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अप्रैल, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हुसैनी टाइगर्स ने किया था विधायक हसन अहमद पर हमला /रंजन ज़ैदी

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(दायें से बाएं) दिल्ली कांग्रेस के विधायक हसन अहमद, तथा कांग्रेस की नेता रीता बहुगुणा ल खनऊ की सियासत अब चौंकाने वाली हो गई है.       जबसे शिया मौलाना सैयद कल्बे-जव्वाद नक़वी ने कौम से बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह को समर्थन दिए जाने की अपील की थी, तभी से शिया समुदाय उनसे आँख बचाकर फ़ासला बनाता देखा जा रहा था. (अभी प्राप्त समाचार के अनुसार उन्होंने बीजेपी से समर्थन वापस लेकर अब आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन देने की खुली घोषणा कर दी है.)        समर्थन वापसी के पीछे के कारणों के समबन्ध में बताया जाता है कि इससे वोटों के ध्रुवीकरण की सम्भावना का खतरा बढ़ गया था. शिया-सुन्नी वोट भी विभाजित होते नज़र आ रहे थे.  इस सन्दर्भ में हाल में ही कैसरबाग़ स्थित होटल जेमनी कांटिनेंटल के काफी हाउस मैं घटी उस घटना को भी ज़िम्मेदार बताया जा रहा है जिसमे  मौलाना सैयद कल्बे-जव्वाद नक़वी के युवा समर्थक हुसैनी टाइगर्स  के वालंटियरों द्वारा अचानक दिल्ली कांग्रेस के विधायक और लखनऊ चुनाव के स्थानीय संयोजक हसन अहमद पर हमल...

एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है /रंजन ज़ैदी

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मु झे तब आश्चर्य होता है जब टीवी का जागरूक पत्रकार जानबूझकर अपने ऑडियंस के मुंह से कहलवाता है कि 'दिल्ली की केजरीवाल सरकार भगोड़ी थी.' मैंने एक रिक्शा-चालक से पूछा कि क्या तुम भी ऐसा ही सोचते हो? जवाब तुरंत मिलता है,'सरकार को चलने ही कहाँ दिया साब जी।  लेकिन एक बात तो है साब जी, केजरीवाल साब को लड़-भिड़कर भी सरकार तो चलानी ही चाहिए थी. है कि नहीं!' आम आदमी के विचार में दम था. केजरीवाल ने अब आकर स्वीकार किया है कि उनसे गलती हुई है. उन्हें इस स्वीकारोक्ति के गर्भ में तैरते उस वाक्य को भी पढ़ लेना चाहिए कि लम्हों की खता, सदियों को सजा दे जाती है. सरकार गिरे, यही तो प्रतिपक्ष चाहता था, भ्रष्टाचार का माफिया भी. अब दिल्ली में किसी को किसी से कोई खतरा नहीं है. बनारस में केजरीवाल पर इसीलिए अंडे फेंके गए. अंडे के पीछे की सोच का अनुमान लगाइये। स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद बनारस और संघ की लगभग सौ सैनिक इकाइयां  गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों  से अपने २० हज़ार कार्यकर्ताओं के साथ २४ अप्रैल से पूर्व ब...

अहमद बुखारी के कदम को सियासी नज़र से उचित नहीं ठहराया जा सकता.

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दिल्ली के शाही मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी  ख़ुत्बे की मुद्रा में .  o डॉ. रंजन ज़ैदी    /               ज ब भी कोई मुस्लिम ओलेमा अपने समुदाय या समाज व राजनीति में अपने हाथ आज़माने के लिए अपने रेशमी गिलाफ से बाहर निकलता है तो फंडामेंटलिस्ट चौकन्ने हो जाते हैं.            जब मुस्लिम नेता अपने समुदाय या समाज की मदद करना चाहता है तो उसे सांप्रदायिक कहा जाने लगता है. जब तठस्थ हिन्दू मुस्लिम समुदाय का समर्थन करता है तो उस पर तुष्टिकरण करने का आरोप लगाया जाने लगता है. ऐसे फंडामेंटलिस्ट नेता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को  मुल्ला मुलायम  तक कहने लग जाते हैं..यही है इस देश  की वर्तमान राजनीति का दुर्भाग्य जो २० करोड़ का आंकड़ा पार कर भी मुस्लमान अपने ही देश में सांप्रदायिक ताकतों का शिकार बनता चला जा रहा है और लोकतान्त्रिक ताकतें लगातार कमज़ोर होती जा रही हैं.        पिछले ...

जहालत का कोई मज़हब या फ़िरक़ा नहीं होता है.

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' सियासत में मज़हब का ज़िक्र नहीं आना चाहिए।' डॉ. रंजन ज़ैदी         लो क-सभा के चुनाव की गहमा-गहमी में मुस्लिम उलेमाओं ने भी अपनी उपस्थिति अथवा उपेक्षा की कीमत वसूलने में देरी नहीं की. लखनऊ की राजनीतिक स्थिति पर जब स्थानीय इस्लामिक मदरसा  मदर सा-ए- नाज़मीया के संस्थापक-प्रिंसिपल अल्लामा सैय्यद हमीदुल हसन से   alps t-politics   के वरिष्ठ संपादक ने पूछा कि क्या लखनऊ की सियासत का ध्रुवीकरण होना निश्चित है? जवाब था, ' सियासत में मज़हब का ज़िक्र नहीं आना चाहिए।' उन्होंने कहा,' लोग बिना मज़हबो मिल्लत के मुल्क कि लोकतान्त्रिक ताक़तों को मज़बूत बनाने में आगे आयें क्योंकि हम सभी लोग मिलकर एक अच्छी संसद बनाने जा रहे हैं.' जब उनसे दिल्ली में मौलाना  सैय्यद  कल्बे-जव्वाद नक़वी के प्रदर्शन का ज़िक्र किया गया तो उनका कहना था कि, 'इस समय इस तरह के मामलों में नहीं पड़ना चाहिए था.'             सुन्नी दर्सगाह के एक प्रबुद्ध बुद्धिजीवी   (नाम न दिए जाने की...

संघ मुस्लिम दुश्मनी-3 /रंजन ज़ैदी

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डॉ .  श्यामा   प्रसाद   मुखर्जी                 19 47   से 1951    के बीच   हिंदुस्तान   का   राजनीतिक   परिदृश्य   भी अपना   केंचुल   उतार   रहा   था .   संघ के नेता भी   साम , दाम ,  दंड , भेद   यानि ,  किसी भी रूप से कांग्रेस में जाने का मन बना   चुके थे कि तभी 1951 में ही डॉ . श्यामा प्रसाद मुखर्जी  के नेतृत्व में    ' जनसंघ ' का गठन किया गया जिसमें कई क्षुब्ध और कुंठित   कांग्रेसी नेताओं ने पाला    बदलकर जनसंघ   को ज्वाइन कर लिया।                पार्टी की    कमान संभालने के लिए संघ ने अपने   ही कुछ   संयोजकों   को   संगठन - मंत्री   नियुक्त किया जिनका काम था ,   मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध अनर्गल प्रचार करना , जमायतुल...

संघ की मुस्लिम दुश्मनी-2/-रंजन ज़ैदी

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  संघ   की    मुस्लिम   दुश्मनी  के   पीछे  कई  ऐतिहासिक   कारण  रहे  हैं .       अतीत के राजनीतिज्ञ : अरुण नेहरू और राजीव गांधी    व रिष्ठ समाजवादी नेता गोविन्द सहाय की मानें तो हम कह सकते हैं कि संघ की ढांचागत तकनीक और उसकी आतंरिक व्यवस्था तत्कालीन जर्मनी  की  नाज़ी-पार्टी  की  तकनीक और उसकी आतंरिक व्यवस्था  का भरतीय-संस्करण है. शायद ऐसा सुनने में कांग्रेसियों को बुरा लगे लेकिन यही सच है कि उस समय की कांग्रेस-नीतियां हिंदुत्व की नीतियों से बहुत प्रभावित थीं. सच यह भी है कि कांग्रेस को  संघ के इस ढांचे का पूरा पता रहता था. कांग्रेस, विश्व हिन्दूपरिषद  और संघ के नेताओं की मिलीभगत से ही कालांतर में  अयोध्या-विवाद को  दूरगामी रणनीति का हिस्सा बनाया गया. पड़ताल करें तो मंदिर विवाद के  भेद प्याज़ के छिलकों की तरह एक-एककर सामने आने लगेंगे। केएम मुंशी हों या अरुण नेहरू, राजीव गांधी ...