पुस्तक : इतिहास के झरोखे से /डॉ. रंजन ज़ैदी


                 

Recent Book/ History Past:  By Dr. Ranjan Zaidi          
         बात तो होगी ही                                                        गाहे-गाहे बाज़ ख्वां ईं क़िस्स--पारीनह रा।
                                                                        (क़िस्सों को कभी-कभी दोहराते रहना चाहिए।)
      चपन में मैंने अपने समय के प्रसिद्ध उर्दू शायर अल्लामा अनवर साबरी और दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सज्जादहनशीन हज़रत पीर ज़ामिन निज़ामी से सुना था कि 1857 के ग़दर के बाद जहां दिल्ली-वासियों का पलायन अपने चरम पर था, वहीं मिरज़ा ग़ालिब अपनी दिल्ली छोड़ने के लिए कतई राज़ी नहीं होते थे। किसी ने तब उनसे इसका कारण जानना चाहा था तो गालिब ने जवाब दिया था,मैं जिस्म हूं तो दिल्ली उसकी रूह। दोनों को एक-दूसरे से जुदा नहीं किया जा सकता है।
      बचपन में सुना गया यह वाक्य मुझे आज भी याद है। ऐसे ही यादों के खज़ाने में पढ़ी और सुनी गई मुग़ल शहज़ादियों और लुटी-पिटी बेगमात के किस्सों के इतने आंसू जमा हैं कि अगर हर आंसू को बोलने का अवसर दे दिया जाये तो सुनने वालों के आंसू भी फूट पड़ेंगे लेकिन ये उनके आंसुओं का मर्सिया नहीं, दिल्ली के इतिहास और आज़ादी के बाद के सामाजिक बदलाव के कुछ शाब्दिक रेखांकन हैं।   
      दिल्ली मेरी दुआ, मेरी पहली मुहब्बत और मेरा सुकून है। एक दिन मैं अपने पत्रकार गुरु स्वर्गीय श्री राम स्वरूप (उर्दू दैनिक मिलाप के तत्कालीन फ़िल्म एडिटर) उर्दू साहित्य के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय फ़िक्र तौंसवीं को देखने दिल्ली गेट स्थित पंत अस्पताल पहुंचे। उन दिनों वहां फ़िक्र तौंसवीं का इलाज चल रहा था और दवा के रूप में वह तब हंस के मोती चुग रहे थे। मुझे याद है, फिक्र तौंसवीं ने कहा था, ’दिल्ली के इस अस्पताल में भर्ती होकर मुझे हंस के मोती चुगने पड़ेंगे, इसकी तो मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी, की होती तो मैं बटवारे के दिनों में ही दिल्ली आकर अस्पताल में डेरा डाल देता। दिल्ली अब मुझे भी भाने लगी है।
      उनके उस वाक्य ने मेरा पीछा उस समय तक नहीं छोड़ा जब तक मैंने यह पुस्तक पूरी नहीं कर ली। उन्होंने कहा था, ’शायद मुझे ज़िन्दगी कभी इतना अवसर दे कि मैं दिल्ली पर कोई पुस्तक लिख पाऊं, लेकिन पुत्तर, तुझे दो काम अवश्य करने हैं। एक-छठा दरिया (फ़िक्र तौंसवी द्वारा लिखित उनकी डायरी) का हिन्दी में अनुवाद, और दूसरा दिल्ली के इतिहास पर सीधे, सरल और पढ़ने योग्य पुस्तक का लेखन।
      मेरे द्वारा अनूदित छठा दरिया का प्रकाशन अपने समय में कमलेश्वर जी ने अपने सम्पादन में हिन्दी मासिक गंगा में धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया।  
   यह पुस्तक किसी इतिहासकार द्वारा लिखा गया दिल्ली और देश के ताजदारों का इतिहास नहीं है बल्कि यह तत्कालीन ऐतिहासिक घटनाओं का मात्र शाब्दिक रेखांकन है, जिसे इतिहास के झरोखे से देखने का मात्र प्रयास भर किया गया है, जो शायद आपको किसी किसी मोड़ पर कुछ नया जानने और सोचने के लिए मजबूर करे। 
                                                         -----------------------                                                                                                              इतिहास के झरोखे से 
                                                    (एक)                                                             
सिंध प्रांत (पाकिस्तान) के  लरकाना ज़िले में स्थित 'मोएन जोदणों' यानि मुर्दों का टीला  नाम से जाना जाता है, लेकिन इन्हें इतिहासकार भारत-पाक के 'प्रागैतिक इतिहास के सांस्कृतिक भग्नावशेष' भी कहते हैं. घग्गर-बेकरा नदी प्रायः अब सूख चुकी है। पुरातत्विदों का मानना है कि यह शहर अपने समय में अत्यन्त आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग और विद्वान-विशेषज्ञों की कुशल निर्माण परिकल्पना, वास्तु और शिल्प-कला की अद्भुत प्रस्तुति रही होगी। यह शहर अपने समय में कभी सिंध और घग्गर-बेकरा नदी के मध्य में अवस्थित हुआ करता था.

        अनुमान है कि इसका निर्माण लगभग २६वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुआ होगा, किन्तु १९०० ईसा पूर्व में जब इस शहर की मानव-संस्कृति का ह्रास होना शुरू हुआ होगा तो यहाँ से मनुष्यों के साथ उनके परिवारों का भी पलायन शुरू होने लगा होगा और खाली होते शहर पर रेत की परतें चढ़ती चली गई होंगीं। अजीब विडम्बना है कि ३७०० वर्षों तक यह शहर रेत के पिरामिड में दफ्न अपने ऐतिहासिक कुम्भकरण की नींद में ऐसे सोता रहा मानों किसी ऐसी शताब्दी की राह देख रहा हो जहां के जागरूक लोग उसके विनाश का रहस्य जानने-सुनने के लिए लालायित होंगे और वह जागकर विश्व को अपने विनाश की कथा सुनाएगा।
      कहते हैं कि १९२२ में कुछ बौद्ध यात्रियों ने इधर से गुज़रते हुए रेत के टीले से झांकते हुए प्रागैतिहासिक काल के स्तूप को देखा और उस पर खुदे हुए गौतम बुद्ध के सन्देश पढ़े तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा.
      १९३० में अर्नस्ट मेक्वाये के नेतृत्व में इस क्षेत्र में दबे शहर का पता लगाने के लिए खुदाई  का काम शुरू किया गया जिसे १९४५ में मार्टिंज़ वेलर और अहमद  हसन  दानी ने आगे बढ़ाया। यह कार्य योजना के अनुसार डॉ. जार्ज ऍफ़ डलाज के नतृत्व में १९६५ तक चलता रहा, लेकिन तभी पता चला कि खुदाई के दौरान रेत में दबे शहर की इमारतों को नुक़सान पहुँच रहा है, इसलिए खुदाई के कार्य को तत्काल कुछ समय के लिए स्थगित दिया गया। पाई जाने वाली वस्तुओं के अध्ययन से अनुमान लगाया गया कि यह शहर अपने समय में अत्यंत समृद्ध और धनधान्यपूर्ण रहा होगा जिसका विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक दिखाई देता है. दूसरी शताब्दी के अन्य शहरों में सरकेब और सरसुख भी निश्चय ही अपने समय के महत्वपूर्ण नगरों में माने जाते रहे होंगे।
      खुदाई में मिले सबूतों से इस बात का भी पता चलता है कि तक्षिला में अन्य विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त अंतर्राष्टीय ख्याति का एक विश्वविद्यालय भी रहा था, जहाँ संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए देश-विदेश से छात्र यहाँ आया करते थे. १९८० में यूनेस्को ने तक्षिला को विश्व की बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल कर लिया लेकिन 'ग्लोबल हेरिटेज फंड' की एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान स्थित इस क्षेत्र में निरंतर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले ऐसे अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे है जिनका प्रभाव खुदाई के कार्यों व प्राप्त बहुमूल्य ऐतिहासिक वस्तुओं पर तो पड़ ही रहा है, संग्रहालय में रखी गई वस्तुओं को भी काफी नुकसान पहुँच रहा है.
      पुरातत्वेत्ताओं ने एकमत से यह बात स्वीकार कर ली थी कि टीले के नीचे रेत के लिहाफ से ढका कोई ऐसा शहर ज़रूर दफ्न है जो मानव-इतिहास की टूटती कड़ियों को जोड़ सकता है और उसके अध्ययन से पता लगाया जा सकता है कि हमारी सभ्यता कितनी पुरानी है और प्रागैतिहासिक युग के मनुष्य ने उस काल तक कितना विकास कर लिया था। इस सम्बन्ध में एक योजना के अंतर्गत इटली और जर्मनी के पुरातत्व विशेषज्ञों ने मिलकर अपने नेतृत्व में टीले के एक छोटे से इलाके की बड़ी सावधानी के साथ पुनः खुदाई शुरू कराई। इनके प्रयासों से की जा रही खुदाई  से जब रेत का लिहाफ हटा तो पता चला कि यह तो एक सभ्य, सुसंकृत और अपने समय के कुशल इंजीनियरों के हाथों सुनियोजित ढंग से निर्मित एक ऐसा शहर है जिसमें चौड़ी-चौड़ी सड़कें थीं. दरवाज़ों पर शानदार नक़क़ाशी का काम होता रहा होगा और इन मकानों में लगभग ४०,००० की आबादी रह रही होगी।
          'मोइन जोदाड़ो' शहर के एक भाग में बनाई गई पक्की ईंटों वाले मकानो में किला नुमा ईमारत भी पाई गई है। उसकी सीमा में स्थित १२ मीटर ऊंचाई तक बुलंद नज़र आने वाली कच्ची ईंटों के मकान अवस्थित हैं जिसमें लगभग ५००० परिवार रहते रहे होंगे। क्षेत्र में केंद्रीय हमाम, कुआँ, बाज़ार और दो बड़े सार्वजनिक-हाल भी पाये गए हैं. पेय-जल की समुचित व्यवस्था में छोटे-बड़े कई कुँए, पानी के निकास से सम्बंधित नाले-नालियां। धार्मिक रिचुअल निभाने के उद्देश्य से लगभग २.४ मीटर के गहरे तालाब के निशान पाये गए हैं.
      अप्रैल १९९७ में UNESC0 ने २०११ में अगले २० वर्षों के लिए इसकी देखभाल पर होने वाले १० मिलियन डालर का खर्च उठाने के लिए  सिंध प्रान्त की सरकार को ज़िम्मेदारी दी.
      'तख़्त माई' शहर पहली शताब्दी के एक किले में आबाद रहा होगा। पुरातत्वेत्ताओं का मानना है कि इस किले का निर्माण शायद पहली और सातवीं सदी ईस्वी के बीच हुआ होगा। खुदाई के दौरान पहली बार इसका पता १८६४ में चला था.  किले में स्तूपों का कोर्ट, निजी कमरों वाले अनेक चेंबर (जिनमें मंत्रणा-हॉल और विशेष-भोजनालय भी निर्मित किये गए थे.), और वृहद् मंदिर के अवशेष पाये गए हैं जिनके बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि इनका निर्माण शायद बहुत बाद में किया गया होगा। किले के एक भाग में ही घने अँधेरे के बीच अनेक कमरों का निर्माण किया गया था जिनमें शायद विशेष पूजा-पाठ व योग-साधना करने वाले भक्तगणों को ठहराया जाता रहा होगा।
      बाद के क्षेत्र में शहर बसाया गया था। किले के अवशेषों को देखकर ज्ञात होता है कि बौद्ध मतावलम्बियों के इस कथित किलेनुमा 'तख़्त माई' शहर को तत्कालीन बर्बर आक्रमणकारियों से तनिक भी क्षति नहीं पहुंचाई गयी है. न ही पुरातत्वविदों को वहाँ तत्कालीन बर्बर हमलावरों के किन्हीं हमलों के निशान  मिले हैं .
      जबसे सिंध-प्रान्त स्थित 'भंभोर' शहर में खुदाई के दौरान प्राचीन काल के सिक्के, मानस-पिंजर और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुएं प्राप्त हुई हैं, उनसे प्रागैतिहासिक काल में दिलचस्पी रखने वाले शोधार्थियों और सैलानियों की रुचि में काफी बढ़ोतरी होती देखी गई है. क्रमशः
जारी/-2------------------------------------------------------------------------
पाठकों से- E-Book का ब्लॉग पर प्रस्तुतीकरण मेरा पहला प्रयोग है. उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। एक-एक कर मेरी सभी पुस्तकें ई-बुक फार्म में आयेंगीं। 'दिल्ली : अतीत के झरोखे से' मूलतः हिंदी की रचना है लेकिन यह अबतक कई भाषाओँ में अनूदित हो चुकी है. इस E-Book के अगले पड़ावों पर आपको दिल्ली के बारे में अनेक दिलचस्प जानकारियां पढ़ने को मिलेंगीं। जो पत्र-पत्रिकाये इसकी कड़ियाँ प्रकाशित कर रहे हैं या करने के इच्छुक हैं, उनसे अनुरोध है की वे हमें प्रकाशन की जानकारी अवश्य दें. प्रकाशक, संपादक व पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं. Copyright:लेखकाधीन   

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