टीम अन्ना में नेतृत्व का आभाव है /रंजन ज़ैदी


अन्ना हजारे मीडिया की चकाचौंध से अभी तक उबरे नहीं हैं। उन्हें अपने लोगों ने समझा दिया है कि अन्ना अपने दर-देहरी तक ही रहें क्योंकि वह 75 पार  कर चुके हैं और देश ने उन्हें अपना नेता मान लिया है।      
यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। बुद्धिमत्ता इसमें है कि अन्ना इस सम्मान  को सही तरीके से संभाल कर सहेजें। वह उस प्लास्टिक डोरी की जगह न लें जिसे पकड़ कर पर्वतारोही पहाड़ों पर चढ़ जाता है। उन्हें यह जान लेना चाहिए कि दुर्भाग्य से आज अपने ही देश में महात्मा गाँधी पोलिटिकल-प्रोडक्ट के रूप में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। अन्ना हजारे महात्मा गाँधी नहीं बन सकते लेकिन आज की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए वह एक पोलिटिकल-प्रोडक्ट अवश्य बन सकते हैं।    
टीम अन्ना ने उन्हें यह प्रोडक्ट बनने का अवसर दे दिया है लेकिन रालेगढ़ के निवासी शायद टीम अन्ना के इरादों को भांप गई है। वह जान गई है कि मुल्कों में इन्कलाब ऐसे नहीं आया करते। इन्कलाब के लिए ज़मीनें और फलसफे तैयार तैयार किये जाते हैं, योजनाओं पर दिन-रात काम किया जाता है, और बुद्धिजीवियों को साथ में लिया जाता है।           
अन्ना की टीम के सदस्यों में कितने ऐसे लोग हैं जो आम जनता को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं? अरविन्द केजरीवाल में अपार क्षमताएं हैं। किन्तु उनमें भीड़ को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता नहीं है। किरण बेदी ने अन्ना के साथ रहकर अब इतनी पोजीशन बना ली है कि वह किसी भी समय बाबा रामदेव का समर्थन लेकर नई दिल्ली से चुनाव लड़ सकती हैं। दूसरे सदस्यों के संबंध में यहाँ टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
जिन्हें वास्तव में नेतृत्व करना चाहिए था वे परदे के पीछे बैठे तेल की धार देखते रहे। जब से टीम अन्ना ने राजनीती में आने की घोषणा की है, असंख्य लोग टीम अन्ना से जुड़ने, उसे पैसा देने और उसके समर्थन से चुनाव जीतने का भी दावा करने लगे हैं। क्या वे अन्ना के उस मुद्दे पर संसद या विधायिका में नया मोर्चा खोल सकेंगे?            
टीम अन्ना के एक सज्जन पान की दुकान पर पहुँच कर ग्राहकों को बार-बार देखते कि लोग उनकी उपस्थिति का नोटिस ले, एक ने पूछा भी कि भाई साहब, आप टीम अन्ना में हैं? उसने कालर  सही करते हुए संभल कर कहा, हाँ, हूँ तो। अब आपको 15 महीने बाद के विधान-सभा चुनाव में हमें वोट देना होगा।         
यानि, अन्ना का आन्दोलन उसे संसद या विधान सभा तक पहुँचाने की सीढ़ी मात्र है। ऐसे में स्पष्ट रूप से सोचा जा सकता है कि टीम अन्ना का असली उद्देश्य क्या रहा है?          
हो सकता है अरविन्द केजरीवाल का यह उद्देश्य न रहा हो, किन्तु अकेले अरविन्द केजरीवाल आन्दोलन को कामियाब नहीं बना सकते और जिन लोगों को टीम अन्ना का सदस्य कहा जाता है, उनमें नेतृत्व की क्षमता का ही आभाव है। इसलिए टीम अन्ना की राजनीती कालांतर में कोई गुल खिलाएगी, विश्वास से परे है।    
हाँ, इसके रास्ते से कुछ और महत्वाकांक्षी लोग दिल्ली विधान सभा में 15 महीने बाद अपनी तकदीर अवश्य बुलंद कर लेंगे, कुछ  राजनीतिक उद्योग में जोड़-तोड़ कर प्रवेश भी पा लेंगे और फिर पाला बदलकर किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी के सदस्य बन जायेंगे। राजनीती में ऐसा अक्सर होता है।         
लोकतान्त्रिक चुनावों का अपना एक अलग गणित होता है। इसके निम्रिकल्स आसानी से नहीं हल होते हैं। दिल्ली पर या तो बीजेपी राज करती है या कांग्रेस। 10% वोटरों पर बहुजन समाजवादी पार्टी अपना दावा पेश करती है, छोटे दलों के दावे अलग हैं। ऐसे में टीम अन्ना तकनीकी तौर पर भी चुनावी मैदान में कैसे उतर पायेगी, इस गणित का हल टीम अन्ना को देना होगा। क्योंकि यही गणित वर्षों से वोटर पढ़ते आ रहे हैं।   
अब सवाल यह पैदा होता है कि जो टीम विशाल आन्दोलन को नेतृत्व की ऊर्जा नहीं दे पाई, वह अपने ईमानदार, सक्षम और अन्ना-भक्त प्रतिनिधियों को संसद और विधान सभा में कैसे भेजने में समर्थ हो पायेगी? राष्ट्रीय परिपेक्ष में देखें तो हमें ऐसे लोगों की शिनाख्त के माप दंड जानने होंगे.             
मीडिया की सनसनी राजनीती को दिग्भ्रमित तो कर सकती है, उसे सही दिशा नहीं दे सकती। भीड़ और सेना में अंतर होता है। भीड़ दिशाहीन होती है, नेतृत्व उसे दिशा प्रदान करता है। सेना अनुशासित होकर युद्ध करती है, क्योंकि उसके पास कुशल नेतृत्व और स्पष्ट लक्ष्य होता है। अभी तक देखा यह गया है कि टीम अन्ना में नेतृत्व का आभाव है और लक्ष्य दिशाहीन। 
बाबा रामदेव के आन्दोलन के अपने लक्ष्य है, पहले वह भी अन्ना के साथ मिलकर अपने लक्ष्य को भेदना चाहते थे, बाद में उन्हें लगा कि अन्ना की टीम उन्हें लक्ष्य से दूर कर देगी तो ए वह एकला चलो रे की मुद्रा में आ गए और अब उनका परमप्रिय आचार्य चेला ज़मानत पर बाहर अगया है।       
बीजेपी हर स्थिति में संतुष्ट है. वह जानती है कि टीम अन्ना से उसे कोई बड़ा नुकसान नहीं हो पायेगा, समय ने साथ दिया तो टीम अन्ना के सदस्य भी उसकी राजनीती से बाहर नहीं जा सकेंगे।  alpsankhyaktimes94gzb.com,  Mob; +91 9350934635

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पुस्तक : इतिहास के झरोखे से ( 3 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

महाभारत युद्ध नहीं, एक युग था./ रंजन ज़ैदी

ज़मीं खा गयी आसमान कैसे-कैसे/रंजन ज़ैदी