एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है /रंजन ज़ैदी
मुझे तब आश्चर्य होता है जब टीवी का जागरूक पत्रकार जानबूझकर अपने ऑडियंस के मुंह से कहलवाता है
कि 'दिल्ली की केजरीवाल सरकार भगोड़ी थी.'
मैंने एक रिक्शा-चालक से पूछा कि क्या तुम भी ऐसा ही सोचते हो?
जवाब तुरंत मिलता है,'सरकार को चलने ही कहाँ दिया साब जी। लेकिन एक बात तो है साब जी, केजरीवाल साब को लड़-भिड़कर भी सरकार तो चलानी ही चाहिए थी. है कि नहीं!'
आम आदमी के विचार में दम था. केजरीवाल ने अब आकर स्वीकार किया है कि उनसे गलती हुई है. उन्हें इस स्वीकारोक्ति के गर्भ में तैरते उस वाक्य को भी पढ़ लेना चाहिए कि लम्हों की खता, सदियों को सजा दे जाती है.
सरकार गिरे, यही तो प्रतिपक्ष चाहता था, भ्रष्टाचार का माफिया भी. अब दिल्ली में किसी को किसी से कोई खतरा नहीं है.
बनारस में केजरीवाल पर इसीलिए अंडे फेंके गए. अंडे के पीछे की सोच का अनुमान लगाइये। स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद बनारस और संघ की लगभग सौ सैनिक इकाइयां गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से अपने २० हज़ार कार्यकर्ताओं के साथ २४ अप्रैल से पूर्व बनारस में पहुँच जाएँगी।
बनारस, मोदी समर्थकों के लिए अब 'मान-सम्मान' का विषय बन चुका है. गंगा की सियासी-लहरों में तेज़ी आ चुकी है. कांग्रेस, यहां भी हताशा के झीने कुहासे के उसपार से मोदी को प्यार की नज़रों से देख रही है. उसका प्रतिनिधि जानता है कि मुख़्तार अंसारी बनारस के बुनकरों के मसीहा हैं, वोट केजरीवाल को जायेंगे। केजरीवाल, संसद पहुंचे तो बनारस के साथ नाइंसाफी नहीं हो सकेगी। नरेंद्र मोदी जीते तो बनारस के उद्द्योगों पर गुजरातियों का क़ब्ज़ा हो जायेगा। गुजरात को इस समय सस्ते हिन्दू मज़दूरों की ज़रुरत है. बनारस के स्थानीय उद्द्योगों के लिए गुजराती मालिकों को सस्ते हिन्दू-मुस्लिम मज़दूर वाराणसी-गेट से ही मिल सकते हैं. इसके लिए बड़ी जंग का मैदान ज़रूरी हो जाता है.
ऐसी ही एक जंग १७७० से पहले तक बनारस के हाकिम बलवंत सिंह को अवध के नवाब के साथ लड़नी पड़ी थी. अब बनारस के अधिकारों की लड़ाई विकल्प के रूप में अरविन्द केजरीवाल को लड़नी पड़ेगी क्योंकि यहां ईस्ट इंडिया कंपनी नया रूप लेकर प्यार बाँटने आ रही है ताकि वह स्थानीय बुनकरों के हाथ काट सके, सस्ते मज़दूरों से काम ले सके और ज़रुरत पड़ने पर गुजरात के शाहआलम कैम्पों की तरह यहाँ लगाये जाने वाले रहत कैम्पों को यह कहकर उजड़वा सके कि 'ये शिविर बच्चे पैदा करने की नर्सरियां नहीं हैं.'
मोदी के प्यार के इंतज़ार में शाहआलम कैम्प का एक-एक मुस्लमान आज भी पलकें बिछाए बैठा है. लेकिन उनका प्यार श्रीमती जसोदा बेन को भुलाकर बनारस की गंगा तक आ पहुंचा है जो अब तक बहुत मैली हो चुकी है. अब जातियों का संघर्ष धर्म के अधर्म-सैनिकों के बीच होना है. अब स्वर्गीय बलवंत सिह की रियासत की दावेदारी पर न तो हैत सिंह का दावा बन सकेगा, न ग्यारह तोपों वाले सैकुलर राजा प्रभु
नारायण सिंह का.
नई दावेदारी के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार बीजेपी के लिए लड़ रहा है, समाजवादी पार्टी नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए लड़ रही है, सुश्री मायावती अपनी जातिवादी अस्मिता के लिए लड़ रही हैं और मुख़्तार अंसारी बनारस के हितों को ध्यान में रखते हुए अरविन्द केजरीवाल के लिए लड़ रहे हैं. देखना यह है कि संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत बनारस की गंगा का पानी किसके गले में डाल पाते हैं, किसके नहीं। (एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है /रंजन ज़ैदी )
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http://alpst-politics.blogspot.com/alpsankhyaktimes94gzb.co/ranjanzaidi@yahoo.co.in/ +91 9350 934 63
कि 'दिल्ली की केजरीवाल सरकार भगोड़ी थी.'मैंने एक रिक्शा-चालक से पूछा कि क्या तुम भी ऐसा ही सोचते हो?
जवाब तुरंत मिलता है,'सरकार को चलने ही कहाँ दिया साब जी। लेकिन एक बात तो है साब जी, केजरीवाल साब को लड़-भिड़कर भी सरकार तो चलानी ही चाहिए थी. है कि नहीं!'
आम आदमी के विचार में दम था. केजरीवाल ने अब आकर स्वीकार किया है कि उनसे गलती हुई है. उन्हें इस स्वीकारोक्ति के गर्भ में तैरते उस वाक्य को भी पढ़ लेना चाहिए कि लम्हों की खता, सदियों को सजा दे जाती है.
सरकार गिरे, यही तो प्रतिपक्ष चाहता था, भ्रष्टाचार का माफिया भी. अब दिल्ली में किसी को किसी से कोई खतरा नहीं है.
बनारस में केजरीवाल पर इसीलिए अंडे फेंके गए. अंडे के पीछे की सोच का अनुमान लगाइये। स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद बनारस और संघ की लगभग सौ सैनिक इकाइयां गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से अपने २० हज़ार कार्यकर्ताओं के साथ २४ अप्रैल से पूर्व बनारस में पहुँच जाएँगी।
बनारस, मोदी समर्थकों के लिए अब 'मान-सम्मान' का विषय बन चुका है. गंगा की सियासी-लहरों में तेज़ी आ चुकी है. कांग्रेस, यहां भी हताशा के झीने कुहासे के उसपार से मोदी को प्यार की नज़रों से देख रही है. उसका प्रतिनिधि जानता है कि मुख़्तार अंसारी बनारस के बुनकरों के मसीहा हैं, वोट केजरीवाल को जायेंगे। केजरीवाल, संसद पहुंचे तो बनारस के साथ नाइंसाफी नहीं हो सकेगी। नरेंद्र मोदी जीते तो बनारस के उद्द्योगों पर गुजरातियों का क़ब्ज़ा हो जायेगा। गुजरात को इस समय सस्ते हिन्दू मज़दूरों की ज़रुरत है. बनारस के स्थानीय उद्द्योगों के लिए गुजराती मालिकों को सस्ते हिन्दू-मुस्लिम मज़दूर वाराणसी-गेट से ही मिल सकते हैं. इसके लिए बड़ी जंग का मैदान ज़रूरी हो जाता है.
ऐसी ही एक जंग १७७० से पहले तक बनारस के हाकिम बलवंत सिंह को अवध के नवाब के साथ लड़नी पड़ी थी. अब बनारस के अधिकारों की लड़ाई विकल्प के रूप में अरविन्द केजरीवाल को लड़नी पड़ेगी क्योंकि यहां ईस्ट इंडिया कंपनी नया रूप लेकर प्यार बाँटने आ रही है ताकि वह स्थानीय बुनकरों के हाथ काट सके, सस्ते मज़दूरों से काम ले सके और ज़रुरत पड़ने पर गुजरात के शाहआलम कैम्पों की तरह यहाँ लगाये जाने वाले रहत कैम्पों को यह कहकर उजड़वा सके कि 'ये शिविर बच्चे पैदा करने की नर्सरियां नहीं हैं.'
मोदी के प्यार के इंतज़ार में शाहआलम कैम्प का एक-एक मुस्लमान आज भी पलकें बिछाए बैठा है. लेकिन उनका प्यार श्रीमती जसोदा बेन को भुलाकर बनारस की गंगा तक आ पहुंचा है जो अब तक बहुत मैली हो चुकी है. अब जातियों का संघर्ष धर्म के अधर्म-सैनिकों के बीच होना है. अब स्वर्गीय बलवंत सिह की रियासत की दावेदारी पर न तो हैत सिंह का दावा बन सकेगा, न ग्यारह तोपों वाले सैकुलर राजा प्रभु
नारायण सिंह का.
नई दावेदारी के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार बीजेपी के लिए लड़ रहा है, समाजवादी पार्टी नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए लड़ रही है, सुश्री मायावती अपनी जातिवादी अस्मिता के लिए लड़ रही हैं और मुख़्तार अंसारी बनारस के हितों को ध्यान में रखते हुए अरविन्द केजरीवाल के लिए लड़ रहे हैं. देखना यह है कि संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत बनारस की गंगा का पानी किसके गले में डाल पाते हैं, किसके नहीं। (एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है /रंजन ज़ैदी )
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