पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-8 /डॉ. रंजन ज़ैदी
दिल्ली में भी उसके पांव कभी जम नहीं पाये और उसके संकीर्ण विचारों, कठोर व्यवहारिक समीकरणों और शासनिक व प्रशासनिक त्रुटियों के कारण मुग़लों के एकजुट किये गये देश में विभिन्न तरह की बग़ावतों ने उसे कभी आराम से रहने नहीं दिया।
यही नहीं बल्कि औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में किले की तमाम परम्पराओं को एक-एक करके समाप्त कर दिया जैसे बादशाहत की वर्षगांठ, दरबार में संगीतकारों के संगीत का प्रदर्शन और वर्षगांठ पर बादशाह को सोने-चांदी के सिक्कों से तोले जाने की परम्परा आदि।
इस परम्परा के बंद होने से गरीब अवाम में गहरी मायूसी छा गई, क्योंकि तोल के सिक्के बाद में गरीब
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| चांदनी चौक: अतीत के झरोखे से |
बीमार मानसिकता के बीच पनपती धर्मांधता और जुनून की हदों को छूता औरंगज़ेब का कट्टरतावाद जब उसकी हीनभावना से ग्रस्त होकर उसी के आत्मद्वंद्व का शिकार हुआ तो उसका आक्रोश ग़रीब अवाम पर हुकूमत की लाठी की तरह बरस पड़ा।
तब, चोट खाये अवाम खौलते दूध के उफान पर पानी की छींटें सहकर शांत तो हो गये लेकिन दूध के खौलने की प्रक्रिया कालांतर तक जारी रही क्योंकि उस समय यदि आंच तेज़ हो जाती तो दूध के उबलकर गिरने की संभावना भी बनकर रह जाती। फैसला समय ने अपने आप दस्तावेज़ों में महफूज़ कर लिया।
विस्फोटक स्थिति तब बनी जब बादशाह औरंगज़ेब का देहावसान हो गया। किले के भीतर मुगलों के खानदान निर्भीक और निर्द्वंद्व होकर अपनी सुरंगों से बाहर निकल आये और शराबो-शबाब के ऐसे पैमाने छलकाने लगे कि मुग़ल सल्तनत की आने वाली पीढ़ियां भी उसमें डूब गईं ।
बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला मुग़लों के पतन के इतिहास की इमारत का वो पहला घुन लगा सुतून बना, जो गिरा तो मुग़लों की बादशाहत का काई भी सुतून देर तक अपने कंधों पर मुग़ल सल्तनत की लाश का वज़न देर तक संभाल नहीं सका।
लाल किले की शक्ल अब पहले जैसी नहीं रही थी । किले के गेट से जब हम अन्दर प्रवेश करेंगे तो हमें
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| दिल्ली गेट: अतीत के झरोखे से. |
दिल्ली गेट से शुरू होने वाले कमरों की दो लम्बी पंक्तियां हौज़ तक जाती थीं। इनमें किले के अन्दर काम करने वाले खिदमतगारों के परिवार रहते थे। इन दानों कतारबद्ध पंक्तियों को पीने के पानी से भरे दो नाले परस्पर विभाजित करते थे। ये नाले टी-प्वाइंट पर पहुंचकर एक हौज़ में जा गिरते थे जहां पानी को वापस करने का संय़़त्र उसे वापस दूसरे नाले में फेंक देता था।
इस प्रकार कमरों में रहने वालों को अपनी चौखट पर ही पीने का बहता पानी आसानी से प्राप्त हो जाया करता था। गेट को (संयुक्त रूप से पुराने शहरों को फ़ारसी में दिल्ली और दिल्ली को हिन्दी में उच्च-स्थान कहते हैं।) दिल्ली-गेट नाम इसलिए दिया गया था क्योंकि उसका रुख उन पुराने शहरों की ओर था जो 100 वर्ष पहले ही खण्डहर में बदल चुके थे, इनमें पुराने किले, महल और मस्जिदें भी थीं। जब अंग्रेज़ों ने किले पर कब्ज़ा किया तब खण्डहरों के निशान भी सदैव के लिए मिटा दिये गये।
किले का मुख्य-द्वार लाहौरी गेट कहलाता है जो चांदनी चौक की ओर खुलता है। वर्तमान में जिस गेट से पर्यटक किले में प्रवेश करते हैं, वह पहले नहीं हुआ करता था। पहले का गेट शाहजहांनाबाद की ओर खुलता था। औरंगज़ेब (1658-1707) ने अपने शासनकाल में कड़ी सुरक्षा की दृष्टि से किले की मुख्य दीवार के अन्दर एक और दीवार खड़ी करवाई थी।
वर्तमान में जिस सदर गेट को प्रयोग में लाया जाता है, वह उसी अन्दरूनी दीवार के रास्ते का हिस्सा है। जब हम इसी रास्ते से होकर किले के अन्दर जाने के लिए बाईं ओर मुड़ते हैं तभी हमें लाहौरी गेट को पार करना होता है। मुख्य कृत्रिम द्वार से असली लाहोेैरी गेट के बीच एक बाज़ार अवस्थित है जो किले के निवासियों के लिए बसाया गया था। वर्तमान में वही बाज़ार अब सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बन चुका है।
मुगलों की 6 पीढ़ी पहले से बादशाहों के बीच ‘इंसाफ़ का तराज़ू़’ अपनी पहचान स्थपित कर चुका था। दिल्ली के लाल किले में भी खुले चबूतरे पर एक बड़ा सा इंसाफ़ का तराज़ू डोलता रहता था जो खगोल-शास्त्रियों को तारा-मंडल की गतिविधियों की भी जानकारी दिया करता था।
बादशाह शाहजहां ने 1639 ई. में एक नये शहर की बुनियाद डाली थी जिसे पूरा होने, बसने और संवरने में पूरे 9 साल लग गये थे। 1648 ई.पू. में जब शाहजहांनाबाद बस गया तो पहली बार शहज़ादा दाराशिकोह अपनी अलग सवारी पर शहर को देखने निकला और नहर के सिरे पर खड़े होकर उसने दूर फ़तहपुरी मस्जिद को देखकर कहा,‘ज़मीन भी किसी नौखेज़ शहज़ादी से कम नहीं होती। जब संवरती है तो फ़रिश्ते भी सिजदा करने लग जाते हैं। यह शहर बादशाह शाहजहां की ऐसी शाहज़ादी है जिसे दुनिया हमेशा याद रखेगी।’
शाहजहांनाबाद आज भी अपने सौंदर्य में किसी भी ऐतिहासिक शहर से कम नहीं है। इसके निर्माण के
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| शाहजहानाबाद, पुरानी दिल्ली |
शाहजहाँ महाभारत से बहुत प्रभावित था। महाभारत के इंद्रप्रस्थ को मुग़ल शाहज़ादे बहुत पसंद किया करते थे। स्वयं बादशाह अकबर ने अपने बाल्यकाल में ही इसकी कहानी सुन रखी थी। जब वह बादशाह बना तो उसने महाभारत का फ़ारसी में अनुवाद रिज़्मनामा के नाम से करवाया था। रिज़्मनामा शीर्षक से अनूदित महाभारत को अपने समय में शाहजहां ने भी पढ़ा। यह अनुवाद इतना सुन्दर और सरल भाषा में था कि बादशाह के दरबारियों में अब्दुर्रहीम खानेखाना जैसे सेनापतियों और सामंतों को अपने पुस्तकालयों में इसे रखने की बादशाह से अनुमति लेनी पड़ी थी। शाहजहां को बचपन से ही इसकी इंद्रप्रस्थ नगरी किसी जादुई दुनिया जैसी लगा करती थी। जब वह खुद बादशाह बना तो उसने इंद्रप्रस्थ को ही शाहजहांनाबाद के रूप में ज़मीन पर उतार लिया। वह अक्सर फ़सील पर खड़ा होकर इंद्रप्रस्थ नगर के रूप में इस शहर को विस्फारित नेत्रों से देखता रहता था। क्रमशः जारी/-9
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अगले पड़ावों पर हम शीघ्र ही आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएंगे, शर्त यह है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को आप पढ़ना न भूलें। पाठक मुझसे इस नंबर +91 9350 934 635 पर संपर्क कर सकते हैं.
-लेखक



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