इस देश में कानून से डरता ही कौन है?/
इस देश में कानून से डरता ही कौन है? डॉo रंजन जैदी मैँने कल मेडिकल की छात्रा की मौत पर सारे देश में पैदा आक्रोश को महसूस करते हुए कहा था कि वह जिस इंक़लाब की ज़मीन में बीज बनकर गुम हुई है, उसके अंकुर अब फूट पड़े हैं। इंक़लाब बेकार नहीं जाते, वे इतिहास के नए पन्नों को जन्म देते हैं। इतिहास को अपने समय के अवाम बनाते हैं और सरकारें उनका विरोध करती हैं। आगे भी ऐसा ही होगा। हम जिस कानून को बनाने की बात कर रहे हैं, दरअसल उसकी रफ़्तार बहुत सुस्त है। देश में कानून का डर नहीं है, यह बात हरकोई जनता है। ट्रेफिक-पोलिस के अफसर और कांस्टेबिल कमाऊ-पूत कहे जाते हैं। उनसे किसी भी तरह के सुधार की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। इस देश की ट्रेडिशनल पोलिस को अंग्रेजों के ज़माने से ही पैसे की ज़रुरत सताती रहती हैं। इसीलिए इससे सोशल रिफार्म और इज्ज़त की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। एकबार मैं, बोस और कमलेश्वर जी किसी की मदद के लिए एक पुलिस स्टेशन गए तो हवालदार ने पूछा, तू बोल, के करन वास्ते आया है। रपट लिखाड़ी है, 100 रुपया निकाड़ ....हम गए थे किस काम से, लौटे कौन सा काम लेकर। सीधी सी बात है, पोलि...