह का बेटा अज़ीज़ कोकलताश उसका सौंतेला भाई हुआ। यह उपाधि स्वयं अकबर ने अज़ीज़ कोकलताश को दी थी। अज़ीज़ कोकलताश का मक़बरा पिता के मक़बरे से कुछ ही दूरी पर अवस्थित है। इस मक़बरे को 67 खम्भा के नाम से जाना जाता है। इसमें 64 खंभों का इस्तेमाल किया गया है।       इस मक़बरे में मीरज़ा अज़ीज़ कोकलताश की पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य दफ़्न हैं। तब कौन जानता था कि कालांतर में यहीं से कुछ ही दूरी पर ( 1797 - 1869 )  उर्दू-फ़ारसी के महान शायर मीरज़ा ग़ालिब को लाकर उनके अपने मक़बरे में दफ़्न किया जायेगा जिसने मुग़लों की शहंशाहियत के पतन को अपनी आंखों से देखा था और दिल्ली को लुटते उजड़ते हुए भी।      ...

पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 6 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

चित्र
सुल्तान इब्राहीम लोदी 'आग जंगल में रास्ता दिखाती है और तलवार सीमाओं का विस्तार करती है।' पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 6 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी    मु ग़लों के लगातार हमलों ने दिल्ली के अत्यंत सुरक्षित किलों की दीवारें भी दरका दीं थीं। हमलों की शुरुआत चंगेज़ खान के हमलों से हुई थी। चंगेज़ खान मंगोल था जिसका असली नाम तमोजिन था। मंगोलिया पर अधिकार कर लेने के बाद उसने अपना नाम चंगेज़ खान रख लिया था। आग और तलवार की सियासत के सहारे वह भय और आतंक का पर्याय ब ना वह कहा करता था कि 'आग जंगल में रास्ता दिखाती है और तलवार सीमाओं का विस्तार करती है।'   ज़हीरुद्दीन बाबर चंगेज़ खान और अमीर तैमूर की नस्ल का पहला ऐसा बादशाह था जिसके हाथ में तलवार भी थी और 'रबाब' (एक तरह की वीणा) भी। वह योद्धा भी था और कोमल भवनाएं रखने वाला कवि भी। उसका पिता सुल्तान उमर शेख मिरज़ा चग़ताई कबीले से सम्बंध रखता था। फ़रग़ना उसके पिता के राज्य की राजधानी...