निगार अज़ीम एक प्रतिभाशाली कथाकार /रंजन ज़ैदी

                                                
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      सुश्री निगार अज़ीम एक प्रतिभाशाली कथाकार हैं. 1998  में उनका एक कहानी संग्रह 'अक्स' मुझे पढ़ने को मिला. जब मैंने उनकी कहानी 'अक्स' पढ़ी तो मैं स्तब्ध रह गया. 
      आकाशवाणी दिल्ली के उर्दू प्रसारण कार्यक्रमों के दौरान मोहम्मद अली मौज ने मुझे एक कहानी पढ़ने को दी. उसका शीर्षक था 'ज़ख्म'. मौज मेरे दोस्त थे. वह चाहते थे कि मैं उसे अपने हिंदी नाटकों में भी शामिल करूँ. मैंने तभी उसे गहराई से पढ़ा और उसके बाद वह अज़ीम निगार मेरी बुकशेल्फ का हिस्सा बन गई. लेकिन मेरी बेचैनी उस वक़्त और बढ़ गई जब मैं 'अपनी एक हिंदी नई कहानी 'खारे पानी की मछलियां' लिखने बैठा तो निगार अज़ीम की कहानी 'मर्द' मेरे सामने आ खड़ी हुई. एक झिझक छपाक से मेरे मुंह से आ लिपटा और ऑंखें पहले तो अंधेरे से टकराईं फिर एकदम सब कुछ साफ़ हो गया. मेरी कहानी भी काग़ज़ों पर फै गयी. 
      निगार को मैंने पढ़ा हैं. उनकी कहानी 'रेडलाइट' भी पढ़ी. भूख, ज़र्द-पत्ते, सैलाब और कसक भी. फ़र्क़ ने महसूस कराया कि मानवीय अस्तित्व के जो लक्षण प्रकट में दिखाई   नहीं देते वे अदृश्य में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में अपनी मनोवैज्ञानिक प्रितिक्रिया का प्रदर्शन अवश्य करते हैं. मेरी यह प्रतिक्रिया निगार के उस संकलन पर हैं जो उन्होंने अप्रैल 1998 में मुझे दिया होगा. संयोग से वह आज भी मेरी बुकशेल्फ की अन्य पंक्तियों के क्रम की उस क़तार में सुरक्षित हैं जिसमें अब्दुल हलीम शरर, जोश मलीहाबादी, सादत हसन मंटो, ख्वाजा अहमद अब्बास, फैज़ अहमद फ़ैज़, मजाज़, साहिर लुधियानवी और राजेंद्र सिंह बेदी के साथ मुहम्मद अली मौज की किताबें मुझे प्रेरणा देती रहती है.
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