चुनाव अभी दूर हैं लेकिन प्रचार शुरू हो चुका है /डॉ. रंजन ज़ैदी
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| मायावती- अन्ना की पार्टी मुझे पीएम ज़रूर बनाएगी |
उनके प्रचारक इस प्रचार
में व्यस्त हो
गए हैं कि
बीजेपी और कांग्रेस
आगामी लोकसभा के
चुनाव में सरकार
नहीं बना पायेगी
और न ही
तीसरा फ्रंट. बीजेपी की आतंरिक कलह
अडवानी को सत्ता के शीर्ष प़र नहीं पहुँचने देगी और गुजरात में नरेन्द्र मोदी का सितारा
डूबने के करीब है.
तब चाल
यह समझ में
आई कि गैर
कांग्रेसी और गैर
भाजपाई नेतृत्व का इशारा
किसकी ओर है
और उससे भविष्य
के रिश्ते कैसे
बन सकते हैं.
इस रणनीति में
राजनीतिक लड़ाई के दौरान
इस्तेमाल किया गया यह
चिंतन एक ऐसा
सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक ड्रोन है जो
अपनी मारक क्षमता
का प्रदर्शन कर
सही सलामत घर
लौट आयेगा.
ब्लॉग ने सन्देश
यह दिया कि मतदाता
राजनीतिक-स्थायित्व के समीकरणों
को ध्यान में
रखकर केंद्र में
ऐसी पार्टी के
हाथों में सत्ता
सौंपे जो कांग्रेस
को किसी न
किसी रूप में
नापसंद करता हो और
बीजेपी बहुजन समाजवादी पार्टी
गठबंधन को ख़ारिज
न करे.
मायावती
दलित समाज
से हैं और
गैर कांग्रेसी व
गैर भाजपाई होने
के कारण उन्हें
किसी भी दल
के साथ समझौता
करने में एतराज़
नहीं होगा. आगामी
चुनाव में उनका
समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता
है. एंडीए घटक
दलों से समर्थन
लेकर सत्ता पर
कब्ज़ा कर लेने
में भी उन्हें
कोई संकोच नहीं
होगा क्योंकि उनके
पास कोई राजनीतिक
विचारधारा नहीं है.
समाजवादी पार्टी अभी राष्ट्रीय
स्तर प़र बहुत
कमज़ोर है. उत्तर
प्रदेश में ही
उसे आने वाले
समय में अनेक
राजनीतिक चुनौतियों का सामना
करना होगा. इसलिए
आगामी लोकसभा के
चुनाव में बीजेपी
बहुमत में न
आने के कारण
मायावती को सशर्त
समर्थन दे सकती
है.
अब, अडवाणी के ब्लॉग
की राजनीति में
सवाल यह उठाया
गया है कि
क्या देश का
मतदाता केंद्र में अस्थिर
सरकार चाहता है?
क्योंकि कोलिशन सरकारें कभी
भी केंद्र को
मज़बूत सरकार देने
में सक्षम नहीं
रही हैं. इसके
लिये बीजेपी या
कांग्रेस का ही
मज़बूत होना ज़रूरी
है.
इधर,
कमज़ोर नेतृत्व के
कारण कांग्रेस का
जनाधार कमज़ोर हुआ है.
आम जानता प़र
मंहगाई का बोझ
बढ़ा है. न्याय-व्यवस्था के लचीले
व्यवहार से अपराध
का ग्राफ ऊंचाइयों
तक जा पहुंचा
है. भ्रष्टाचार ने
सारे रिकार्ड तोड़
दिए हैं. भ्रष्टाचारी
मुलजिमों को दण्डित
ही नहीं किया
जाता. इससे उनके
हौसले बुलंद रहते
हैं. आम धारणा
यह बनती है
कि राजनेता कानून
से ऊपर है
और आम जानता
माफिया की गिरफ्त
में हफ्ता देने
प़र मजबूर है.
उसके साथ इंसाफ
नहीं हो पा
रहा है.
ऐसे में आमजन
का वोट विकल्प
की ओर सरक
सकता है. विकल्प
के रूप में
अन्ना
हजारे
की पार्टी कोई
राजनीतिक समीकरण बना सकती
है. (हालाँकि अभी
इस मुद्दे प़र
कुछ कहना जल्दबाजी
होगी). अर्थ यह
हुआ कि वोटों
का विभाजन और
मनोवैज्ञानिक वैचारिक आक्रमण से
कमज़ोर होने जा
रही कांग्रेस का
पूरा लाभ बटोरने
के लिये बीजेपी
को कमर कस लेना
होगा. राजनीति के
बनते-बिगड़ते समीकरणों
के बीच कांग्रेस
के कमज़ोर होने
से बीजेपी खरीद-फरोख्त के गणित
से भी केंद्र
में सरकार बनाने
में कामियाब हो
सकती है जैसा
कि बीजेपी ने
अपने समय में
शिबू सोरेन को
६० लाख रूपये
देकर खरीदा था.
उदाहरण और भी
हैं.
मायावती भी एंडीए
के घटक दलों
का समर्थन पाकर
बीजेपी की मदद
से
सरकार बना सकती
है. हालाँकि शायद
अभी ये बात
लोगों के गले
न उतरे लेकिन
बीजेपी अपने परिदृश्य
को इसी रूप
में देख रही
है.
अतः, अडवाणी के ब्लॉग
के विवादित सन्देश
को सतही नहीं
लिया जाना चाहिए.
ब्लॉग-सन्देश बीजेपी के
धृतराष्ट्र द्वारा बिछाई गई
कूटनीति की
वो चौसर है
जिसमें अब ऐसे
ही ख़िलाड़ी खेल
खेल पायेंगें जिन्हें
ड्रोन-ड्राइव में
महारत हासिल हो.
इस चौसर प़र
न तो नितीश
कुमार आ पाएंगे
और न ही
नरेन्द्र मोदी, न ममता
और न ही
साऊथ की अम्मां.
लेकिन मैं यह
नहीं कह सकता
कि बीजेपी के
धृतराष्ट्र को राजनीति
की इतनी भी
समझ नहीं है
कि राजनीति में
की जाने वाली
भविष्यवाणी कभी सही
नहीं होती है..
इसमें कोई भी
बाज़ी रातों रात
पलट सकती है.
चुनाव अभी दूर
हैं लेकिन प्रचार
तो शुरू हो
ही चुका है.
contact: alpsankhyaktimes94gzb.com, +91 9350934635 Mail ID http://ranjanzaidi@yahoo.co.in/

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