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फ़रवरी, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अब ईरान की बारी है : ( 4 ) / रंजन जैदी

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ज़ुल्म   और  ज़ालिम   की  उम्र  अधिक  नहीं  हुआ  करती  है. दुनिया ने देखा कि शाहे-ईरान की  कैंसर रोग से पीड़ित होकर सन १९८८ में काहिरा में मृत्यु हो गई और शाहपुर बख्तियार  की  पैरिस में ही हत्या कर दी गई. अमेरिका ने शाहे-ईरान के अकूत खजाने को बड़ी होशियारी से ज़ब्त कर लिया और कालांतर में ईरान की इंकलाबी हुकूमत को आगाह किया कि या तो वह शीघ्र अपने न्युक्लीयी कार्यक्रम को बंद करे या इसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार हो जाये.   वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने कहा था कि लीबिया पर की गई कार्यवाई उसकी तेल संपदा पर कब्जा करने की अमेरिकी सहित कुछ देशों की एक शुरुआत भर है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थन प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय सेनाओं के हस्तक्षेप की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि वह इस कार्रवाई को लीबिया की तेल संपदा पर कब्जे के अमेरिकी प्रयास के रूप में देखते रहे है।उन्होंने कहा था कि यह बेहद खेदजनक है क्योंकि जहां युद्ध में अनेक मासूम लोगों की जानें गईं, वहीं कई और युद्ध दुनिया पर लद जायेंगे जिसमें हजारों-लाखो...

अब ईरान की बारी है : (3) / रंजन जैदी

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इमाम आयतुल्लाह खमैनी ईरान की क्रांति से पूर्व शहंशाह रज़ा शाह पहलवी की बादशाहत के कार्यकाल में ईरान (१९७९ से पहले तक) एक तरह से अमेरिकन कोलोनी की सी हैसियत रखता था. यहाँ तक कि जून १९६३ में लागू  Capitulation Accord अनुबंध पर हस्ताक्षर किये जाने के उपरांत विशेषाधिकार के अंतर्गत वहां रहने वाले अमेरिकी नागरिकों पर मुक़दमा चलाये जाने की भी अनुमति नहीं रही थी. यह एक ऐसा अनुबंध था जो आम ईरानी नागरिकों के अधिकारों को शर्मसार करता था और यह एहसास कराता  था कि  ईरानी अवाम अमेरिकी गुलाम हैं. जनवरी १९७९ में 'मर्ग बर शाह' के नारे ने तेहरान  में खलभली मचा दी और सियासी हवाओं के थपेड़ों ने रफ्ता-रफ्ता समूचे ईरान को अपनी गिरफ़्त में जकड़ लिया. यह इन्कलाब-ईरान का वैसा नारा नहीं था जैसा कभी आयतुल्लाह शीराज़ी ने तम्बाकू आन्दोलन को लेकर बुलंद किया था. लेकिन सन १९०६ में जो सामूहिक जन-आन्दोलन  सफलता के चरम पर पहुंचा तो शाही  निज़ाम को सियासी तौर पर अवाम के सामने  कहीं तक झुकना पड़ा लेकिन शीघ्र ही वह क्रांति दुर्भाग्यवश सशक्त नेतृत्व और सम्पूर्ण जन-सहयोग  के अभाव के का...

अब ईरान की बारी है : (2) / रंजन जैदी

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शाह ईरान : इन्कलाबे-ईरान से पूर्व शाहे-ईरान रज़ाशाह पहलवी अपने बच्चों के साथ अमेरिका, ईरान के तेल  के कुंवों को भी उन खुफिया पाइप लाइनों  से जोड़ना चाहता है जिन्हें खाड़ी युद्ध के दौरान नाटो देशों द्वारा प्राप्त संरक्षण और इस्राइली वैज्ञानिकों की मदद से  बेहद आधुनिक तकनीकी का प्रयोग कर बिछाया गया था. तेल चोरी करते रहने में माहिर क्वैत और क़तर की श्रृंखला में जबसे इस्राईल की पाइप लाइनें भी आ जुड़ीं, तभी से स्थिति में बदलाव आने शुरू हो गए. ईरान के पास पहले से ही अमेरिकी तकनीकी    रही है जिसे कालांतर में इस्तेमाल करते रहना फायदे का सौदा नहीं रहा है. संयोग यह है कि खाड़ी देशों के तेल उगाही का स्रोत का केंद्र एक ही है और ज़मीन के गर्भ में कौन कहाँ तक पहुँच रहा है, अंतर्राष्ट्रीय कानून भी प्राप्त सबूतों पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने में संकोच से काम लेता है. ईरान के तेल पर प्रतिबन्ध लगाकर अमेरिका उसके तेल पर अपना एकाधिकार बनाना चाहता है. इस्राईल के नज़रिए से देखा जाये तो उसकी दिलचस्पी इरान के तेल में कतई नहीं है. ईरान, मुस्लिम देशों में मात्र एक ऐसा देश है ...