पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 5 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी
फ़ीरोज़ मलिक और गूजरी रानी
सुल्तान गयासुद्दीन तुग़लक़
के पुत्र का
नाम मुहम्मद तुग़लक
था। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के
शिष्यों में मुहम्मद
तुग़लक का भी
नाम लिया जाता
था। इसके बावजूद
उसे अपने पिता
सुल्तान गयासुद्दीन तुग़लक़ से
बहुत प्रेम था।
उसके खयाल से
बादशाह को आयेदिन
के युद्धों से
अब मुक्त हो
जाना ज़रूरी है।
इसीलिए उसने सोचा
कि इसबार दिल्ली
से कुछ ही
दूर वह दरिया
किनारे एक ऐसी
बारादरी का निर्माण
करायेगा जहां बादशाह
की वापसी पर
उसका भव्य स्वागत
किया जा सके।
सुल्तान
मुहम्मद तुग़लक के शासनकाल
में एक और
घना शहर आबाद
हुआ जिसका नाम
हज़रत दिल्ली रखा गया। यह शहर बाग़ों, झरनों, बावड़ियों, हवादार झरोखों वाली बुलंद इमारतों, जैन मंदिरों और मस्जिदों और नहरों की सुंदरता से सजा हुआ था। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के परमप्रिय शिष्य और हिन्दी के पहले सूफ़ी कवि हज़रत अमरी खुसरो ने इसे जन्नते-अरज़ी यानी अस्थाई-स्वर्ग का नाम दे दिया था। उन दिनों की मुद्राओं पर भी हज़रत दिल्ली खुदा पाया गया है। तुग़लक ने ही पहली बार टोकन-करंसी (यानी चमड़े का सिक्का) की शुरुआत की थी।
सुल्तान
की वापसी से
पूर्व ही बारादरी
का निर्माण शुरू
करा दिया गया।
अपने पुत्र के
उत्साह और प्रेम
के समाचार को
सुनकर सुल्तान अत्यधिक
प्रसन्न हुआ। उसने
जब दिल्ली लौटने
का इरादा किया
तो अपने वज़ीरो
को हिदायत दी
कि दिल्ली पहुंचने
से पहले वह
बारादरी में रुककर
अपनी सेना के
साथ दो रातों
तक विश्राम करना
चाहेगा।
वापसी पर उसका बारादरी
में सोल्लास स्वागत
किया गया। बारादरी
में सुल्तान आराम
के दौरान जब
सो गया तभी
अचानक कमरे की
छत उसपर आ
गिरी और उसमें
दबकर बादशाह की
मृत्यु हो गई।
यह एक बड़ा हादसा था. इस हादसे को
लेकर तत्कालीन विदेशी
यात्री इब्नेबतूता ने अपने संस्मरण
में ‘एक राजनीतिक
षड्यंत्र’ बताया है।
दुःखी मन से
मुहम्मद तुग़लक ने अपने
पिता को उसकी
वसीयत के अनुसार
किले के पास
ही बनवाये गये
मक़बरे में दफ्न
कराया ताकि उस
सुरंग से वह
अपने पिता की
कब्र तक आता-जाता रह सके। यह सुरंग
किले से मकबरे
को सीधे तौर
पर जोड़ती थी।
मकबरे में मलिका
बेगम मखदूमा जहां
और बाद में
सुल्तान मुहम्मद तुग़लक को वहीं के कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया।
हज़रत दिल्ली रखा गया। यह शहर बाग़ों, झरनों, बावड़ियों, हवादार झरोखों वाली बुलंद इमारतों, जैन मंदिरों और मस्जिदों और नहरों की सुंदरता से सजा हुआ था। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के परमप्रिय शिष्य और हिन्दी के पहले सूफ़ी कवि हज़रत अमरी खुसरो ने इसे जन्नते-अरज़ी यानी अस्थाई-स्वर्ग का नाम दे दिया था। उन दिनों की मुद्राओं पर भी हज़रत दिल्ली खुदा पाया गया है। तुग़लक ने ही पहली बार टोकन-करंसी (यानी चमड़े का सिक्का) की शुरुआत की थी।
फ़ीरोज़शाह तुग़लक द्वारा निर्मित ’कोटला’ तुग़लकाबाद में ही अवस्थित था. उसी की बावड़ी की बग़ल में गूजरी महल था जिसका वर्णन हरियाणा में गाई जाने वाली रागनियों में किया गया है। ये रागनियां सुल्तान फ़ीरोज़ मलिक और गूजरी रानी के कथित प्रेम-प्रसंगों को लेकर गढ़ी गई हैं। विदेशी पर्यटक मोरक्को वासी इब्ने बतूता इस प्रकार की किसी भी प्रचलित कहानी की पुष्टि नहीं करता है जबकि तत्कालीन तुग़लक साम्राज्य का उसने दिल्ली में 9 साल रहकर न केवल गम्भीरता से अध्ययन किया था बल्कि वह क़ाज़िये-शहर (जि़ला न्यायविद) के पद पर भी रहा था।
14वीं शताब्दी के प्रारंभ और उसके उत्तरार्द्ध की दिल्ली में बादशाह द्वारा की गई यह नियुक्ति तत्कालीन विक्षुब्ध विदेशी आभिजात्य वर्ग को खड़ा व सशक्त करने के उद्देश्य से की गई थी।विदेशी पर्यटकोें में तत्कालीन मिस्र के विद्वान आलिमुल उमरी (1349 ई.) ने अपने यात्रा-संस्मरण में ’शहर जहां पनाह’ का वर्णन करते हुए लिखा है कि 40 मील के क्षेत्रफल में फैला दिल्ली शहर अपने समय का बड़ा और घनी आबादी वाला शहर है। इसमें 70 अस्पताल और 100 मदरसे सक्रिय हैं।
कृषि विकास को लेकर तत्कालीन सरकार ने खुरासान से मेहनतकश किसानों, मज़दूरों और कृषि विशेषज्ञों को लाकर बसाया गया है ताकि स्थानीय किसानों को इसका लाभ मिल सके लेकिन इस योजना से सरकार को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा।
हुआ यह कि जिन लोगों को तयशुदा मज़दूरी पर यहां लाया गया था, वे लौटकर अपने देश नहीं गये। उन्होंने दिल्ली के आसपास अपने गांव बसाये और यहीं की खेतिहर ज़मीनें खरीद कर खेती करने लग गये। यही नहीं बल्कि उन्होंने खाली पड़ी ज़मीनों को भी अवैध रूप से अपने कब्ज़े में ले लिया और पुराने गांवों में बसकर स्थानीय लोगों के साथ घुलमिलकर खेती करने लगे।
ऐसे लोगों ने सामूहिक रूप से सर्व-प्रथम अपना अलग शहर दौलताबाद योगीर बनाना चाहा था लेकिन शाही सेना ने हस्तक्षेप कर उनके हौसले पस्त कर दिये। तदुपरांत हताश हो खुरासानी आयातित मज़दूर, किसान और उनके सम्बंधी दिल्ली के आस-पास में ही अपने गांव बनाकर रहने लगे। जब उन्हें सैनिक हस्तक्षेप का खतरा नहीं रहा तब वे यहीं के होकर गये।
14वीं शताब्दी के प्रारंभ और उसके उत्तरार्द्ध की दिल्ली में बादशाह द्वारा की गई यह नियुक्ति तत्कालीन विक्षुब्ध विदेशी आभिजात्य वर्ग को खड़ा व सशक्त करने के उद्देश्य से की गई थी।विदेशी पर्यटकोें में तत्कालीन मिस्र के विद्वान आलिमुल उमरी (1349 ई.) ने अपने यात्रा-संस्मरण में ’शहर जहां पनाह’ का वर्णन करते हुए लिखा है कि 40 मील के क्षेत्रफल में फैला दिल्ली शहर अपने समय का बड़ा और घनी आबादी वाला शहर है। इसमें 70 अस्पताल और 100 मदरसे सक्रिय हैं।
कृषि विकास को लेकर तत्कालीन सरकार ने खुरासान से मेहनतकश किसानों, मज़दूरों और कृषि विशेषज्ञों को लाकर बसाया गया है ताकि स्थानीय किसानों को इसका लाभ मिल सके लेकिन इस योजना से सरकार को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा।
हुआ यह कि जिन लोगों को तयशुदा मज़दूरी पर यहां लाया गया था, वे लौटकर अपने देश नहीं गये। उन्होंने दिल्ली के आसपास अपने गांव बसाये और यहीं की खेतिहर ज़मीनें खरीद कर खेती करने लग गये। यही नहीं बल्कि उन्होंने खाली पड़ी ज़मीनों को भी अवैध रूप से अपने कब्ज़े में ले लिया और पुराने गांवों में बसकर स्थानीय लोगों के साथ घुलमिलकर खेती करने लगे।
ऐसे लोगों ने सामूहिक रूप से सर्व-प्रथम अपना अलग शहर दौलताबाद योगीर बनाना चाहा था लेकिन शाही सेना ने हस्तक्षेप कर उनके हौसले पस्त कर दिये। तदुपरांत हताश हो खुरासानी आयातित मज़दूर, किसान और उनके सम्बंधी दिल्ली के आस-पास में ही अपने गांव बनाकर रहने लगे। जब उन्हें सैनिक हस्तक्षेप का खतरा नहीं रहा तब वे यहीं के होकर गये।
जारी /-6



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