संघ की मुस्लिम दुश्मनी-2/-रंजन ज़ैदी
संघ की मुस्लिम दुश्मनी के पीछे कई ऐतिहासिक कारण रहे हैं.
वरिष्ठ समाजवादी नेता गोविन्द सहाय की मानें तो हम कह सकते हैं कि संघ की ढांचागत तकनीक और उसकी आतंरिक व्यवस्था तत्कालीन जर्मनी की नाज़ी-पार्टी की तकनीक और उसकी आतंरिक व्यवस्था का भरतीय-संस्करण है. शायद ऐसा सुनने में कांग्रेसियों को बुरा लगे लेकिन यही सच है कि उस समय की कांग्रेस-नीतियां हिंदुत्व की नीतियों से बहुत प्रभावित थीं. सच यह भी है कि कांग्रेस को संघ के इस ढांचे का पूरा पता रहता था. कांग्रेस, विश्व हिन्दूपरिषद और संघ के नेताओं की मिलीभगत से ही कालांतर में अयोध्या-विवाद को दूरगामी रणनीति का हिस्सा बनाया गया. पड़ताल करें तो मंदिर विवाद के भेद प्याज़ के छिलकों की तरह एक-एककर सामने आने लगेंगे। केएम मुंशी हों या अरुण नेहरू, राजीव गांधी हों या नरसिंहा राव.… मंदिर विवाद की गर्म हवा इन्हें छोड़कर आगे नहीं बढ़ पाई. दुखद स्थिति यह है कि जो भी कभी इस गर्म खौलती हवा की परिधि में आया वह या तो झुलस गया, मर गया या बर्बाद हो गया. बर्बाद हो जाने वाले सारे पात्र हमारे सामने हैं.
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| अतीत के राजनीतिज्ञ : अरुण नेहरू और राजीव गांधी |
देश विभाजन के बाद से ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे शुरू हो चुके थे. यहाँ तक कि लखनऊ में भी शिया-सुन्नी दंगों का एक सिलसिला शुरू कर दिया गया था. हिन्दू पुनरुत्थानवाद की भावना ने साम्प्रदायिकता को मुद्दों के साथ हवा दी.
उन दिनों सुगतदास गुप्त द्वारा लिखे गए एक लेख 'एक नई राजनीतिक व्यवस्था' में मुस्लिम हताशा पर अपना दर्द उंडेलते हए लिखा गया था कि 'आज (देश के विभाजन के बाद) भारतीय मुस्लमान अलग-अलग और निराश पड़ा है.' पुनरुत्थानवादी हिंदुओं ने इस बेचारगी का लाभ उठाते हुए प्रचारित करना शुरू किया कि भारत के अधिकांश मुस्लमान पाकिस्तान के जासूस और वहाँ की सेना के पंचगामी हैं.' इसका हिंदुस्तान के मुसलमानों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा और मनोवैज्ञानिक दबाव से प्रभावित हो वे पाकिस्तान के रेडिओ तक सुनने से कतराने लगे.
अतिवादी हिंदुओं ने मुस्लिम समुदाय के बीच बढ़ने वाले शक और घृणा जैसे तत्वों को सुनियोजित ढंग से अपने अभियान का हिस्सा बनाकर विधिवत रूप से चलाना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जाने-माने कथित राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं और राज्य व केंद्र में कार्यरत उच्च-सरकारी अधिकारियों की ओर भी शक की सूई बढ़ने लगी.
वास्तविकता यह थी कि विभाजन के दौरान हिंदुस्तान से लगभग एक करोड़ से भी अधिक मुसलमान अपनी जड़ों से उखड़कर अजनबी देश में जाकर बस गया था. सरहद पार से भी इतने ही लोग अपनी जड़ों से उखड़कर हिंदुस्तान में आ गए थे. यहाँ आकर बसने का संघर्ष सांप्रदायिक दंगों के रूप में परिवर्तित हो गया लेकिन हम यहाँ उसे बवंडर कहकर तत्कालीन परिस्थियों की देन कह सकते हैं. क्योंकि उस तरह के दंगों को सेना, पुलिस और प्रशासन ने बहुत जल्द काबू में कर लिया था लेकिन जो पुनरुत्थानवादी विचारधारा की मानसिकता संघी-ढांचे में फँस चुकी थी, उस पर काबू पाना आसान काम नहीं था.
ऐसे में दंगों का भड़कना मेरी दृष्टि में स्वाभाविक ही था. यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि सांप्रदायिक दंगे मात्र दो समुदायों के बीच का विषय बनकर रह गया था. इसमें देश की अन्य जातियों की कहीं भी और कोई भी भूमिका नहीं देखी जा सकती है. जैसे 200 वर्षों तक यह देश अंग्रेज़ों की हिंसा, शोषण और उनके अत्याचारों का शिकार रहा, ईसाई मिशनरियों ने थोक के भाव में देश की पिछड़ी जातियों को कन्वर्ट कर उन्हें ईसाई बनाया। इसके बावजूद अतिवादी हिन्दू संगठनों ने पूरे प्रकरण में कभी या कहें भी उन्हें अपने दंगों का शिकार नहीं बनाया। इसमें पारसी भी थे, कुछ दूसरी जातियां भी थीं.
इस माहौल को और प्रदूषित करने में तत्कालीन मौलाना मौदूदी की जमात जमाते-इस्लामी को भी बेदाग नहीं छोड़ा जा सकता है. क्योंकि उसी ज़माने में मौलाना मौदूदी ने उस नाज़ुक दौर (जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया ही था,) के हिंदुस्तान में मुसलमानों को अपना नया संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया था और कहा था कि वे एक हो जाएँ।
शायद ऐसे में ही संघ ने हिन्दू राष्ट्रवाद की भावना भड़काकर हिंदुओं के बीच नारा लगाया था कि यह देश हिंदुओं का है. इस देश की राष्ट्रीय-संस्कृति हिंदुओं की है और उग्र-हिन्दूराष्ट्रवाद में मुस्लिम-समुदाय भारतीय समाज की मुख्यधारा में नहीं स्वीकार किया जायेगा। इस आह्वान ने हिन्दू बहुल देश को प्रभावित किया और देश का मुस्लिम नौजवान संघ-प्रभावित पुनरुत्थानवादी राज्य व केंद्र की लाभकारी योजनाओं और सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया।
बाद में सैकुलर शब्द जैसे थोथे नारे ने साबित कर दिया कि सांप्रदायिक मानसिकता के अनेक नाम और रूप समय-समय पर परिभाषित होते रहे है, आगे भी होते रहेंगे। (जारी ..../ -3)
[Next -1969-70 में जनसंघ ने मुसलमानों को करीब आने दिया। अटल जी ने उत्तर परदेश में उर्दू को राज्य की दूसरी भाषा का दर्ज दिलाने की वकालत की जबकि ५ वर्ष पूर्व जनसंघ ने मुसलमानों को पाकिस्तानी एजेंट तक कहा था.…]
www.samagravichar.in, http://alpsankhyaktimes94gzb.com, http://ranjanzaidi786@yahoo.com/ +91 9350 934 635 उन दिनों सुगतदास गुप्त द्वारा लिखे गए एक लेख 'एक नई राजनीतिक व्यवस्था' में मुस्लिम हताशा पर अपना दर्द उंडेलते हए लिखा गया था कि 'आज (देश के विभाजन के बाद) भारतीय मुस्लमान अलग-अलग और निराश पड़ा है.' पुनरुत्थानवादी हिंदुओं ने इस बेचारगी का लाभ उठाते हुए प्रचारित करना शुरू किया कि भारत के अधिकांश मुस्लमान पाकिस्तान के जासूस और वहाँ की सेना के पंचगामी हैं.' इसका हिंदुस्तान के मुसलमानों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा और मनोवैज्ञानिक दबाव से प्रभावित हो वे पाकिस्तान के रेडिओ तक सुनने से कतराने लगे.
अतिवादी हिंदुओं ने मुस्लिम समुदाय के बीच बढ़ने वाले शक और घृणा जैसे तत्वों को सुनियोजित ढंग से अपने अभियान का हिस्सा बनाकर विधिवत रूप से चलाना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जाने-माने कथित राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं और राज्य व केंद्र में कार्यरत उच्च-सरकारी अधिकारियों की ओर भी शक की सूई बढ़ने लगी.
वास्तविकता यह थी कि विभाजन के दौरान हिंदुस्तान से लगभग एक करोड़ से भी अधिक मुसलमान अपनी जड़ों से उखड़कर अजनबी देश में जाकर बस गया था. सरहद पार से भी इतने ही लोग अपनी जड़ों से उखड़कर हिंदुस्तान में आ गए थे. यहाँ आकर बसने का संघर्ष सांप्रदायिक दंगों के रूप में परिवर्तित हो गया लेकिन हम यहाँ उसे बवंडर कहकर तत्कालीन परिस्थियों की देन कह सकते हैं. क्योंकि उस तरह के दंगों को सेना, पुलिस और प्रशासन ने बहुत जल्द काबू में कर लिया था लेकिन जो पुनरुत्थानवादी विचारधारा की मानसिकता संघी-ढांचे में फँस चुकी थी, उस पर काबू पाना आसान काम नहीं था.
ऐसे में दंगों का भड़कना मेरी दृष्टि में स्वाभाविक ही था. यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि सांप्रदायिक दंगे मात्र दो समुदायों के बीच का विषय बनकर रह गया था. इसमें देश की अन्य जातियों की कहीं भी और कोई भी भूमिका नहीं देखी जा सकती है. जैसे 200 वर्षों तक यह देश अंग्रेज़ों की हिंसा, शोषण और उनके अत्याचारों का शिकार रहा, ईसाई मिशनरियों ने थोक के भाव में देश की पिछड़ी जातियों को कन्वर्ट कर उन्हें ईसाई बनाया। इसके बावजूद अतिवादी हिन्दू संगठनों ने पूरे प्रकरण में कभी या कहें भी उन्हें अपने दंगों का शिकार नहीं बनाया। इसमें पारसी भी थे, कुछ दूसरी जातियां भी थीं.
इस माहौल को और प्रदूषित करने में तत्कालीन मौलाना मौदूदी की जमात जमाते-इस्लामी को भी बेदाग नहीं छोड़ा जा सकता है. क्योंकि उसी ज़माने में मौलाना मौदूदी ने उस नाज़ुक दौर (जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया ही था,) के हिंदुस्तान में मुसलमानों को अपना नया संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया था और कहा था कि वे एक हो जाएँ।
शायद ऐसे में ही संघ ने हिन्दू राष्ट्रवाद की भावना भड़काकर हिंदुओं के बीच नारा लगाया था कि यह देश हिंदुओं का है. इस देश की राष्ट्रीय-संस्कृति हिंदुओं की है और उग्र-हिन्दूराष्ट्रवाद में मुस्लिम-समुदाय भारतीय समाज की मुख्यधारा में नहीं स्वीकार किया जायेगा। इस आह्वान ने हिन्दू बहुल देश को प्रभावित किया और देश का मुस्लिम नौजवान संघ-प्रभावित पुनरुत्थानवादी राज्य व केंद्र की लाभकारी योजनाओं और सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया।
बाद में सैकुलर शब्द जैसे थोथे नारे ने साबित कर दिया कि सांप्रदायिक मानसिकता के अनेक नाम और रूप समय-समय पर परिभाषित होते रहे है, आगे भी होते रहेंगे। (जारी ..../ -3)
[Next -1969-70 में जनसंघ ने मुसलमानों को करीब आने दिया। अटल जी ने उत्तर परदेश में उर्दू को राज्य की दूसरी भाषा का दर्ज दिलाने की वकालत की जबकि ५ वर्ष पूर्व जनसंघ ने मुसलमानों को पाकिस्तानी एजेंट तक कहा था.…]


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