ईरानी फतवे का विरोध करने वाले पहले मुस्लिम साहित्यकार/रंजन ज़ैदी*
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| ओरखान पामोक |
इन दिनों मैँ तुर्की के प्रतिष्ठित विद्रोही, विवादित व सलमान रुश्दी के ईरानी फतवे का विरोध करने वाले पहले मुस्लिम साहित्यकार 2006 के नोबल प्राईज़ विनर 'ओरहान पामोक' (Orhan Pamuk) जिन्हें ओरखान पामोक भी कहा जाता है, का अनूदित साहित्य पढ़ने में व्यस्त रहा. कारण था, पामोक की शोहरत की ज़मीनी तह में फैली उन जड़ों की तलाश जहाँ की मिट्टी ने यासिर कमाल और नाज़िम हिकमत जैसे बड़े साहित्यकारों के दरख्तों की जड़ों को सीने से लगाये रखा था.
बहुत पहले मैंने ओरखान पामोक की एक पुस्तक 'ब्लैक-बुक' पढ़ रखी थी. यह पुस्तक पामोक ने २२ वर्ष की उम्र में लिखी थी. अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में देखे तो हम पाएंगे कि पामोक चर्चा में उस समय आये जब उन्होंने 2005 में सुइटज़रलैंड के एक समाचार पत्र को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि,'तुर्की में ३० हज़ार कुर्द और १० लाख अर्मेनियाई नागरिकों की हत्याएं की गईं. लेकिन मेरे सिवा इस बारे में कोई कुछ नहीं बोलता.'
तुर्क 'सल्तनते-उस्मानीया' (1915-17) की सेनाओं के हाथों हुए अर्मेनियाई नर-संहार की तादाद पर सहमत नहीं हैं.
'हयाते-नौ' और 'किला अबीज़', पामोक के बहु-चर्चित उपन्यास हैं. कहा जाता है की 'हयाते-नौ' (85000 हज़ार प्रतियां) ने तुर्की में बिक्री के नए मानदंड स्थापित किये थे.
'क़िला अबीज़' 17वीं शताब्दी के एक विद्वान इटैलियन सैलानी की कहानी है जिसे वेन्स से नेपल्स के समुद्री यात्रा के दौरान उस्मान-तुर्कों ने गिरफ्तार कर उसे गुलाम बना लिया था जिसे बाद में एक अमीर खोजा के सिपुर्द कर दिया गया था. 'फारूक दरून ओग्लो' के नाम से प्रस्तावित उपन्यास का यह पात्र ओरखान के उपन्यास 'ख़ानए-खामोश' का महत्वपूर्ण पात्र भी रहा है. 'बर्फ' उनका (उन्ही के शब्दों में) पहला और अंतिम सियासी उपन्यास होगा। 'इस्तम्बूल एंड मेमॉयर्स' में शायरी और यादें ज़्यादा हैं.
पत्नी अमेरिका में अलग रहती हैं, बेटी अपने पैतृक परिवार के साथ रहती है.
Copyright : Ranjan Zaidi *

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