संघ मुस्लिम दुश्मनी-3 /रंजन ज़ैदी

डॉश्यामा प्रसाद मुखर्जी
               1947 से 1951  के बीच  हिंदुस्तान  का  राजनीतिक  परिदृश्य  भी अपना  केंचुल  उतार  रहा  था.  संघ के नेता भी साम, दामदंड, भेद  यानिकिसी भी रूप से कांग्रेस में जाने का मन बना चुके थे कि तभी 1951 में ही डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  के नेतृत्व में  'जनसंघ' का गठन किया गया जिसमें कई क्षुब्ध और कुंठित कांग्रेसी नेताओं ने पाला  बदलकर जनसंघ  को ज्वाइन कर लिया।
               पार्टी की  कमान संभालने के लिए संघ ने अपने  ही कुछ  संयोजकों  को संगठन-मंत्री  नियुक्त किया जिनका काम था,  मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध अनर्गल प्रचार करना, जमायतुल-उलेमा --हिन्द जैसी राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लेती रहने वाली मुस्लिम संस्थाओं को निशाना बनाना,  बड़े राष्ट्रीय  मुस्लिम नेताओं  के विरुद्ध प्रचार करना और समुदाय के बीच  घृणा  पैदा  कर  उन्हें  कभी  एकजुट    होने  देना  आदि.

              यहाँ एक बात महत्वपूर्ण यह है कि जनसंघ अब विश्व हिन्दू पार्षद के साथ मिलकर एक नई रणनीति पर काम करना चाहती थी जिसमें बड़े पैमाने पर जातिवादी ध्रुवीकरण होने की  संभावनाएं  देखी जा सकती थीं , लेकिन  उस  रणनीति  को  अमल  में  लाने के लिए  एक  मज़बूत  मंच  की  ज़रुरत  थी  जिसे  गौ-रक्षा महाभियान समिति  ने पूरा  कर  दिया।
     वरिष्ठ पत्रकार शम्भुनाथ शुक्ल अपने एक टिप्पण में संघ के जन्म की एक और ही कहानी सुनाते हैं. उनके अनुसार,'आरएसएस  के जन्म के पीछे की कहानी कोई मुस्लिम विरोध की नहीं है वरन् ‘’’गांधी’ विरोध की हैजिन चितपावन ब्राह्मणों के घरों में मुस्लिम लोगों से घरापा था, वे भला मुस्लिम विरोध की राजनीति क्यों करतेआप देखिए! सारे मराठा ब्राह्मणों के संबंध कभी भी मुसलमानों से खराब नहीं रहे। खुद सावरकर ने सबसे पहले मौलवी अहमद अली शाह उर्फ डंका शाह को स्थापित किया था। झांसी की गद्दी के एक हकदार ब्राह्मण गंगाधर राव के सौतेले भाई अली बहादुर मुस्लिम थे।      दरअसल बालगंगाधर तिलक की मृत्यु के बाद कांग्रेस जब मोहनदास कर्मचंद गांधी के हाथों में  गई और कांग्रेस के अंदर हरिजनों का प्रवेश शुरू हुआ तथा सत्ता में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाने लगी तो पूना के ब्राह्मणों में खलबली फैल गई और अचानक पूना और सतारा के मराठा शासकों तथा ब्राह्मण पेशवावंशियों के बीच खाई बढऩे लगी।      शाहूजी महाराज का पिछड़ी कही जाने वाली जातियों का साथ देना  तिलक का 'अलग राग' इस खटास से ही आरएसएस का गठन हुआ क्योंकि इसके पूर्व इतिहास में मराठा ब्राह्मणों और मुसलमानों के बीच बाकायदा शादी-विवाह हुआ करते थे।' 
       वरिष्ठ पत्रकार आगे बताते हैं कि 'जहां- जहां मराठे गए, कहीं भी उनका मकसद हिंदू राज कायम करने का नहीं था।.… गांधी ने उनकी इस जातीय चिंतन में व्यवधान डाला। इसलिए वे कांग्रेस से अलग हो गए और आरएसएस का गठन किया। आरएसएस को मारक  धारदार बनाने के लिए उसमें मुस्लिम विरोध की छौंक डाली गई वर्ना उनका असल विरोध तो गांधी के हरिजनोद्धार से था।... जहां तक आरएसएस के मुस्लिम विरोधी होने की बात है तो अखिल हिंदू समाज को साथ रखने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया।बस!'
       प्रबुद्ध पत्रकार के टिप्पण की सच्चाई को समझने के लिए हम सरदार पटेल द्वारा गोलवलकर को भेजे गए पत्र (11 सितम्बर,1948) से कुछ सार्थक जानकारी हासिल कर सकते हैं. (अभद्र भाषा का ज़िक्र न करते हुए) पटेल लिखते हैं कि '.…उनके (संघियों के) समस्त भाषण सांप्रदायिक विष से परिपूर्ण हैं। हिंदुओं को भड़काने तथा अपनी रक्षा के लिए संगठित होने के लिए उनमें ज़हर फैलाना आवश्यक था? इस ज़हर का नतीजा यह हुआ कि देश को गांधी जी के अमूल्य जीवन का बलिदान करना पड़ा. (शब्दों को डिलीट कर आगे.…) गांधी जी की मृत्यु के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके लोगों ने खुशियां मनाईं और मिठाइयां बांटीं?' 
       संघ का विष-वमन इस हद तक बढ़ा कि संघी खुले आम व्यंग्य करते सुने गए कि शायद नेहरू जी हिन्दू परिवार में नहीं, मुस्लमान या ईसाई परिवार में पैदा हुए थे, श्रीमती गांधी के चरित्र पर लांछन लगाये गए. नेहरू परिवार तब से आजतक संघ के विषवमन का शिकार बना हुआ है. कारण यह कि नेहरू के राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम बुद्धिजीवियों और नेताओं से गहरे रिश्ते थे और उनके विजन में खुलापन व प्रगतिशीलता का अहसास होता था जबकि संघियों में पुनरुत्थानवादी विचारधारा गहरे तक अपनी पैठ जमाये हुए थी.
       इसी विचारधारा के गर्भ से गौ-रक्षा महाभियान समिति को जन्म देकर एक नए आंदोलन की शुरुआत की गई जिसके भावी नतीजों ने संघ को एक और प्रयोग करने का अवसर प्रदान कर दिया। (जारी…/-4 )       
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