पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 7) /डॉ. रंजन ज़ैदी
शमसुद्दीन इतगाह खान के मक़बरे का निर्माण (1566-67 ई.पूर्व के मध्य) उसकेे पुत्र मीरज़ा
अज़ीज़ कोकलताश की देख-रेख में किया गया था। कोकलताश टर्किश भाषा का शब्द है। मुग़लों की मातृ-भाषा तुर्की बताई जाती है। तुर्की भाषा में कोकलताश का अर्थ होता है सौंतेला भाई।
चूंकि बादशाह अकबर ने बचपन में अंगाह का दूध पिया था, इस नाते अंगाह का बेटा अज़ीज़ कोकलताश उसका सौंतेला भाई हुआ। यह उपाधि स्वयं अकबर ने अज़ीज़ कोकलताश को दी थी। अज़ीज़ कोकलताश का मक़बरा पिता के मक़बरे से कुछ ही दूरी पर अवस्थित है। इस मक़बरे को 67 खम्भा के नाम से जाना जाता है। इसमें 64 खंभों का इस्तेमाल किया गया है।
इस मक़बरे में मीरज़ा अज़ीज़ कोकलताश की पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य दफ़्न हैं। तब कौन जानता था कि कालांतर में यहीं से कुछ ही दूरी पर (1797-1869) उर्दू-फ़ारसी के महान शायर मीरज़ा ग़ालिब को लाकर उनके अपने मक़बरे में दफ़्न किया जायेगा जिसने मुग़लों की शहंशाहियत के पतन को अपनी आंखों से देखा था और दिल्ली को लुटते उजड़ते हुए भी।
अफ़सर वाला मक़बरा इसी कब्रिस्तान में अवस्थित है जहां महत्वपूर्ण मुग़ल अमीर-उमरा को दफ़न किया जाता था लेकिन उनकी कहानियां अवाम में प्रचलित नहीं थीं। कब्रिस्तान के पश्चिम में कुछ फ़ासले पर ख्वाजासरा मेहरबान आग़ा ने बादशाह जहांगीर के शासनकाल में एक थोक व्यापारी मंडी का निर्माण करवाया था जिसकी अपने समय में काफ़ी प्रतिष्ठा थी। उस क्षेत्र में अनेक भव्य इमारतों का भी निर्माण कराया गया था।
ख्वाजासरा मेहरबान आग़ा बादशाह के खास ख्वाजासराओं में था। उस युग में ख्वाजासरा बादशाहों के सीधे सम्पर्क में रहने के कारण काफ़ी पावरफ़ुल और दौलतमंद हो जाया करते थे। यह थोक-मंडी उसकी निजी सम्पत्ति थी।
हुक्मे-शाही के अंतर्गत दिल्ली के निकट सलीम गढ़ क्षेत्र में यमुना किनारे एक नई दिल्ली बसाने के इरादे से लाल पत्थरों का किला बनाने की योजना तैयार की गई जिसके लिए तत्कालीन मुग़ल प्रशासन को 105 एकड़ ज़मीन का प्रबंध करना पड़ा।
किले के लिए सुनिश्चित की गई ज़मीन के दक्षिण में एक छोटा सा किला सलीम गढ़ था जिसे 1546 ई-पू- में किसी सूरी शासक सलीम शाह ने बनवाया था। किले के निर्माण-कार्य की शुरुआत 16अप्रैल-1639 में तत्कालीन प्रसिद्ध राज श्ल्पिकार उस्ताद हामिद और उस्ताद अहमद के दिशा-निदेशन में की गई। इसके निर्माण-कार्य पर उस समय की मुद्रा-मूल्य में लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हुए जिसमें 50 लाख रुपये फ़सीलों के निर्माण पर खर्च किये गये थे। इसका नाम पहले क़िला मुबारक और किला शाहजहांनाबाद रखा गया था लेकिन बाद में लाल पत्थरों के अधिक इस्तेमाल के कारण इसका नाम लाल किला रख दिया गया। 17 मई,1648 को किले के दीवाने-खास में पहले दरबार की बुनियाद पड़ी। किले के बाहर साफ़ पानी के लिए तालाब का निर्माण करवा दिया गया जिसका पानी नहर के रास्ते किले के चारों ओर बहता रहता था। किले के चारों ओर मुगल गार्डेन थे जिनमें गुलाब से लेकर अनेक सुंदर फूल महका करते थे। किले के अन्दर बारहदरी में अनेक बारहदरियों के पत्थर संगेमरमर के थे और उनके गुम्बदों के निर्माण में सोने का इस्तेमाल किया गया था।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि लाल क़िला के अंदर जो मोती मस्जिद है, उसका निर्माण शाहजहाँ ने नहीं, बादशाह औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में करवाया था और जो क़िले के बाहर (आज के चांदनीचौक में स्थित गुरुद्वारा के पास) सुनहरी मस्जिद है, उसे अहमद शाह की माँ कुदसिया बेगम ने बनवाया था जहां आज भी नमाज़ें अदा की जाती हैं.
दीवाने-खास-आम के प्रवेश-द्वार से पूर्व एक अन्य इमारत थी जिसका नाम नक़्क़ारखाना था। नक़्क़ारों के द्वारा बादशाह के आने की यहां से सूचना प्रसारित की जाती थी।
इमारत को एक रास्ता दीवाने-खासोआम से जोड़ता था जिसके दोनों ओर चांदी के पत्तल मढ़े खम्भों की कतारें थीं। खम्भे] सोने-चांदी के बारीक तारों से बुने एक ऐसे कपड़े के शामियाने को संभालते थे जो बादशाह को धूप और बारिश से बचाता था। यह कपड़ा अहमदाबाद] गुजरात के कारीगर ही तैयार करते थे।
रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत फूलों से लदे बाग थे। बादशाह इसी रास्ते से होकर दीवाने-खासोआम तक पहुंचता था। दीवाने-खासोआम को छोटे-बड़े खम्भों और सोने-चांदी के तारों से ऐसे विभाजित किया गया था कि कौन सी श्रेणी का व्यक्ति कहां बैठने के लिए अधिकृत है।
दीवाने-खास-आम में जो खम्भे थे, उनकी छत की पहली पर्त चांदी की थी किन्तु उसे और किले के गुम्बदों को ढकने के लिए सोने के पत्तलों का इस्तेमाल किया गया था। तख्ते-ऊस को, दीवाने-खासो-आम के जिस बॉलकनी वाले स्थान पर स्थापित किया गया था, उसे नशेमने-ज़िल्लेइलाही कहा जाता था। इसपर 1250 किलो सोने का इस्तेमाल किया गया था। 1631 ई. में इस पर लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए थे। इसी तख्ते-ताऊस पर सोने के अक्षरों में फ़ारसी का जग-प्रसिद्ध शे'र लिखा गया था-
*गर फ़िरदौस बररूएज़मीं अस्त, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त।
यानि] *अगर इस ज़मीन पर कहीं जन्नत है,तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है। क्रमशःजारी/-8
पाठकों से- ब्लॉग पर यह मेरा पहला प्रयोग है. मेरा उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएंगे, शर्त यही है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को आप पढ़ना न भूलें। पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं -लेखक/सर्वाधिकार%लेखकाधीन
अज़ीज़ कोकलताश की देख-रेख में किया गया था। कोकलताश टर्किश भाषा का शब्द है। मुग़लों की मातृ-भाषा तुर्की बताई जाती है। तुर्की भाषा में कोकलताश का अर्थ होता है सौंतेला भाई।
चूंकि बादशाह अकबर ने बचपन में अंगाह का दूध पिया था, इस नाते अंगाह का बेटा अज़ीज़ कोकलताश उसका सौंतेला भाई हुआ। यह उपाधि स्वयं अकबर ने अज़ीज़ कोकलताश को दी थी। अज़ीज़ कोकलताश का मक़बरा पिता के मक़बरे से कुछ ही दूरी पर अवस्थित है। इस मक़बरे को 67 खम्भा के नाम से जाना जाता है। इसमें 64 खंभों का इस्तेमाल किया गया है।
इस मक़बरे में मीरज़ा अज़ीज़ कोकलताश की पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य दफ़्न हैं। तब कौन जानता था कि कालांतर में यहीं से कुछ ही दूरी पर (1797-1869) उर्दू-फ़ारसी के महान शायर मीरज़ा ग़ालिब को लाकर उनके अपने मक़बरे में दफ़्न किया जायेगा जिसने मुग़लों की शहंशाहियत के पतन को अपनी आंखों से देखा था और दिल्ली को लुटते उजड़ते हुए भी।
अफ़सर वाला मक़बरा इसी कब्रिस्तान में अवस्थित है जहां महत्वपूर्ण मुग़ल अमीर-उमरा को दफ़न किया जाता था लेकिन उनकी कहानियां अवाम में प्रचलित नहीं थीं। कब्रिस्तान के पश्चिम में कुछ फ़ासले पर ख्वाजासरा मेहरबान आग़ा ने बादशाह जहांगीर के शासनकाल में एक थोक व्यापारी मंडी का निर्माण करवाया था जिसकी अपने समय में काफ़ी प्रतिष्ठा थी। उस क्षेत्र में अनेक भव्य इमारतों का भी निर्माण कराया गया था।
ख्वाजासरा मेहरबान आग़ा बादशाह के खास ख्वाजासराओं में था। उस युग में ख्वाजासरा बादशाहों के सीधे सम्पर्क में रहने के कारण काफ़ी पावरफ़ुल और दौलतमंद हो जाया करते थे। यह थोक-मंडी उसकी निजी सम्पत्ति थी।
मुग़ल बादशाह शाहजहां कुशल
सेनापति के अलावा उच्चकोटि का आर्किटेक्ट भी था। बादशाही मस्जिद और आगरे
में ताजमहल आर्किटेक्ट के इतिहास की उच्चतम और उसके जीवन की महान उपलब्धियां
कही जा सकती हैं। लाहौर में उसने निर्माण के अनेक कार्य किये थे। यही नहीं
बल्कि अंतरराष्ट्रीय आर्किटेक्चर के इतिहास की बहुमूल्य-निधि
(जिन्हें हम काबुल के शाही बाग़ात की बारहदरियों के नाम से जानते हैं) का
नवीनीकरण भी शाहजहां ने ही कराया था क्योंकि तब तक वह बहुत बुरी स्थिति में
पहुंच चुकी थी। अफ़गानिस्तान की राजधानी काबुल की अस्थिर राजनीति और निरंतर
भीषण गृह-युद्धों के कारण बाग-बारादरियां आज भी बुरी स्थित में
अवस्थित हैं।
शाहजहां, जब सत्तासीन
हुआ तो उसे नई राजधानी के लिए लाहौर और आगरा के स्थान पर ऐसी जगह की तलाश
हुई जो दरिया के किनारे हो। यमुना आगरे से गुज़रती थी लेकिन उसका रास्ता
दिल्ली तक भी जाता था। शाहजहां अपनी आंखों में एक नई दिल्ली बसाने का
स्वप्न समेटे उन सर्वेक्षणकर्ताओं की राह देखने लगा जो यमुना के रास्ते का
सर्वे करते हुए उम्मीद की नई खबर उस तक पहुंचाने के लिए दिन-रात एक
किये हुए थे। जब बादशाह को यह खुशखबरी मिली कि यमुना के किनारे ही एक और
दिल्ली का निर्माण किया जा सकता है] तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। ![]() |
| लाल किले का दीवाने आमो-खास |
किले के लिए सुनिश्चित की गई ज़मीन के दक्षिण में एक छोटा सा किला सलीम गढ़ था जिसे 1546 ई-पू- में किसी सूरी शासक सलीम शाह ने बनवाया था। किले के निर्माण-कार्य की शुरुआत 16अप्रैल-1639 में तत्कालीन प्रसिद्ध राज श्ल्पिकार उस्ताद हामिद और उस्ताद अहमद के दिशा-निदेशन में की गई। इसके निर्माण-कार्य पर उस समय की मुद्रा-मूल्य में लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हुए जिसमें 50 लाख रुपये फ़सीलों के निर्माण पर खर्च किये गये थे। इसका नाम पहले क़िला मुबारक और किला शाहजहांनाबाद रखा गया था लेकिन बाद में लाल पत्थरों के अधिक इस्तेमाल के कारण इसका नाम लाल किला रख दिया गया। 17 मई,1648 को किले के दीवाने-खास में पहले दरबार की बुनियाद पड़ी। किले के बाहर साफ़ पानी के लिए तालाब का निर्माण करवा दिया गया जिसका पानी नहर के रास्ते किले के चारों ओर बहता रहता था। किले के चारों ओर मुगल गार्डेन थे जिनमें गुलाब से लेकर अनेक सुंदर फूल महका करते थे। किले के अन्दर बारहदरी में अनेक बारहदरियों के पत्थर संगेमरमर के थे और उनके गुम्बदों के निर्माण में सोने का इस्तेमाल किया गया था।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि लाल क़िला के अंदर जो मोती मस्जिद है, उसका निर्माण शाहजहाँ ने नहीं, बादशाह औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में करवाया था और जो क़िले के बाहर (आज के चांदनीचौक में स्थित गुरुद्वारा के पास) सुनहरी मस्जिद है, उसे अहमद शाह की माँ कुदसिया बेगम ने बनवाया था जहां आज भी नमाज़ें अदा की जाती हैं.
दीवाने-खास-आम के प्रवेश-द्वार से पूर्व एक अन्य इमारत थी जिसका नाम नक़्क़ारखाना था। नक़्क़ारों के द्वारा बादशाह के आने की यहां से सूचना प्रसारित की जाती थी।
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| दिल्ली का लाल किला |
रास्ते के दोनों ओर खूबसूरत फूलों से लदे बाग थे। बादशाह इसी रास्ते से होकर दीवाने-खासोआम तक पहुंचता था। दीवाने-खासोआम को छोटे-बड़े खम्भों और सोने-चांदी के तारों से ऐसे विभाजित किया गया था कि कौन सी श्रेणी का व्यक्ति कहां बैठने के लिए अधिकृत है।
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| लाल किले में आज का मीना बाजार |
*गर फ़िरदौस बररूएज़मीं अस्त, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त।
यानि] *अगर इस ज़मीन पर कहीं जन्नत है,तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है। क्रमशःजारी/-8
पाठकों से- ब्लॉग पर यह मेरा पहला प्रयोग है. मेरा उद्देश्य है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी पहुँच बना सकूँ। अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएंगे, शर्त यही है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को आप पढ़ना न भूलें। पाठक सीधे तौर पर भी मुझसे इस नंबर +91 9350934635 पर संपर्क कर सकते हैं -लेखक/सर्वाधिकार%लेखकाधीन




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