पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 6 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी
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| सुल्तान इब्राहीम लोदी |
'आग जंगल
में रास्ता दिखाती
है और तलवार
सीमाओं का विस्तारकरती है।'
पुस्तक : इतिहास के
झरोखे से-( 6 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी
मुग़लों के लगातार
हमलों ने दिल्ली
के अत्यंत सुरक्षित
किलों की दीवारें
भी दरका दीं
थीं। हमलों की
शुरुआत चंगेज़ खान के
हमलों से हुई
थी। चंगेज़ खान
मंगोल था जिसका
असली नाम तमोजिन
था। मंगोलिया पर
अधिकार कर लेने
के बाद उसने
अपना नाम चंगेज़
खान रख लिया
था। आग और
तलवार की सियासत
के सहारे वह
भय और आतंक
का पर्याय बना वह
कहा करता था
कि 'आग जंगल
में रास्ता दिखाती
है और तलवार
सीमाओं का विस्तार
करती है।'
ज़हीरुद्दीन बाबर चंगेज़
खान और अमीर
तैमूर की नस्ल
का पहला ऐसा
बादशाह था जिसके
हाथ में तलवार
भी थी और
'रबाब' (एक तरह की वीणा) भी। वह
योद्धा भी था
और कोमल भवनाएं
रखने वाला कवि
भी। उसका पिता
सुल्तान उमर शेख मिरज़ा चग़ताई
कबीले से सम्बंध
रखता था। फ़रग़ना
उसके पिता के
राज्य की राजधानी
थी जहां वह
अपने पिता की
मृत्यु के बाद
12 वर्ष की आयु
में सिंहासन पर
आसीन हुआ। युवा
होते ही वह
अपने सैनिकों के
साथ राज्य की
सीमाओं को विस्तार
देने लगा।
1526 ई.
में जब वह पानीपत के मैदान
में इब्राहीम लोदी
की एक लाख
सैनिकों वाली सेना
के सामने पहुंचा
तो उसके माथे
पर बल पड़
गये क्योंकि तब
उसके साथ मात्र 12,000 कुशल
सैनिकों की एक
ऐसी टुकड़ी थी
जिसके पास टर्किश-तोपों का एक
डिवीज़न और सौ
हाथियों का बेड़ा
था जिसके बारे
में इब्राहीम लोदी
को किसी भी
तरह की कोई
भी जानकारी नहीं
थी। पानीपत के
मैदान में तोपों
का यह पहला
प्रयोग था।
तोपों
के इस एकतरफ़ा
युद्ध ने बाबर
के भाग्य का
ऐसा फैसला किया
कि आगरा मुग़लों
का पाये-तख्त
घोषित हो गया।
हुमायूं ने आगरा
की ओर कूच
किया तो बाबर
ने दिल्ली के
सिंहासन की ओर।
इबाहीम लोदी पानीपत
के युद्ध में
मारा गया।
बाबर
में अनेक विशेषताएं
थीं लेकिन उसके
स्वभाव में विलासिता
भी कम नहीं
थी। यहां तक
कि फ़ारसी में
उसके बारे में
कहावत थी कि
'बाबर ब ऐश
कोश कि आलम
दोबारह नेस्त।' यानी, बाबर
जैसा विलासी दुनिया
में शायद ही
कहीं और हो।
दुर्भाग्य से अपनी अस्वस्थ्ता के
कारण वह मात्र
48 वर्ष की आयु
तक ही जीवित
रह सका और
सन् 1530ई. में
उसकी अकाल मृत्यु
हो गई। उसे
नूर-अफ़शा नामक
शाही बाग़ में
मात्र 6 महीने के लिए
दफ़्न रखा गया,
बाद में उसके
शव को काबुल
के उस स्थान
में हस्तानांतरित कर
दिया गया जिसे
बाबर ने अपने
जीवनकाल में ही
स्वयं पसंद किया
था।
इसके बाद
हुमायूं के सिर
पर कांटों का
ताज रखा गया।
अपने 15 वर्ष के
प्रवास-काल या
यूं कहें कि
दरबदरी के बाद
वह पुनः सिंहासन
पर बैठ तो
गया लेकिन बाद
के वर्षोंं में
उसे कभी भी
शांति के क्षण
नसीब नहीं हुए।
हुमायूं का अर्थ
भाग्यशाली होता है
लेकिन वास्तविकता यह
है कि वह
भाग्यशाली तो कभी
रहा ही नहीं।
उसके भाई
कामरान, हिन्दाल और अस्करी समस्त रियायतें
पा लेने के
बावजूद उसके विरुद्ध
विद्रोह का झंडा
बुलंद करते रहते थे,
इससे हुमायूं को
बहुत सदमा पहुंचता था। नतीजा यह हुआ कि इन परिस्थितियों से आहत हो वह अंततः अपनी हताशा
और निराशा के
वशीभूत राज-ज्योतिषियों,
सड़कछाप टोटके-बाज़ों, पीरों-फ़कीरों और नजूमियों की पनाह में
पहुंचने लगा।
जैसे की होता है, कुछ
लोग उसकी इस
कमज़ोरी का लाभ उठाने लगे। वह बादशाह कम, दीवाना अधिक लगने लगा. सितारों की
चालें उसकी अपनी चलें बन गई।
खगोल विद्या में
उसकी बढ़ती रुचि को
ध्यान में रखते
हुए तत्कालीन विद्वान
खगोल शास्त्रियों और
ज्योतिषियों ने अवसर का लाभ उठाते हुए अपने
लिए बहुत से
कमरों वाली एक
वेधशाला का निर्माण
करवा लिया। इसके बावजूद हुमायूं की
हताशा में कहीं कोई कमी
नहीं आई। चूंकि वह
अफ़ीम (अफ्यून) का
सेवन करता था, अब इसमें अफीम की तादाद ज़्यादा हो गई।
हर समय वह नशे में डूबने लगा. यहां तक कि
एक बार नशे
में ही वेधशाला की
इमारत में बनी
संगेमरमर की सीढ़ियों
से उतरते हुए
उसके पांव ऐसे फिसले कि बहुत
इलाज के बावजूद वह स्वस्थ नहीं हो पाया और चला बसा.
जैसा कि पहले बताया जा चुका है, बस्ती ग़यासपुर में
ही हज़रत निज़ामुद्दीन
औलिया की दरगाह
से कुछ ही
फ़ासले पर एक
मक़बरा है इतग़ाह
खां का। इतग़ाह
खां का असली
नाम शमसुद्दीन था
जो हुमायूं के
दरबार का एक सम्मानित दरबारी था। वह
उन दिनों भी हुमायूं के
साथ था जब
शेरशाह सूरी से
परास्त होकर हुमायूं
ईरान जा पहुंचा
था। 15 वर्षों बाद जब
वह विजयी होकर
पुनः दिल्ली में
दाखिल हुआ, इतक़ाह
खां तब भी
उसके साथ रहा।
वह एक स्वामिभक्त
किस्म का दरबारी
था।
अकबर के
जन्म के समय
इतग़ाह खान की
पत्नी जली बेगम
ने न केवल
दाई की भूमिका
निभाई बल्कि उसने
अकबर को अपना
दूध भी पिलाया
था। इसीलिए उसे
अंगाह सम्मान से
सम्मानित किया गया
था। (जब कोई
स्त्री बादशाह के पुत्र
को अपना दूध
पिलाती है तो
उसे सम्मान की
नज़र से देखकर
’अंगाह’ के सम्बोधन
से सम्बोधित किया
जाता था और
ऐसी स्त्री के
पति को इतगाह
खान कहा जाता
था। सन् 1556 में
जब अकबर 13 वर्ष
की उम्र में
गद्दीनशीन हुआ, इतगाह
खान और उसकी
पत्नी जली बेगम यानि अंगाह बादशाह अकबर
के निजी परिवार के सम्मानित सदस्यों में शुमार
किये जाने लगे।
1556 ई. में
बादशाह मीरज़ा हुमायूं का
51वर्ष की उम्र
में देहावसान हो
गया। उसके शासनकाल
तक उसी के
द्वारा पुननिर्माण कराये गये
पुराने किले से
ही बादशाहत का
कार्य किया जाता
था। बादशाह का
तख्त भी इसी
किले में था
लेकिन उसके देहावसान
के बाद बादशाह
अकबर ने 1558 ई.पूर्व में आगरा
को ही अपनी
स्थाई राजधानी बना
ली और दिल्ली
को अलविदा कह
दिया।
दिल्ली का सिंहासन
फिर खाली हो
गया।
(मुग़ल सल्तनत
की उथल-पुथल
के युग में
दिल्ली की रौनकें
इसी तरह गहनाती रहीं।
अगली तीन पीढ़ियों
के बाद चौथी
पीढ़ी जब सत्ता
में आई तो
दिल्ली को एक
बार फिर से
अरूसुलबलाद कहा जाने
लगा। यह बादशाह
शाहजहां का शासनकाल
था जिसने दिल्ली
को अपना पाया-ए-तख्त
बनाया। लाल किले
का निर्माण इसी
सुनहरी युग की
देन है।)
हुमायूं की मृत्यु
के समय अकबर
मात्र 13 वर्ष का
था। उस समय
गुरुदास पुर में
मुग़लों की सेना
सेनापति बैरम खां
के नेतृत्व में
सिकन्दर सूरी की
सेना से जंग
में उलझी हुई
थी। युद्ध में
अकबर बैरम खां
के साथ था।
बैरम खां नस्ल
से तुर्क सरदार
था। 16 वर्ष की उम्र से ही
वह हर दुख-सुख में
हुमायूं के साथ
रहा था। वह
बहुत योग्य सेनापति
और राजनीति की
समझ रखने वाला
एक ऐसा योद्धा
था जिसने सही
मायनों में पानीपत
के दूसरे बड़े
युद्ध के बाद
हिन्दुस्तान में मुगलों
के शासन की
बुनियाद मज़बूत कर उसपर
उसकी हुकूमत का
महल खड़ा किया।
वह चाहता तो
खुद बादशाह बन
जाता लेकिन उसने
अपनी स्वामिभक्ति के
लिए अपने अस्तित्व
की कभी परवाह
नहीं की। हुमायूं
का वही बाल-सखा, अकबर
का फूफा, मुग़लों
के सिर के
ताज का गौरव
और हिन्दुस्तान के
होने वाले बादशाह
जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (जिसने
कालांतर में हिन्दुस्तान
पर 50 वर्षों तक
शासन किया.) का
गुरू, संरक्षक और
स्वामिभक्त सेनापति था।
शहंशाह हुमायूं के
मकबरे का निर्माण
स्वयं अकबर ने
अपनी देख-रेख
में कराया था।
यह सुंदर इमारत
कई भागों में
विभाजित है। इसके
तहखाने में 124 कमरे हैं
और हर कमरे
में एक कब्र
है। इसी तहखाने
में हुमायूं और
उसकी बेगमात, हमीदा
बानो और बेगा
बेगम की भी
कब्रें हैं। इन्हीं
कमरों में से
किसी एक
गुमनाम कमरे में
शाहजहां के बड़े
पुत्र शहज़ादा दाराशिकोह
की भी क़ब्र है
जिसे औरंगज़ेब ने कत्ल करवा
दिया था। इसी
मक़बरे के बाग़
में एक मक़बरा
मुग़ल शाही हज्जाम
का भी है
जिसके बारे में
शोध किया जाना ज़रूरी है क्योंकि उसके बारे में विस्तार से जानकारी
प्राप्त नहीं होती
है।
कुछ पुराने
दस्तावेज़ों में हुमायूं
के मकबरे के
निमार्णकर्ता का नाम
मलिका हाजी हमीदा
बेगम का भी
आया है, लेकिन
यह सही नहीं
लगता है। मलिका
हुमायूं की बड़ी
बेगम थीं। बेगम
अधिकतर विदेशों में आध्यत्मिक
भ्रमण पर रहा
करती थीं। धार्मिक
प्रवृति होने के
कारण उनका अधिकतर
समय हज और उमरा
के अतिरिक्त करबला,
नजफ़ और दूसरे
पवित्र स्थानों की ज़ियारत
पर भी खर्च
होता था। वह
दिल्ली होतीं तो अकबर
उन्हें हुमायूं के मकबरे
के निर्माण-कार्य
का निरीक्षण करआने
को कहता, हालांकि वह
कोई कुशल आर्किटेक्ट
नहीं थीं फिर
भी शाही परिवार में वह बड़ी और
बेगम हुमायूं थीं।
इसलिए हुमायूं के
मक़बरे के निर्माण
में उनका नाम
लिया जाना कुछ
उचित नहीं लगता।
मलिका हज से
लौटीं तो 300 अरब
महिलाएं और पुरुष
उनके साथ थे। मलिका चाहती
थीं कि वे
दिल्ली स्थित मुगलज़ादों और
ज़ादियों को धार्मिक
शिक्षा प्रदान करें। उन्हें
यहीं बसाने के
उद्देश्य से मलिका
ने उनके रहने
के लिए अरब
सराय बनवाई जिसका
गेट आज भी
अपने इतिहास के
अफ़साने बयान करता
है।
क़ब्रिस्तान के इस
क्षेत्र में मुग़लों
की हज़ारों-हज़ार दास्तानें दफ्न हैं।
इस क्षेत्र में
अनेक मक़बरे और
मस्जिदें हैं जो
आज गुमनामी के
मलबे में दफ़्न
होती जा रही
हैं। यहीं के
एक मक़बरे में
शेरशाह सूरी का वफादार अफ़ग़ानी रईस ईसा
खान नियाज़ी जो
शेरशाह के वारिस
इस्लाम शाह के
दरबार में था, दफ्न है।
उसने इस मक़बरे
का निर्माण अपने
जीवन में ही
करवा लिया था। जारी /-7
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पाठकों से- ब्लॉग पर यह मेरा पहला प्रयोग है. मेरा उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएंगे, शर्त यही है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को आप पढ़ना न भूलें। पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं -लेखक



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