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ज़मीं खा गयी आसमान कैसे-कैसे/रंजन ज़ैदी

ज़मीं खा गयी आसमान कैसे-कैसे https://alpst-poltics.blogspot.com/2023/02/blog-post_16.html जै सा कि यहाँ मौजूद तमाम अहले-क़लम इस बात की जानकारी रखते हैं कि अगर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी महाकवि संत कबीर दास के काव्य-चिंतन के अनेक पहलुओं को बाक़ायदा हिंदी साहित्य जगत के सामने न लाये होते तो हम कबीर दास जैसे महान कालजयी कवि के साहित्य से निश्चय ही वंचित रह गये होते.       वैश्विक साहित्य पर नज़र डालें तो हम ऐसे और भी अनेक महान साहित्यकारों के साहित्य की महत्ता पर चर्चा कर सकते हैं जिनके साहित्य को उनके मित्रों, शिष्यों या हितैषियों ने दुनिया के सामने पेश किया और वे कालांतर में महान विभूतियों के रूप में जाने गए.         उर्दू अदब की तारीख़ में साहित्यकार व जंगे आज़ादी के सिपाही और विद्वान शिक्षाविद डॉ. अब्दुर रहमान बिजनौरी  ( अलीग.) ने जब उर्दू के महान शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ‘गालिब’ के ग़ज़ल संग्रह 'दीवाने ग़ालिब' की भूमिका 'महासिने कलामे-ग़ालिब' तहरीर की तो उसके बाद ही ग़ालिब के चाहने वालों को मालूम हुआ कि ग़ालिब की  शाइरी आम...

निगार अज़ीम एक प्रतिभाशाली कथाकार /रंजन ज़ैदी

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                                                                                         https://alpst-   https://alpst-  /2023/02/blog-post.html       सुश्री निगार अज़ीम एक प्रतिभाशाली कथाकार हैं. 1998  में उनका एक कहानी संग्रह 'अक्स' मुझे पढ़ने को मिला. जब मैंने उनकी कहानी 'अक्स' पढ़ी तो मैं स्तब्ध रह गया.        आकाशवाणी दिल्ली के उर्दू प्रसारण कार्यक्रमों के दौरान मोहम्मद अली मौज ने मुझे एक कहानी पढ़ने को दी. उसका शीर्षक था 'ज़ख्म'. मौज मेरे दोस्त थे. वह चाहते थे कि मैं उसे अपने हिंदी नाटकों में भी शामिल करूँ. मैंने तभी उसे गहराई से पढ़ा और उसके बाद वह अज़ीम निगार मेरी बुकशेल्फ का हिस्सा बन गई. लेकिन मेरी बेचैनी उस वक़्त और बढ़ गई जब मैं 'अपनी एक हिंदी नई कहानी 'खारे पानी की मछलियां' लिखने बैठा तो निगार अज़ीम की कहान...