आज भी तो सब वैसा ही है. @ डॉ, रंजन ज़ैदी
पुस्तक : प्रेमचंद साहित्य : नव-मूल्यांकन / डॉ, रंजन ज़ैदी http://alpst-poltics.blogspot.com/2018/05/blog-post_31.html?spref=tw स माज, अपनी भाषागत माध्यमों के द्वारा किसी भी जानदार वस्तु का हो सकता है. लेकिन उनमें न तो साहित्य होता है, न राजनीति। मनुष्य अपने समाज की एक इकाई के रूप में साहित्यिक भी है और राजनीतिक भी. या विशेषता एक लेखक में ही होती है कि वह पशु-पक्षियों के संबंध में लिख सके, सृष्टि के सभी जानदारों की खोज कर सके, उस पर बात कर सके.विज्ञानं को माध्यम बनाकर नयी-नयी खोजें कर सके. चन्द्रमा से लेकर अन्य ग्रहों पर उतरने या उनके असंख्य रहस्यों को तलाशने और जानने का उत्साह जुटा सके. मनुष्य समाज से अन्य किसी समाज में ऐसा नहीं है. इसीलिए मानव समाज में एक सुगठित, सशक्त और परिमार्जित समाजिक व्यवस्था है जिसे संचालित करने के लिए मनुष्य को राजनीति का सहारा लेना पड़ता है. हालाँकि राजनीति खुद अपने आपमें समाज के प्रबंधन की मज़बूत व्यवस्था है जिसके रूप अनेक हो सकते हैं. लेकिन समाज के मूल में...