दुनिया की हर इबादतगाह की बुनियाद ज़मीन में होती है. उसी ज़मीन प़र बैठकर या खड़े होकर आम इंसान सिजदा करता है, पूजा-प्रार्थना करता है. ये प्रार्थनाएं, आराधनायें, इबादतें, आम इन्सान अपनी और इंसानियत की भलाई और सुरक्षा के लिये करता है. कुछ लोग उसी ज़मीन प़र खड़े होकर अहंकार की तलवार और हिंसा का भाला उठा लेते हैं. ज़मीन का बटवारा कर उसपर खड़े होकर गर्व करने लगते हैं. वह भूल जाते हैं कि जिस ज़मीन प़र वे खड़े हैं, उस ज़मीन के नीचे कोई ज़मीन नहीं है. जो ज़मीन बिना ज़मीन के हवा में घूम रही है और आधारहीन है, उसे इबादत के लिये न मंदिर की ज़रूरत है, न मस्जिद की. न गिरजे जी. न कलीसाओं की. न पंडित की, न मौलवी और पादरी की. वह जानती है कि जिस संसार को उसपर बसाया गया है, उसे जिंदा रखना है. इसी लिये वह सारी दुनिया की माँ है.लेकिन अपने स्वार्थवश इंसान अपनी माँ को भी बाटने लग जाता है जबकि इंसान जानता है कि वह खुद आधारहीन है. ज़मीन के टुकड़ों की जंगें शताब्दियों से लड़ी जा रही हैं. अयोध्या ने भी सैकड़ों आधारहीन जंगें देखी हैं. उसने देखा कि भगवान् कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया तो चमत्कार कहलाया, बाहुबली हनुमा...