प्रकृति के रहस्यों में उलझता मानवीय दर्शन /रंजन ज़ैदी
जीवन अपने आप में रहस्य है. रहस्यों से भरा तो सम्पूर्ण ब्रम्हांड भी है. कम शब्दों में पारिभाषित करूँ तो कह सकता हूँ कि जीवन जैविकीय पद्धति की एक व्यस्था है जिसका सञ्चालन फुल-चार्ज्ड बैटरी से होता है. शरीर के मिकैनिज़्म में एक इनर-डिवाइस सक्रिय रहती है. इसे हम सोल, आत्मा या रूह कहते हैं. इस आत्मा को संचालित करने वाली एक और डिवाइस मस्तिष्क की किसी कोशिका में सक्रिय रहती है. वही हमें द्वंद्व से निकालती है कि अच्छा क्या है, बुरा क्या. ऐसा करो, ऐसा न करो. रॉय सही है या नहीं! आत्मा के भीतर की आत्मा है.प्रकृति बहुरंगी है हैं. इसलिए उसमें भेद दिखाई देते हैं. हिरन को शेर खाता है. शेर को भेड़ियों के झुण्ड खा जाते हैं. जंगल का ईको-सिस्टम ही ऐसा है. जानवर कैसा भी हो, हम उसे जानवर ही कहते हैं. सब एक.दूसरे के पूरक हैं. सबके भीतर आत्माएं हैं. जल-चर, पक्षी-पतंगे, सबका रंग भिन्न है, स्वाद और स्वभाव में भी भिन्नता है. मनुष्य जाति और उसके समाज में भी भिन्नता है है, श्रेणियाँ और स्तर भिन्न हैं. उसकी शारीरिक बनावट, ऊर्जा, परिवेशगत संघर्ष और उसकी परिकल्पना से जन्मी जिजीविषा उसे गंतव्य की ओर ले जाने के लिए बाध्य करती है.धीरू भाई अम्बानी सोने का चम्मच लेकर नहीं जन्मा था. दूसरे विश्व महायुद्ध के दौरान करोणों सैनिक मारे गए. इसमें लाखों हिंदुस्तानी सैनिक भी थे. इस्राईल बनने के बाद लाखों यहूदी शरणार्थी जब पलायन कर इसराइल पहुंचे तो वे हड्डियों के ढाँचे की तरह थे. लाखों यहूदी होलोकास्ट में मारे गए लेकिन आज इसराइल दया का पात्र नहीं है.भारत-पाक विभाजन में लगभग एक करोड़ इंसान इधर से उधर और उधर से इधर पलायन का शिकार हुए. करोड़ों-अरबों की संपत्ति बर्बाद हुई. दुनिया के इतिहास इस तरह के पलायन से भरे पड़े हैं. दुनिया इंसानी लाशों के ढेर पर बैठी हुयी है. दुनिया आज भी विनाशकारी हथियारों और बारूदों के ढेर के आलावा क़ुदरत के संभावित धमाकों पर बैठी हुई है. इस तरह के बवंडर भी अर्थ-क्विक की तरह होते हैं. हम उन्हें विषयगत मान लेते हैं.विकसित महाशक्तियां अपने आर्थिक असंतुलन को संतुलित करने के उद्देश्य से छोटे खनिज से सम्पन्न देशों पर हमला कर उसके आर्थिक स्रोतों पर क़ब्ज़ा कर उनका दोहन करने लग जाते हैं जैसे इराक और लीबिया पर अमेरिकी (बहुराष्ट्रीय सेना सहित) साम्राज्यवाद का क़ब्ज़ा और सीरिया के सरहदी कुओं पर कब्ज़ा कर उसका तेल निकालते रहना. हाल में आतंकवाद के नाम पर अकारण अनेक मुस्लिम राज्यों को विनाश के गर्त में धकेल दिया गया, वहां महामारी फैल चुकी है. इसमें नवजात शिशुओं का अपराध नहीं तलाशा जा सकता है. यह कोई भौगोलिक उथल-पुथल हो सकती है जिसे हम अभी नहीं समझ पा रहे हैं.यह सच है कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है लेकिन उसने भारतीय पुरा-वैज्ञानिक-गणिकों को तारा-मंडल की ओर आकृष्ट किया और उसके अध्ययन में दिलचस्पी का उत्स जगाया. उसने वैज्ञानिकों को सोचने का आधार दिया. बाणभट्ट उसी सोच का एक वैज्ञानिक था. यदि ऐसी रुचियाँ न जन्म लेतीं तो दुनिया भर में विज्ञान न जन्म लेता और न भारत या दुनिया के अन्य वैज्ञानिक चाँद पर पहुँचते न चीन मंगल ग्रह की मिटटी खरोंचकर मंगोलिया की धरती को गवाह बनता.मनुष्य के चिंतन ने दर्शन को जन्म दिया. दर्शन ने विचारकों को, विचारकों ने वैज्ञानिकों को ब्रह्म्हाण्ड खंगालने का हौसला दिया. इसी वैश्विक जिज्ञासा ने जब गैलेलियो को जन्म दिया या वास्कोडिगामा या अरस्तू को जन्म दिया तब लगा कि मनुष्य बुद्धिजीवी भी है और वह गरीब घर में जन्म लेकर भी दुनिया के असंख्य अनसुलझे रहस्यों को सुलझा सकता है, वराह-नित्र और मार्क्स बन सकता है, धीरू भाई अम्बानी स्टेशन पर अख़बार बेचकर एक बड़ा उद्योगपति बन सकता है और भ्रष्ट तरीके अपनाकर हर्षद मेहता शेयर-बाजार का एक बड़ा दलाल एक बड़े घोटाले का इतिहास रच सकता है. प्रकृति के अनेक रहस्य अभी सुलझाने बाक़ी हैं और वैज्ञानिकों को अभी आत्मा जैसी ह्युमन-डिवाइस को ठीक से समझना बाक़ी है.रंजन ज़ैदी
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