आज भी तो सब वैसा ही है. @ डॉ, रंजन ज़ैदी

पुस्तक : प्रेमचंद साहित्य : नव-मूल्यांकन / डॉ, रंजन ज़ैदी
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      समाज, अपनी भाषागत माध्यमों के द्वारा किसी भी जानदार वस्तु का हो सकता है. लेकिन उनमें न तो साहित्य होता है, न राजनीति। मनुष्य अपने समाज की एक इकाई के रूप में साहित्यिक भी है और राजनीतिक भी. या विशेषता एक लेखक में ही होती है कि वह  पशु-पक्षियों के संबंध में लिख सके, सृष्टि के सभी जानदारों की खोज कर सके, उस पर बात कर सके.विज्ञानं को माध्यम बनाकर नयी-नयी खोजें कर सके. चन्द्रमा से  लेकर अन्य ग्रहों पर उतरने या उनके असंख्य रहस्यों को तलाशने और जानने का उत्साह जुटा सके. मनुष्य समाज से अन्य किसी समाज में ऐसा नहीं है. इसीलिए मानव समाज में एक सुगठित, सशक्त और परिमार्जित समाजिक व्यवस्था है जिसे संचालित करने के लिए मनुष्य को राजनीति  का सहारा लेना पड़ता है.

      हालाँकि राजनीति खुद अपने आपमें समाज के प्रबंधन की मज़बूत व्यवस्था है जिसके रूप अनेक हो सकते हैं. लेकिन समाज के मूल में राजनीति का उद्देश्य एक ही होता है, समाज और देश को संगठित और व्यवस्थित ढंग से समाज द्वारा बनाये गए आदर्शों को बनाये रखना रखना. साहित्य इन आदर्शों को हाथ से नहीं जाने देता.

      साहित्य, दरअसल वैश्विक मानस की सार्व-भौमिक पूँजी है. इसलिए साहित्य की ज़िम्मेदारी समाज, इतिहास और  संस्कृति के  साथ मिलकर राजनीति के प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त करना होता है. यदि ऐसा न हो तो राजनीति बेलगाम हो जाये. 'जिस भाषा का साहित्य अच्छा होगा, उसका समाज भी अच्छा होगा. समाज के अच्छे होने पर मजबूरन राजनीति भी अच्छी होगी.'*

      एक समुन्नत राष्ट्र या देश के लिए मानव समाज के बीच साहित्य, संस्कृति और राजनीतिक संवाद बनाये प्रेमचंद के उपन्यासों में हम तलाशेंगे कि भारत उन्हें अपने देश की मिट्टी की खुशबू क्यों कहता है?
आज भी तो सब वैसा ही है.
रखन आवश्यक है. एक सशक्त रचना में (चाहे वह कविता हो या नज़्म, कहानी हो या उपन्यास) उपर्युक्त वर्णित तत्वों का होना ज़रूरी है. इन्हीं तत्वों या मापदंडों के आधार पर

      प्रेमचंद भारतीय समाज, राजनीति, जीवन-दर्शन और  इतिहास  के व्याख्याता हैं. जो देश उनके सामने था , उसकी मिट्टी के कण-कण से निकलती देसी गंध से वह परिचित थे. वह भांप सकते थे कि बैलों के घुंघरुओं से निकलने वाली आवाज़ों का क्या मतलब है? सुरमई सांझ को बस्ती से आकाश की ओर  उठने वाले धुएं के झुंड किन सांझे चूल्हों से उठ रहे हैं. गाँव के कच्चे गलियारों की नमी किन बड़े गलियारों को कीचड और पुरूओं की पहचान करा  रही है. किस बनिए के बहीखातों पर कमज़ोर किसान का भविष्य लिखा जा रहा है.

      वह हवा की सांसों पर कान रखकर मालूम कर लेते थे कि कौन सा मनचला युवक कीचड वाले पुरुवे की उठान वाली सांवली को पछाऊं स्थित चौकन्नी आँखों से गन्ने के खेत में ले जाकर झूठ बोल रहा है कि जल्दी खोल दे कि  हरिया का रेवड़ पगडंडी से गुजरने वाला है. पकडे गए तो मेरा कुछ नहीं होगा, प्रधान का बेटा  हूँ,  गांव की पंचायत के सामने तू हार जाएगी. यहां तो केवल मैं हूँ, जिसके आगे तू कपडे उतारेगी, भरी पंचायत के फैसले पर तो वहां गाँव होगा, गांव के सामने दंड भुगतने के लिए खड़ी होगी  नाले वाले पुलिया की नंगी छोरी। खोल... !

      प्रेमचंद ने भी अपने समय में ऐसे ही गांवों को चित्रित किया है. मैंने भी अपने समय के गांव को चित्रित कर  दिया है. आज भी सब वैसा ही तो है.
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*प्रेमचंद, चिट्ठी-पत्री , भाग -2,  पृ.2 40    
*प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ.44, 56, 27, 222, 17 

(प्रकाशनाधीन-ग्रन्थ 2018 : प्रेमचंद साहित्य : नव-मूल्यांकन'  लेखक -डॉ, रंजन ज़ैदी /से साभार )   
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