पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-8 /डॉ. रंजन ज़ैदी
शा हजहां को अपनी बनाई हुई जन्नत रास नहीं आई। ठीक 7वर्ष बाद पुत्र औरंगज़ेब ने उन्हें 1558 ई. में गद्दी से उतारकर आगरे में लेजाकर कैद कर दिया। यहीं से मुग़ल सल्तनत के पतन का प्रारब्ध शुरू हो जाता है क्योंकि औंरंगज़ेब एक कुशल योद्धा तो था लेकिन अपने मुग़ल पूर्वजों की तरह राजनीतिज्ञ नहीं था। दिल्ली में भी उसके पांव कभी जम नहीं पाये और उसके संकीर्ण विचारों, कठोर व्यवहारिक समीकरणों और शासनिक व प्रशासनिक त्रुटियों के कारण मुग़लों के एकजुट किये गये देश में विभिन्न तरह की बग़ावतों ने उसे कभी आराम से रहने नहीं दिया। यही नहीं बल्कि औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में किले की तमाम परम्पराओं को एक-एक करके समाप्त कर दिया जैसे बादशाहत की वर्षगांठ, दरबार में संगीतकारों के संगीत का प्रदर्शन और वर्षगांठ पर बादशाह को सोने-चांदी के सिक्कों से तोले जाने की परम्परा आदि। इस परम्परा के बंद होने से गरीब अवाम में गहरी मायूसी छा गई, क्योंकि तोल के सिक्के बाद में गरीब ...