पुस्तक : इतिहास के झरोखे से-( 4 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी

‘हुनूज़ दिल्ली दूरस्त।' यानी, अभी दिल्ली दूर है  
 तिहासकार फिरिश्ता लिखता है कि 'जमालुद्दीन याकूत मीर आखोर और रज़िया सुल्तान के परस्पर प्रेम-प्रसंग के सम्बंध में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इतिहासकार इस बात से इनकार नहीं करते कि वह एक शानदार महिला थी और उसमें इतिहास के नये पृष्ठों को जोड़ने की अपार क्षमता विद्यमान थी किन्तु समय उसके साथ नहीं था।'   
रज़िया  सुल्तान और उसके पति अल्तूनिया की कब्रें
      मलिक अख्तियारुद्दीन अल्तूनिया एक सभ्य, सुसंकृत और बहादुर सुल्तान था। यदि वह चाहता तो खूबसूरत जंगी कैदी रज़िया सुल्तान के शरीर से अपनी हविस की आग को बुझा सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इस व्यवहार का रज़िया सुल्तान पर बहुत गहरा असर हुआ और उसने विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
      सन 1239 ई. तक देश अनेक प्रकार की बगावतों, राजनीतिक व प्रशासनिक कमज़ोरियों और घर व बाहर के षड्यंत्रों तथा युद्धों से रज़िया सुल्तान त्रस्त हो गई। उधर, नायब-सल्तनत और हाकिमे-भटिंडा मलिक अख्तियारुद्दीन अल्तूनिया ने खुदमख्तारी का एलान कर रज़िया तक संदेश पहुंचाया कि अब वह उसके अधीन नहीं है।
      रज़िया सुल्तान ने अल्तूनिया का सिर कुचलने के लिए याकूत के नेतृत्व में सेना लेकर कूच किया तो उसकी अपनी सेना में ही फूट पड़ गई।
      मलिक अख्तियारुद्दीन अल्तूनिया की सेना से रज़िया की अविश्सनीस सेना से भिड़ंत तो हुई किन्तु इस जंग में याकूत मारा गया और रज़िया सुल्तान को बंदी बना लिया गया। मलिक अख्तियारुद्दीन अल्तूनिया ने रज़िया सुल्तान के सम्बंध में जब अपनी निजी जानकारियां एकत्र कीं तो वह उसकी योग्यता, प्रतिभा और सुन्दरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसे लगा, जिस तरह वह स्वयं चाटुकारों से घिरा रहता है, ठीक उसी तरह रज़िया सुल्तान भी अपने ही विश्वासपात्र निकट-सम्बंधी षड्यंकारियों से घिरी रहती रही होगी।
बादशाह इल्तुततमिश का मक़बरा
      काफ़ी सोच-विचार और विमर्श के बाद उसने उसे न केवल आज़ाद कर दिया बल्कि उसके सामने विवाह का प्रस्ताव भी रख दिया जिसपर रज़िया ने गम्भीता से विचार करने की मोहलत तलब की। हुक्मे-शाही में यह अवसर भी उपलब्ध कराया गया था कि यदि वह चाहे तो मिलकर अपने षड्यंकारियों को बेनकाब कर उन्हें दंडित कर सकती है लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
     इधर  रज़िया सुल्तान ने मलिक अख्तियारुद्दीन अल्तूनिया के साथ परस्पर सहमति से विवाह क्या किया, अमीर-उमरा और निकट-सम्बंधी षड्यंकारियों ने विद्रोह के  झंडे बुलंद कर दिये  और सुकून के लम्हे लुप्त हो गए।
       जंग सिर पर आ गई। षडयंत्रकारियों ने सिंहासन पर रज़िया सुल्तान के भाई मुईज़ुद्दीन बहराम शाह को बिठा कर खुलेआम बग़ावत का झंडा बुलंद कर दिया। फ़ौजें आमने-सामने आईं। तख्ते-शाही की जंग में मुईज़ुद्दीन बहराम शाह की सेनाएं जीत गईं. नतीजा यह निकला कि 24 नवम्बर, 1239 को (दिल्ली व आज के हरियाणा सीमांत क्षेत्र में) रज़िया सुल्तान व उसके पति मलिक अख्तियारुद्दीन अल्तूनिया की हत्या कर उनके शासनकाल का अंत कर दिया गया.
        रज़िया सुल्तान और उससे जुड़ी तरक्कियों व दी गई उपाधियों को भी तत्कालीन षड्यंत्रकारियों की कोरी कपोल-कल्पना बताया है। इसके बावजूद ब तक अलाउद्दीन खिलजी का दिल्ली पर शासन रहा, मुग़ल अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुए। दूसरी दिल्ली बसाने की मुहिम खिलजी के समय में ही शुरू हो गई थी। तब, शहर एक अभेद्य दुर्ग के रूप में माना जाता था। कालांतर में इसी शहर का नाम सिरी रखा गया था।
       1316 ई. में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की जब मृत्यु हुई तो दिल्ली का तख्त बादशाह के पारिवारिक सदस्यों के षड्यंत्रों का शिकार हो गया। इस अवसर का लाभ उठाकर दिल्ली पर कब्ज़ा करने के लिए एक बाहरी षड्यंत्रकारी सरदार खुसरो खान ने हमला कर अलाउद्दीन खिलजी के वंश का नामोनिशान मिटा दिया। यह एक बहुत बड़ी और दुर्दांत घटना थी। मुल्तान के गवर्नर और खिलजी सेना के सेनापति ग़ाज़ी मलिक को जब इस खबर का पता चला तो उसे नामालूम सरदार खुसरो खान पर बहुत क्र्रोध आया। उसने समय गंवाये बिना अपनी सेना को आदेश दिया कि वह दिल्ली की ओर कूच करे।
        खुसरो खान पेशेवर योद्धा नहीं था और न ही उसके पास प्रशिक्षित सैनिक थे। इसलिए ग़ाज़ी मलिक के दिल्ली पहुंचते ही वह वहां से भाग खड़ा हुआ।   
        ग़ाज़ी मलिक की सेना ने दिल्ली पर अपना आधिपत्य स्थापित कर वहां के अमीर-उमरा और सामंतों को बुलाकर उनकी इच्छा जाननी चाही कि वे किसे गद्दी पर बिठाना चाहते हैं? इस अप्रत्याशित व्यवहार का खासो-आम पर गहरा प्रभाव पड़ा जिसका नतीजा यह निकला कि सर्व-सम्मति से खिलजी का वारिस घोषित कर उसे दिल्ली के तख्त पर बिठा दिया गया।
       यही नहीं बल्कि उसे सुल्तान ग़यासुद्दीन तुग़लक के खिताब से भी सम्मानित किया गया। देश का यह एक ऐसा नया बादशाह था जिसने हिन्दुस्तान पर मात्र 5 वर्षों यानी 1320-25 ई. तक शासन किया और जाने से पहले एक और शहर आबादकर दिल्ली को सौंप गया जिसे हम आज तुग़लकाबाद के नाम से जानते हैं।
       मुग़लों के आक्रमणों से बचाये रखने के उद्देश्य से तुग़लकाबाद के शहर को काफ़ी ऊंचाई पर एक मज़बूत किले में बसाया गया था जिसके तीन ओर पहाड़ी नालों, झरनों और जंगलों से घेरा गया था। चौथी ओर मैदान था जिसे झील का रूप दिया गया था ताकि मुगलों की सेनाएं किले तक न पहुंचने पाएं। किले के निर्माण के समय कुशल मज़दूरों की तलाश जारी रहती थी लेकिन अधिकतर कुशल राजमिस्त्री हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की बावल़ी-निर्माण में व्यस्त रहा करते थे।
      यह बावड़ी (बावल़ीद्) बस्ती ग़यासपुर में सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की खानक़ाह से लगे कुंए की थी। पानी के अभाव में बस्ती ग़यासपुर के निवासियों को बड़ी किल्लत का सामना करना पड़ता था। कुंए के निर्माण के बाद पानी की समस्या हल हो सकती थी। आज इसी कुंए के पानी को दुनियाभर के आस्थावान लोग पवित्र-जल के रूप में शीशियों में भरकर ले जाते हैं। यह क्षेत्र वर्तमान समय में बस्ती हज़रत निज़ामुद्दीन के नाम से जाना जाता है।
     सुल्तान गयासुद्दीन तुग़लक़ को जब यह पता चला कि कुशल कारीगर और मज़दूर ग़यासपुर बस्ती एक बावड़ी-निर्माण में व्यस्त हैं तो उसने फ़रमान जारी किया कि जब तक किले का काम पूरा नहीं हो जाता, दिल्ली और आस-पास में रहने वाले सभी कारीगर-मज़दूर किले में ही काम करेंगे। कुशल कारीगर और मज़दूर फ़रमाने-शाही का विरोध भला कैसे कर सकते थे.
      उन्होंने किले के काम को महत्व देते हुए अपना काम तो शुरू कर दिया लेकिन हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से जो रूहानी लगाव था, उसके अंतर्गत उन्हें काम न कर पाने का उन्हें दुख ज़रूर रहने लगा।  बावड़ी का काम रुक गया। काम के रुकजाने का अहसास कारीगरों और मज़दूरों को लगातार कचोटता रहा। ऐसे हालात में सबने मिलकर एक नया रास्ता तलाशा कि सब लोग दिन में तो किले का काम करेंगे  लेकिन  रात में बावड़ी का काम भी जारी रखेंगे।   
       इस तरह, रात भर दीयों की रौशनी में मज़दूर नीचे गहराई में उतरकर सीढ़ियों का काम करते और दिन में सुल्तान ग़यासुद्दीन तुग़लक  का. (मरहूम सज्जादहनशीन हज़रत पीर ज़ामिन निज़ामी ने अपनी हयात में मुझे बताया था कि..)  कहते हैं कि बावड़ी में तब रात भर दीये रौशन रहा करते थे। इतनी तेज़ रोशनी उनसे कैसे होती थी, उनमें तेल कहां से आता था, आज तक उस रहस्य पर से पर्दा नहीं उठ पाया है।   
      मज़दूरों की इस अक़ीदत का भेद तो खुलना ही था, ख़ुफ़िया पुलिस के खबरियों ने खबर सुल्तान तक पहुंचा दी. बादशाह का क्रोधित होना स्वाभाविक था। उसने नया आदेश यह दिया कि कोई भी कारीगर-मज़दूर अब  हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के यहां काम पर नहीं जायेगा। फरमाने-शाही की बात हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तक भी पहुंचा दी गई.  खबर सुनकर हज़रत मुस्कुराये, कहा,‘बादशाह ऐसे ही होते है।’ लेकिन
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के भक्त-गण काफी भयभीत हो गये। वे चाहते थे कि उनके हज़रत पीर बस्ती छोड़कर कहीं और डेरा डाल लें। ऐसा न करने पर हज़रत को सुल्तान की नाराज़गी  झेलनी पड़ सकती थी। यह एक तरह का शीत युद्ध था, जो फ़क़ीर और बादशाह के बीच शुरू हो चुका था.
      एक दिन अचानक पता चला कि सुल्तान अपनी सेना को लेकर दिल्ली से कूच कर चुका है। उसने जाते समय यह भी कहा, (बताते हैं कि) सुल्तान वापसी पर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से दो-दो हाथ करने का इरादा रखता है। तब, हज़रत मुस्कुराकर मात्र इतना ही कह पाये कि,‘हुनूज़ दिल्ली दूरस्त। 
 यानी अभी दिल्ली दूर है, और वह अपने हुजरे में चले गये।                                            .... जारी /-5
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पाठकों से- आपके संदेशों ने मुझे बहुत उत्साहित किया है. मुझे प्रसन्नता है कि आप इस धरावाहिक को गंभीरता से पढ़ रहे हैं. अगले पड़ावों पर हम आपको दिल्ली के बारे में ऐसी दिलचस्प जानकारियां देने जा रहे हैं कि आप भी आश्चर्य-चकित रह जाएं. शर्त यह है कि इस पुस्तक की हर कड़ी को पढ़ना न भूलें।
Copyright: Dr.Ranjan Zaidi *

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