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प्रकृति के रहस्यों में उलझता मानवीय दर्शन /रंजन ज़ैदी

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        जी वन  अपने आप में रहस्य है. रहस्यों से भरा तो सम्पूर्ण ब्रम्हांड भी है. कम शब्दों में पारिभाषित करूँ तो कह सकता हूँ कि जीवन जैविकीय पद्धति की एक व्यस्था है जिसका सञ्चालन फुल-चार्ज्ड बैटरी से होता है. शरीर के    मिकैनिज़्म में एक इनर-डिवाइस सक्रिय रहती है. इसे हम सोल, आत्मा या रूह कहते हैं. इस आत्मा को संचालित करने वाली एक और डिवाइस मस्तिष्क की किसी कोशिका में सक्रिय रहती है. वही हमें द्वंद्व से निकालती है कि अच्छा क्या है, बुरा क्या. ऐसा करो, ऐसा न करो. रॉय सही है या नहीं! आत्मा के भीतर की आत्मा है.        प्रकृति बहुरंगी है हैं. इसलिए उसमें भेद दिखाई देते हैं. हिरन को शेर खाता है. शेर को भेड़ियों के झुण्ड खा जाते हैं. जंगल का ईको-सिस्टम ही ऐसा है. जानवर कैसा भी हो, हम उसे जानवर ही कहते हैं. सब एक.दूसरे के पूरक हैं. सबके भीतर आत्माएं हैं. जल-चर, पक्षी-पतंगे, सबका रंग भिन्न है,   स्वाद और स्वभाव में भी भिन्नता है. मनुष्य जाति और उसके समाज में भी भिन्नता है  है, श्रेणियाँ  और स्तर भिन्न हैं. उसकी शारीरिक बन...