अहमद बुखारी के कदम को सियासी नज़र से उचित नहीं ठहराया जा सकता.
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| दिल्ली के शाही मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ख़ुत्बे की मुद्रा में. |
जब भी कोई मुस्लिम ओलेमा अपने समुदाय या समाज व राजनीति में अपने हाथ आज़माने के लिए अपने रेशमी गिलाफ से बाहर निकलता है तो फंडामेंटलिस्ट चौकन्ने हो जाते हैं.
जब मुस्लिम नेता अपने समुदाय या समाज की मदद करना चाहता है तो उसे सांप्रदायिक कहा जाने लगता है. जब तठस्थ हिन्दू मुस्लिम समुदाय का समर्थन करता है तो उस पर तुष्टिकरण करने का आरोप लगाया जाने लगता है. ऐसे फंडामेंटलिस्ट नेता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम तक कहने लग जाते हैं..यही है इस देश की वर्तमान राजनीति का दुर्भाग्य जो २० करोड़ का आंकड़ा पार कर भी मुस्लमान अपने ही देश में सांप्रदायिक ताकतों का शिकार बनता चला जा रहा है और लोकतान्त्रिक ताकतें लगातार कमज़ोर होती जा रही हैं.
पिछले कुछ दिनों से ही समाजवादी पार्टी के मंत्री नेता मुहम्मद आज़म खां के विरुद्ध बायस्ड हिंदी मीडिया लगातार मनोवैज्ञानिक रूप से चीख-पुकार में व्यस्त है. उसे इस समय और कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा है।
शाही इमाम अहमद बुखारी ने जब से कांग्रेस के समर्थन में आवाज़ बुलंद की है, आकाश कव्वों के शोर से गूँज-गूँज उठा है. यहां, यदि देखा जाये तो अहमद बुखारी के इस कदम को सियासी नज़र से उचित नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि वह एक देश की ज़िम्मेदार क़ौम की नमाज़ों में पेशवाई करते हैं. जब पेशवा अपनी ज़ात्ती-कमज़ोरियों पर काबू नहीं रख पाता है, तब उसकी पेशवाई-इमामत संदेह के घेरे में आ जाती है. कांग्रेस को समर्थन देने के पीछे के स्वार्थ जब बेनक़ाब हुए तो अहमद बुखारी की सियासी नीयत भी देर तक छुपी नहीं रही. इससे कांग्रेस को कम, दिल्ली के मुसलिम अवाम को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा है।
सांध्य वीर अर्जुन के पूर्व संपादक पत्रकार अनीस अहमद खान का मानना है कि शाही इमाम का यह उनका अपना अधिकार है कि वह किस सियासी पार्टी को समर्थन देते हैं, किसे वोट देते हैं, किस सियासी पार्टी या नेता से मिलते हैं. उससे क्या डील करते हैं, उनका अपना 'ओरा' है. वह भी एक इंसान हैं. आसमान से नहीं उतरे है, आम नागरिक हैं और नागरिक होने के नाते समयानुसार आवश्यकता के तहत निर्णय भी बदलते रहने का उनका अपना अधिकार हो सकता है।
सवाल उठता है कि यदि अहमद बुखारी का कथित आह्वान मुस्लिम अवाम के लिए कांग्रेस को वोट देने का 'आह्वान' नहीं था, फ़तवा नहीं था, डिक्री मानें तो शायद वो भी न हो, तब कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को उनके समर्थन की क्यों ज़रुरत आ पड़ी, और वह मुस्लिम समुदाय से क्यों कांग्रेस को वोट देने की उनसे अपील कर बैठीं ?
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