६५ वर्षों से ब्लू-प्रिंट पर निरंतर काम हो रहा है/रंजन ज़ैदी



             सवाल उठता है कि अतिवादी संघियों को मुसलमानों से नफरत क्यों है? उनकी कार्य-शैली से
साफ पता लग जाता है कि वे अलग-थलग अपनी ही कॉलोनियन-कल्चर में क्यों रहना चाहते हैं, क्यों मुस्लिम समुदाय से वे दूरी बनाकर रहने में गोलबंद हो जाते हैं? क्यों ऐसी राजनीतिक पार्टियों से कथित-घृणा करने लग जाते हैं जिनसे उन्हें लगता है कि वे मुस्लिम समुदाय को कुछ न कुछ लाभ पहुंचा सकते हैं. यह बेहद खतरनाक मानसिकता है जिसका समाज में पनपते रहने देना लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. इसीलिए मुस्लिम तुष्टिकरण के पीछे की मानसिकता को हमें अब समझना ज़रूरी हो गया है.
      आज की ज़रूरतों को देखते हुए यदि साधारण हिन्दू परिवार अपने मुस्लिम हितैषियों को किराये पर मकान देना चाहे तो परिस्थितिवश उसे अपने किरायेदार का नाम मुंशी प्रेमचंद रख लेने के लिए अनुरोध करना पड़ता है .सिने-व्यवसाय में युसूफ खान को दिलीप कुमार बनना पड़ जाता है, अब्दुल हई को जानीवाकर, जुनैत खान को जयंत और रज़ा को राजा. विदेशों में हमने ऐसी मानसिकता कहीं नहीं देखी ।
      हर कोई जनता है कि हर मुस्लमान दाढ़ी या टोपी वाला नहीं होता है. न ही टपोरियों जैसा दिखने वाला। न ही वह इतना गरीब, दया का मोहताज और अशिक्षित है कि फुटपाथ पर भीख मांगता नज़र आये. याद रहे कि उसने इस देश को गौरवशाली इतिहास दिया है, महान वैज्ञानिक, चिकित्सक, संगीतकार, गायक, शिक्षक, अन्वेषक, खिलाडी, दार्शनिक और पेंटर दिए हैं. लेकिन संघ उन्हें प्रकाश में नहीं लाना चाहता। वह इस समुदाय का नैतिक पतन देखना चाहता है और मीडिया उसके साथ है. मीडिया मुसलमानों को एक ऐसी क्रिमनल पहचान के साथ समाज में पेश करता है कि लोग डरने लग जाते हैं. सर पर गोल नक्शदार टोपी, होठों पर पान की लाली, गले में तावीज़, तहबंद, रंडियों के मोहल्ले में दलाली करने वाले दल्ले की कलाई में बंधा हुआ रंगीन रुमाल, जेबकतरा, अय्याश नवाब, नीलाम होती उसकी हवेलियां, मुस्लिम तवायफें। हिन्दू के घर में मुस्लमान बच्चे की परवरिश जो कलमा पढ़ते हुए जवान होता है. 
      आँख खोलकर हमने देखा-कि हमारी अगली पीढ़ी के युवा को अपढ़, गंवार, रेपिस्ट, सेंधमार, रामपुरी चाक़ू रखने वाला ६५ साल के भारत में अब बम फोड़ने वाला आतंकवादी बन दिया गया है. यह उस मुस्लिम  समुदाय की अचेतन में कुलबुलाती रहने वाली संघी छवि जिसने ऐसी दमित मानसिकता को खाद-पानी देकर इस तरह से जवान किया है उसने अब घर-घर में छोटे पर्दों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों की दुनिया से उसे गायब कर दिया है, उससे उसकी भाषा छीन ली है. समुदाय की संस्कृति दफन हो चुकी है और मुस्लिम परिवेश के सीरियलों को दिखाने पर अप्रत्यक्ष रूप से पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं. 
      देश जवान हो चुका है और संघ देश के करोङों मुस्लिम नौजवानों को अपना गुलाम बना देना चाहता है. वह नहीं चाहता है कि इस देश का मुस्लमान कभी भी इतना शक्तिशाली बने कि अपने पैरों पर खड़ा होकर अपने-आपमें आत्मविश्वास पैदा कर बिना संघियों के आगे हाथ फैलाये जी सके. संघी प्रयोगशालाओं में ६५ वर्षों से इस ब्लू-प्रिंट पर निरंतर काम हो रहा है. 
      इसीलिए उसके प्रभाव से मुस्लिम नौजवानों को आज़ादी के बाद से ही बैंकों से दूर रख दिया गया. सरकारी नौकरियों से वंचित कर दिया गया, निजी व्यापारों में उसके सामने अवरोध पैदा कर दिये गए, जहाँ भी वे अपने प्रयासों से पनपे, वहीं दंगे करा दिए गए. इज़ज़तदार बने तो पाकिस्तान का जासूस बना दिया गया. विरोध किया तो एनकाउंटर करवा दिया गया, हत्या करवा दी गई . आवाज़ बुलंदकर बराबर आने कि कोशिश की तो मुकददमों से लादकर उसे जेल में डाल दिया गया. उत्तर प्रदेश के पीएसी के दागदार इतिहास के पन्नों पर इतने ज़ुल्म दर्ज है कि रूह तक काँपने लग जाये।
      संघ ने नहीं सोचा कि जिन मुसलमानों को वह वर्षों से तबाह करने में लगा है, वे बौद्धों की तरह यहीं के हैं, सिक्खों की तरह ही हैं. जैसे खैबर के रास्ते से जाट-गूजर जैसी अन्य घुमंतू आदिवासी जातियां बाहर से इस देश में अपनी संस्कृति और पहनावे के साथ आयीं, वैसे ही नाइजेरिया, अफ्रीका, चीन, कबोडिया, लाओस, वेतनाम, कोरिया, मंगोल, बुखारा, समरकंद, काबुल, कंधहार, खुरासान, साइबेरिया के चरागाहों से, बगदाद, ईरान, मिस्र और अरब के अनेक इलाक़ों से कभी सेना के साथ तो कभी रोज़गार की तलाश में अपने परिवारों के साथ आईं और यहीं के धर्म अपनाकर यहीँ की हो गयीं। कन्वर्जन में लाभ देखा तो कन्वर्ट हो गयीं। इसमें इस्लाम कहीं भी अड़े नहीं आया.… [शेष जारी-----/2]      
NEXT (आइये देखें कि इस दुश्मनी के पीछे के कारण क्या रहे हैं.....)   
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