पुस्तक : इतिहास के झरोखे से ( 3 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

पुराना किला
Recent Book/ History Past:  By Dr. Ranjan zaidi
गाहे-गाहे बाज़ ख्वां ईं क़िस्सपारीनह रा।   
(क़िस्सों को कभी-कभी दोहराते रहना चाहिए।)
गतांक से आगे@&a



    टर्किश गु़लाम ताजुद्दीन यल्दोज़ ने जब कुतुबुद्दीन को देखा तो वह उसे अपलक देखता रह गया। वह सोचने लगा] यही वह शख्स है जिसकी तकदीर में उसकी बेटी की जन्नत लिखी हुई है। बस] उसकी शादी होने की देर है। किस्मत ने साथ दिया] बेटी की कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ शादी हो गई। 
      सितारे बदले तो कुतुबुद्दीन की बहन का विवाह सिंध के गवर्नर नासिरुद्दीन क़बाचा से तथा आगे जाकर ऐबक की अपनी बेटी की शादी बिहार के तत्कालीन गवर्नर शम्सुद्दीन अल्तमश के साथ हुई। बहनोई और दामाद दोनों ही मूलतः गुलाम वंश से सम्बंध रखते थे।                       
      दिल्ली फ़तह के बाद सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुगलों के बर्बर आक्रमण की संभावनाओं को देखते हुए शीघ्र ही शहर को बुलंद दीवारों] फ़सीलों] लोहे के मज़बूत दरवाज़ों] चोबदरवाज़ों और सैनिक&चौकियों से घेर दिया ताकि दिल्ली के अवाम को मुग़लों के हमलों से बचाया जा सके। इसके बावजूद मुग़लों की सेनाएं खैबर दर्रे को पारकर 1241 में लाहौर तक पहुंचने में कामियाब हो गईं। वहां से 1245-1329 - के बीच मुगलों ने हिन्दुस्तान पर 16 बार हमले किये लेकिन उन्हं हर हमले में पराजय का मुंह देखना पड़ा।    
    
जहाँ हज़रत ख्वाजा बख्तियार काकी उवैसी दफन है
  कुतुबुद्दीन ऐबक  ने अपने शासन काल से पूर्व 1198 - में दिल्ली स्थित भव्य और सुन्दर क़ूव्वतुल-इस्लाम नामक मस्जिद तथा विश्व प्रसिद्ध कुतुब मीनार के निर्माण की बुनियाद डाली जिसे उसके दामाद सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने दिल्ली के अपने शासनकाल के दौरान पूरा कराया। कुतुब मीनार अपने आप में बहुत सी इमारतों के प्रतीक के रूप में बनवाया गया था जिसका नाम वहीं पास में दफ्न हज़रत ख्वाजा बख्तियार काकी उवैसी के नाम पर रखा गया। 
        गुलाम वंश के दस शासकों ने दिल्ली पर कुल 81 वर्ष तक शासन किया जिनमें तीन शासकों की हत्याएं भी हुईं।  इन सभी बादशाहों के पैतृक देश टर्की था। 1210- में चौगान 'पोलो' खेलते हुए कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से ऐसा गिरा कि फिर कभी उठकर खड़ा नहीं हो सका। लाहौर में ही उसकी मृत्यु हो गई। ऐबक का मकबरा आज भी लाहौर स्थित अनार कली बाज़ार के निकट ऐबक रोड पर  अवस्थित है। भारत स्थित कुतुब मीनार क्षेत्र में जो कुतुबुद्दीन ऐबक की कब्र बताई जाती है- वह ऐतिहासिक जानकारी सही नहीं है।          
      कुतुबुद्दीन ऐबक के देहावसान के बाद उसके उत्तराधिकारियों में उसका बेटा आराम शाह दिल्ली के तख्त पर बैठा तो ऐबक के साथ काम करते रहने वाले उसके वफ़ादार और योग्य उच्चाधिकारी किसी गहरी चिंता में डूब गये। कारण यह था कि आराम शाह को सल्तनत में कोई रुचि नहीं थी। वह एक आराम-तलब बादशाह बने रहना चाहता था। उसकी इस छवि और सत्ता के प्रति गहरी उदासी को भांपकर गुलाम-वंश के दबे&कुचले शत्रु एक&एक कर बिलों से बाहर निकलने लगे। उनमें से अनेक शत्रु राजनीति के पैंतरे चलते हुए मित्र की खाल ओढ़कर सुल्तान के निकट पहुंचने लगे। इससे हुआ यह कि सुल्तान के मुंह से निकली हुई बात हुक्मे&बादशाही बनती गई और बादशाहत का सिक्का बादशाह के होने की ज़मानत बनता चला गया। अमीर-उमरा अपमानित होने लगे तो खबर शम्सुद्दीन अल्तमश तक जा पहुंची।                                      
     उन दिनों आगे जाकर होने वाला बादशाह अल्तमश आज के जिला बदायूं का गवर्नर हुआ करता था। खबर सुनते ही उसने सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच किया और लगातार यात्रा कर जब वह दिल्ली पहुंचा तो दरबारे&शाही ने विरोध कर खुले दिल से उसका स्वागत किया। इससे उसे सुल्तान आराम शाह को गद्दी से उतारने में आसानी हुई और उसने दिल्ली के सिंहासन पर स्वतः ही कब्जा कर लिया।       
      परम्परा के अंतर्गत तख्त पर बैठने से पूर्व नये बादशाह को दरबार कीे सर्वोच्च सुरक्षा सलाहकार
पुरानी दिल्ली-मेहरौली स्थित क़ुतुब मीनार
समिति के सदस्यों द्वारा संस्तुति लेनी ज़रूरी समझी जाती थी। गुलाम] सिंहासन पर तभी नये बादशाह का ताज पहन सकता है जब बादशाह ने मृत्यु से पूर्व लिखित रूप से उसे स्वतंत्र कर दिया हो। उन दिनों सर्वोच्च सुरक्षा सलाहकार समिति के अध्यक्ष क़ाज़िये&शहर वजीहउद्दीन काशानी थे। अपने सभी सदस्यों के साथ जब वह दरबारे&खास में पहुंचे तो देखा] अल्तमश तख्त पर बैठा है।     
     
      क़ाज़िये-शहर वजीहउद्दीन काशानी ने खड़े होकर एतराज़ किया तो नये बादशाह ने स्वर्गीय सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के लिखे पत्र को वजीहउद्दीन काशानी के सामने बढ़ा दिया- कहा *हम जानते थे कि हमारे सामने सह सवाल ज़रूर आयेगा। इसलिए इस सनद को हमने हिफ़ाज़त से रखा और आज हम इसे आपके सामने पेश कर रहे हैं।*   
      सनद देखकर सलाहकार समिति के अध्यक्ष क़ाज़िये-शहर वजीहउद्दीन काशानी ने उन्हें तख्त पर बैठने की औपचारिक अनुमति प्रदान की और अल्तमश बादशाह घोषित हो गया। उसने देश पर 25 वर्षों तक निर्भीक होकर राज्य किया लेकिन उन 25 वर्षाें में बादशाह अल्तमश ने उस समय तक चैन की नींद नहीं ली जब तक आराम शाह को उसने अपने रास्ते से निकाल नहीं दिया। आराम शाह के हितैषी उसे आयेदिन बग़ावत करने के लिए उकसाते रहते थे जिससे प्रशासन को अनेक कठिनाइयों का समना करना पड़ता था। जब बादशाह ने आराम शाह को अपने रास्ते से सदैव के लिए हटा दिया तो उसके हितैषी भी हमेशा के लिए गायब हो गये।                   
      बादशाह अल्तमश ने दिल्ली के नागरिकों के पीने के पानी की स्थाई व्यवस्था के लिए दो बड़े हौज़ों का निर्माण करवाया था जिसका वर्णन यात्री इब्ने बतूता ने अपने यात्रा संस्मरण में भी किया है। उनके नाम हौज़ खास और हौज़ शम्सी थे जिनके प्रमाण आज भी अवस्थित हैं। हौज़ शम्सी की लम्बाई 21 मील थी। कीमती सफ़ेद पत्थरों के चबूतरे- चबूतरे से लगी तह तक जाती सफेद संगेमरमर की सीढ़ियां थीं और चबूतरों के कोनों पर बुर्ज भी जहां वर्षा के मौसम में हौज़ के भरते ही पिकनिक पर आते रहने वाले नागरिक नावों से अपने परिवारों के साथ आनंद लेते थे। बुर्जों के अन्दर मस्जिद और हुजरे भी हुआ करते थे जहां फ़कीर- दरवेश और नमाज़ी विश्राम करते दिखाई देते थे। उनके पास की ज़मीन पर वही लोग खरबूज़े उगाते और यात्रियों को भी खिलाते थे।
       हौज़ श्म्सी से कुछ ही दूरी पर इससे भी बड़ा एक औऱ हौज़ था] हौज़-खास जिसमें 40 बुर्जों का इस्तेमाल किया गया था। इसके इर्द&गिर्द पटियाला की कंचन और देश के दूसरे इलाकों से लाई गई कई और तरह की नस्लों की वेश्याएं आबाद थीं जिन्हें दिल्ली वाले अदब से अहले&तरब कहते थे। मूलतः इस इलाके में रहने वाली वेश्याओं को डोमनी और इनके आदमियों को डोम कहा जाता था।
    डोमनियां गाने-बजाने का काम करती थीं और डोम उनका साथ देते थे लेकिन वे पक्के नमाज़ी होते थे। नमाज़ के समय वह मस्जिदों में होते और अपने ही इमाम के पीछे खड़े होकर नमाज़ें अदा करते थे। उनके मुहल्ले में मस्जिदों की संख्या कम नहीं थी। इस क्षेत्र को मुहल्ला तरबाबाद कहा जाता था। कालांतर में यही इलाका जीबी रोड के नाम से जाना जाने लगा।
      इब्ने बतूता यात्रा-संस्मरण में लिखता है कि एक बार उसे अहले&तरब के किसी लड़के की शादी में शिरकत करने का अवसर मिला तो देखा कि अज़ान सुनते ही स्त्री&पुरुष] लड़के-लड़कियां और औरतें] सभी नमाज़ पढ़ने के लिए मुहल्ले की मस्जिदों और अपने घरों के मुसल्लों पर पहुंचकर नमाज़ पढ़ने लगे।       
      शहज़ादी रज़िया सुल्तान बादशाह अल्तमश की बेटी और भाई कुुतुबुद्दीन की इकलौती बहन थी। बादशाह की पहली पत्नी ने (जो तुर्क नस्ल की दासी थी) पति के देहावसान के बाद उसने अपने पुत्र रुकनुद्दीन को सिंहासन पर बिठाया] क्योंकि वह बादशाह का बड़ा बेटा था। यह बात और है कि वह अपने अल्प शासनकाल में एक अयोग्य सुल्तान सिद्ध हुआ। सुल्तान रुकनुद्दीन ने अपनी इर्ष्यालु मां के कहने पर अपने भाइयों की हत्याएं करवाईं जिनमें कुुतुबुद्दीन भी शामिल था। रज़िया सुल्तान को इन हत्याओं से गहरा सदमा पहुंचा था। समूचे राज्य में मां&बेटे के आतंक से आहत अवाम दोनों से मुक्ति चाहते थे। रज़िया सुल्तान ने अवाम की नब्ज़ पहचानते ही सुल्तान रुकनुद्दीन को सिंहासन से पद्च्युत कर दिया और उसकी मां के साथ उसे भी गिरफ़तार कर जेल में डाल दिया जहां 1237 - में उसकी मृत्यु हो गई।   
 बादशाह इल्तुततमिश का मक़बरा
     रज़िया सुल्तान ने दिल्ली के तख्त पर बैठते ही राज्य&प्रशासन को चुस्त&दुरुस्त कर देश की सीमाओं की मज़बूत पहरेदारी सुनिश्चित की और उन विद्रोहों को सख्ती से कुचलना शुरू किया जो यह समझकर आन्दोलित हो उठे थे कि केंद्र में एक लड़की सुल्तान बनी है जिसे आसानी से गद्दी से हटाकर हुकूमत का तख्ता- पलटा जा सकता है लेकिन यह उनकी भूल थी। अल्तमश ने रज़िया सुल्तान को अपने शासनकाल में ही इतना प्रशिक्षित और योग्य प्रशासक सैनिक बना दिया था कि उसे सत्ता से पद्च्युत करना आसान नहीं था। उसने अपने पिता की अनुपस्थिति में 5&6 वर्ष तक राज्य का प्रशासन अपने हाथ में लेकर कुशलतापूर्वक चलाते हुए अपनी योग्यता के बल पर अपनी पहचान बनाई थी। शासक के रूप् में उसने राज्य में अनेक सुधारात्मक योजनाओं को लागू कर अपनी सेना का पुनर्गठन
किया और अपने नाम से पहले सुल्तान की उपाधि लगवाई। इतिहासकार फ़िरिश्ता ने भी उसकी प्रशासनिक क्षमता और एक योग्य सुल्तान होने की प्रशंसा की है।         
      इस सब के बावजूद रज़िया सुल्तान का सिंहासन कांटों से भरा हुआ था। सीमाएं बाहरी हमलावरों से असुरक्षित थीं। आंतरिक बग़ावतें भी बढ़ती जा रही थीं। हुकूमत में भी अमीर&उमरा एक स्त्री को अपना हाकिम कहने में झिझकते थे। वे चाहते थे कि कोई विकल्प सामने आये। इस उधेड़बुन में महल और हवेलियां आंतरिक षड्यंत्रों और देश के शहर गृह&युद्धों के शिकार होने लगे। दिल्ली का सिंहासन खतरे में पड़ता दिखाई देने लगा।    
      देश में बगावत की आग तब और भड़क उठी जब हबश के गुलाम जमालुद्दीन याकूत मीर आखोर को रज़िया सुल्तान ने अमीरुल उमरा की उपाधि से अलंकृत किया। मीर आखोर उस व्यक्ति को कहा जाता है जो शाही महल के अस्तबल की देख-रेख करता है। याकूत को जब हुकूमत की सर्वश्रेष्ठ उपाधि अमीरुल&उमरा से सम्मानित किया गया तो अवाम को समझने में देर नहीं लगी कि रज़िया सुल्तान याकूत के इश्क में गिरफ़तार है।
      इश्क इतना बढ़ा कि याकूत रज़िया की मेहरबानी से घुड़सवार सेना का सेनापति तक बन गया। अब एक गैर&तुर्क गुलाम हबशी रज़िया के दरबारे&खास में अमीर&उमरा और दरबारे&अहद के उच्चतम अमीरों] सरदारों प्रशासनिक सलाहकारों के बराबर बैठने का अधिकार रखता था। यही गैर&बराबरी का अहसास रज़िया सुल्तान के पतन का कारण बन गया।                                    जारी@&4     
*सर्वाधिकार लेखकाधीन


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