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Binayak Sen: India's war on men of peace by Kalpana Sharma

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by Hiba Rizvi on Wednesday, 29 December 2010 at 00:03.                                                                          More than 150 years ago, the British introduced a law in India designed to check rebellious natives. In 2010 this law has been used by an independent India to check activists who question government policy. Section 124A of the Indian penal code was introduced in 1870 by the British to deal with sedition. It was later used to convict Mahatma Gandhi. In his statement during the hearing on 23 March 1922, Gandhi said, "The section under which Mr Banker [a colleague in non-violence] and I are charged is one und...

विनायक सेन को उम्र कैद.../ शीतला सिंह

छत्तीसगढ़ में रायपुर की एक अदालत ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता विनायक सेन सहित नक्सल विचारक नारायण सान्याल और कोलकाता के कारोबारी पीयूष गुहा को भादवि की धारा 124 ए (राजद्रोह) और 120 बी (षडयंत्र) के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी है। श्री सेन को 14 मई 2007 को विलासपुर में गिरफ्तार किया गया था। विनायक सेन को देश में समाज सेवा के लिए कई सम्मान मिले हैं। कई अन्य देशों में भी विश्व स्वास्थ्य मिशन आदि के लिए उन्हें कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनकी वैचारिक विरोधी रही भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें गंभीर सजा देने के लिए विशेष पैरोकारी की थी। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्य और सरकार दोनों को एक ही नहीं माना जा सकता। राज्य तो स्थायी व्यवस्था है, लेकिन सरकारें देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप आती-जाती रहती हैं। व्यवस्था चलाने के लिए इन सरकारों का विधायी अंग कानून भी बनाता है और जिसके अनुरक्षण का दायित्व स्थायी तत्व के रूप में कार्यरत कार्यपालिका के पास होता है। न्यायपालिका को भी राज्य का अंग ही माना जाता है, क्योंकि उसकी सत्ता अलग से नहीं है।...

प्रदेश का दुर्भाग्य / रंजन जैदी

अब उत्तर प्रदेश की जानता को आत्म-मंथन करना होगा. उत्तर प्रदेश का अपराधी माफिया राजनीति से निष्कासित किया जा चुका है (इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्तर प्रदेश के क्राईम-रेट का पारा नीचे आ गया है). नयी पीढ़ी अपने प्रदेश का विकास चाहती है. उसके पास सुसंस्कृत भाषा, महान संस्कृति, परम्पराएँ, इतिहास, अद्भुत भूगोल और सोना उगलती धरती है. हर क्षेत्र में उसका महान योगदान रहा है लेकिन विगत वर्षों की अवसरवादी राजनीति, सांप्रदायिक और कबीलाई सोच, आयातित क्षेत्रीय चरमपंथिवाद तथा वैयक्तिक और जातीय संघर्ष तथा  राज्य के भ्रष्ट अक्षम नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश को काफ़ी पीछे धकेल दिया है. इसे  प्रदेश का दुर्भाग्य कहा जा सकता है. लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के विकास की मीटर गेज-ट्रेन का सफ़र जारी रहा.आज़ादी के बाद से लेकर मायावती के शासनकाल तक उत्तर प्रदेश ने बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ सहा भी है. अब विकास के नाम प़र पार्कवाद के विस्तार की आंधी चल रही है. राज्य की अनेक महत्वपूर्ण समस्याएं ठंडे बस्ते में दाब दी गयी हैं. अपराध और भ्रष्टाचार चरम प़र है. मायावती लगाम कसना चाहती हैं, लेकिन उनमें बिहार के मुख्...

कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई/ज़फर नक़वी

जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वे भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बटवारा किया, वह  अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्त बनने और दिखाने की जो तात्लिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है। यह बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट अंतिम पड़ाव होने की वजह से प्रतिक्रियाएं अभी उन्माद में परिवर्तित नहीं हुई हैं लेकिन उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव नज़दीक आते-आते इनके उन्मादी होने की प्रबल संभावनाएं नज़र आ रही हैं। भले ही राजनीति की बिसात पर यह प्रयास चारों खाने चित हो जाएं। कुल मिलाकर यही सार निकला है कि अयोध्य...

alpst-literature: दिल्ली का थीम-सांग / रंजन जैदी

alpst-literature: दिल्ली का थीम-सांग / रंजन जैदी : "दिल्ली का यह थीम-सांग दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित और उप-राज्यपाल श्री तेजेंद्र खन्ना के नाम- ..."

alpst-politics: नई तस्वीर/ranjan zaidi

alpst-politics: नई तस्वीर/ranjan zaidi : "सब तरफ विभिन्न वेबसाईट्स प़र इन दिनों बड़े ही सुनियोजित ढंग से भारतीय मुसलमानों के खिलाफ मोर्चा सा खोल दिया गया है. मेरे बेटे ने मुझसे सवाल ..."

नई तस्वीर/ranjan zaidi

सब तरफ विभिन्न वेबसाईट्स प़र इन दिनों बड़े ही सुनियोजित ढंग से भारतीय मुसलमानों के खिलाफ मोर्चा सा खोल दिया गया है. मेरे बेटे ने मुझसे सवाल किया कि पापा, मेरे अधिकतर दोस्त नान-मुस्लिम हैं और वह पूछते हैं कि इस कंट्री में हिन्दू-मुस्लिम-दुश्मनी के आलावा फंडामेंटलिस्ट कुछ और मुद्दा क्यों नहीं तलाशते, जैसे यूथ-फ्रस्ट्रेशन, बेरोज़गारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, न्युरिचक्लास की गुंडागर्दी, बाबाओं  की बढती तादाद और उनकी अकूत संपत्ति, छोटे परदे प़र गुजरात संस्कृति का थोथा प्रचार, वगैरा-वगैरा. ऐसे फंडामेंटलिस्ट लोगों को पढ़ने-लिखने का शौक़ क्यों नहीं है? इतना बेकार का टाइम यह कहाँ से ले आते है? मेरे दोस्तों को तो वक़्त ही नहीं मिलता है. न ही वे मंदिर-मस्जिद विवाद में पड़ते हैं. हमारे देश की पोलिटिक्स इतनी लिबर्टी क्यूँ दे देती है? क्या आज़ादी का मतलब यह है कि आप जिसे चाहें ज़लील करदें, गाली दे दें, उसकी कम्युनिटी के वैल्यूज़ को डेमोलिश कर दें, उससे उसका कल्चर हाईजेक कर लें? कुछ बारबेरियन मुस्लिम बादशाहों ने अगर कुछ गलत किया था तो आज हम लोग कौन सा इक्ज़ाम्प्ल पेश कर रहे हैं? आने वाली नस्लें इस दौर के ल...

मनुष्य और आतंकवाद /रंजन जैदी

मैं समझता हूँ कि उन सवालों पर विचार ही न किया जाय जो सवाल उपहासास्पद हों. जो बुद्धिमान होते हैं, वे चिंतन करते है. जो अज्ञानी हैं, वे धर्म के लेबिल लगे खाली डिब्बों की तरह हैं, जिनमें कंकड़ पड़े हुए हैं. थोडा हिलाते ही वे आवाज़ करने लगते है. वास्तविकता यह है कि धर्म जीवन जीने की एक शैली है. शैलियाँ भिन्न हो सकती है. मनुष्य को अपनी शैली से मोह हो सकता है. मोह का सम्बन्ध मायावी है. मोह की आत्मा का नाम आस्था है. आस्थाएं अडिग नहीं रहती हैं,  इसलिए  उसमें विचलन पाया जाता है.  शैलियाँ  परम्पराओं को जन्म देती हैं. परम्पराएं अच्छी-बुरी हो सकती है. इनकी स्वीकारोक्ति का आर्थिक आधार होता है. दाढ़ी रखना परंपरा में शामिल है, किन्तु यह परिस्थितिजन्य स्वीकारोक्ति की एक स्थिति है. दुनिया में सभी धर्म के लोग अपनी पहचान के अंतर्गत दाढ़ी  रखते है.  सभी न तो मुसलमान होते  हैं और न ही  आतंकवादी.   आतंकवाद के जन्म के कार...

alpst-politics: अहमद बुखारी प्रकरण/रंजन जैदी

alpst-politics: अहमद बुखारी प्रकरण/रंजन जैदी : "अहमद बुखारी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. ऐसा व्यवहार उनके नेतृत्व की अपरिपक्वता को दर्शाता है. मरहूम शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी भी उनके इस उग..."

अहमद बुखारी प्रकरण/रंजन जैदी

अहमद बुखारी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. ऐसा व्यवहार उनके नेतृत्व की अपरिपक्वता को दर्शाता  है. मरहूम शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी भी उनके इस उग्र स्वभाव से खुश नहीं थे. इसकी स्वीकारोक्ति उन्होंने अपने एक इंटरव्यू के दौरान मुझसे कही भी थी. तब मैं पोलिटिकल जर्नल खुशबू (हिंदी) में विशेष संवाददाता था. यह वह ज़माना था जब अहमदाबाद में साम्प्रदायिक दंगे हो चुके थे और मुझे राहुल (विज्ञापन प्रबंधक खुशबू) के साथ अहमदाबाद जाना था. क्योंकि खुशबू का राजीव गाँधी विशेषांक निकलने वाला था. उन दिनों गुजरात में कांग्रेस के मुख्यमंत्री चौधरी अमर सिंह की सरकार थी और श्री  एके दुग्गल  होम सेक्रेटरी थे.  दिल्ली प्रवास के दौरान चौधरी अमर सिंह और  मंत्री विट्ठल भाई पटेल मुझे गुजरात आने का निमंत्रण दे चुके थे.यह प्रकरण मैं यहाँ इस लिये दे रहा हूँ कि मुझे ऐसे हालात में अपने कार्यक्रम को इस लिये आगे बढ़ाना पड़ा था कि जामा मस्जिद में उन दिनों ताला डाल दिया गया था. वहां नमाज़ें बंद थीं. अधीर तिवारी खुशबू के कार्यकारी संपादक थे. उन्होंने तब मुझे बताया कि स्थिति  नाज़ुक मोड़ ले चुकी है, म...

मंदिर-मस्जिद विवाद/ज़हीर जैदी

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 Zaheer Zaidi, CP-Shia Point    अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद को देखते हुए इलाहाबाद  हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के 30 सितम्बर के  फैसले  के  खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट  में अपील  करना  ज़रूरी  है. यह इस देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के लिये भी ज़रूरी है. राष्ट्रीय संस्था शिया प्वाईंट से जुड़े   देश के लगभग दो करोड़ शियों की भी यही राय है. हालांकि सुन्नी वक्फ बोर्ड मस्जिद मुद्दे को सुन्नी मुसलमानों की भावनाओं के मामले से जोड़ते हुए इसे शियों से अलग रखने में ही अपनी बेहतरी मानता आया है. जबकि शियों ने इस मुद्दे को भी इस देश के अल्पसंख्यकों का मुद्दा मानकर इसे अपना पूरा समर्थन दिया. क्योंकि शिया समुदाय राष्ट्र-हित में इस मुद्दे को निबटाना चाहता है. कारण यह है कि जब दंगे होते हैं तो नुकसान खालिस सुन्नी मुसलमानों को ही नहीं होता है, शियों को भी पंक्ति में लाकर उन्हें नुकसान पहुंचाया जाता है. अवसरवादी राजनीति के ख़िलाड़ी मुहम्मद अदीब जैसे सांसद  ऐसी वैमनस्यता का भरपूर लाभ उठाते हैं. इसका एक उदाहरण ५ अगस्त, २००६ को श्रीमती सोनिया गाँधी के निवास...

युवाराज स्‍थापित करने की दिशा में..../.राखी रघुवंशी

कां ग्रेस महासचिव राहुल गांधी यूं तो राजनीति में अपने पदार्पण के समय से ही अपने विरोधियों के निशाने पर हैं। ख़ासतौर से उन विरोधी राजनैतिक दलों के निशाने पर जिनके लिए राहुल गांधी की राजनैतिक सोच व शैली घातक साबित होती प्रतीत हो रही है। पिछले दिनों अपने तीन दिवसीय मध्य प्रदेश दौरे के दौरान राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व सिमी अर्थात् स्टुडेंटस इस्लामिक मूवमेंटस ऑंफ इंडिया जैसी कटटरपंथी विचारधारा रखने वाले संगठनों के लिए कांग्रेस पार्टी के दरवाज़े बंद होने जैसी स्पष्ट बात कह डाली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उनके परिवार के सदस्यों ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को राहुल गांधी के मुंह से निकला यह ‘सदवचन’ बहुत नागवार गुज़रा। राहुल गांधी ने तो कट्टरपंथी सोच को लेकर दोनों संगठनों के नाम एक ही वाक्य में लिए थे। परंतु राहुल पर निशाना साधने वालों ने तो बस एक ही राग अलापना शुरू कर दिया कि उन्होंने आर एस एस व सिमी जैसे संगठनों की आपस में तुलना कैसे कर डाली। इस विषय को लेकर राहुल पर आक्रमण करने वालों का कहना है कि सिमी एक आतंकवादी संरक्षण प्राप्त आतंकी संगठन है तथा वह देशद्रोह के म...

तुम्हारे राम का हो ज़िक्र मेरी मस्जिद में....

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नई दिल्ली -राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था शिया पॉइंट की आज संपन्न कोर कमिटी  की बैठक में एक मत से यह तय पाया गया कि बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि विवाद के निपटारे के लिये मुसलिम तंजीमों को उच्चतम न्यायालय की शरण में जाना चाहिए. बैठक में शिया पॉइंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज़हीर जैदी ने कहा कि आज की परिस्थितियों के मद्देनज़र इस देश के मुसलमान इस विवाद को निपटाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि मुसलमानों की नयी पीढ़ी को इस मुद्दे में कोई दिलचस्पी नहीं है. वे देश के विकास में अपनी साझेदारी चाहते हैं. उन्होंने विश्वास  जताते हुए कहा कि यदि उच्चतम न्यायालय अपने फैसले में विवादित भूमि मुसलमानों को दे भी देती है तो भी मुसलमान यही चाहेंगे कि विवादित भूमि राम जन्म भूमि न्यास को हिबा कर दी जाए जिससे यह प्रकरण  सदैव के लिये समाप्त किया जा सके. ज़हीर जैदी ने कहा कि यही विकल्प एक नए सेकुलर हिंदुस्तान को नयी तस्वीर दे सकेगा. उन्होंने कहा कि इस देश का बहुसंख्यक वर्ग धार्मिक तो हो सकता है, साम्प्रदायिक नहीं. उन्होंने कहा कि गेहूं में घुन, चावल में कंकण और सरसों के दानों में राई का होना एक आम बात है. ...

alpst-politics: तुम्हारे राम का हो ज़िक्र मेरी मस्जिद में....

alpst-politics: तुम्हारे राम का हो ज़िक्र मेरी मस्जिद में.... : "नई दिल्ली-राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था शिया पॉइंट की आज संपन्न कोर कमिटी की बैठक में एक मत से यह तय पाया गया कि बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूम..."

मुक़द्दमे का फैसला अगया.../ रंजन जैदी

मुक़द्दमे का फैसला अगया- सदायें दो कि मुहब्बत के शंख गूंजे हैं, अजां  सुनो तो अक़ीदत से सिर झुका लेना. अयोध्या में पसरा खौफ का सन्नाटा छट गया. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और सुनहरी अध्याय आ जुड़ा. अयोध्या में बनवास से राम लौटे तो पूरे देश के मुसलमानों के होठो प़र मुस्कान थिरक उठी..यह अयोध्या वासियों के भाग्य के उदय का वह उजाला था जो अब अयोध्या मे फैलकर अपने नूर की चकाचौंध से सारी दुनिया को आश्चर्यचकित कर देगा. सरयू की गुनगुनाती हुई धाराएँ अब खुश है कि इसके पानियों में अब न तो खून से सनी हुई किरपाने धुलेंगीं, न बेकुसूर ज़ख़्मी मासूम लाशें बहाई जायेंगीं. कल इस पर एक पुल ज़रूर बनेगा, जो अयोध्या को दूसरे शहरो और हिमालय से जोड़ेगा और यह नगरी हिन्दुस्तानी सभ्यता और संस्कृति का इस देश के बाशिंदों के लिये खानए-काबा बन जायगा. राम के बनवास से पहले राजा दशरथ की अयोध्या में इस्लाम नहीं था,और न ही मुसलमान. लेकिन राम के बनवास से लौटते ही युग बदल गया, राजा दशरथ चल बसे, भाई भरत ने राम की खडाव उन्हें वापस लौटा दी, अबतक अयोध्या में कलयुग आगया था. राम आस्था से ऊपर उठ चुके थे और वह घट-घट में ऐस...

alpsT-Politics: मस्जिद की लड़ाई हार भी गए तो सुप्रीम कोर्ट नहीं जा...

alpsT-Politics: मस्जिद की लड़ाई हार भी गए तो सुप्रीम कोर्ट नहीं जा... : "Thursday, September 30, 2010 अयोध्या. राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे बुजुर्ग मुद्दई मोहम्मद हाशिम अंसारी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय..."

मस्जिद की लड़ाई हार भी गए तो सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएंगे'

Thursday, September 30, 2010 अयोध्या. राम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के सबसे बुजुर्ग मुद्दई मोहम्मद हाशिम अंसारी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष लखनऊ पीठ के आने वाले ऐतिहासिक फैसले से कुछ घंटे पहले कहा कि इस मसले पर चाहे जो भी  निर्णय आए,  वह उच्चतम न्यायालय नहीं जाएंगे। इस मसले को लेकर हो रही राजनीति गहमागहमी से दुखी करीब ९0 वर्षीय श्री अंसारी ने कहा कि वह उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करेंगे लेकिन यदि फैसला उनके खिलाफ आता है तो भी वह उच्चतम न्यायालय नहीं जाएंगे। श्री अंसारी ने कहा कि इस विवाद से देश को काफी नुकसान हो चुका है। वह चाहते हैं कि अब इस विवाद का समापन हो और अयोध्या देश के विकास में भागीदार बने। अयोध्या के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाबलों की तैनाती से वह आहत दिखे और इसके लिए उन्होंने एक हद तक मीडिया को भी जिम्मेदार ठहराया। बाबरी मस्जिद की लड़ाई के सबसे बड़े योद्धा  की बात की जाए तो उसमें सबसे ऊपर 90 साल के बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी का नाम आता है। अंसारी पिछले साठ साल से बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहे हैं लेकिन उनके लिए सबसे जरूरी है देश की शां...

alpsT-Politics: दुनिया की हर इबादतगाह की बुनियाद ज़मीन में होती है/...

ranjan. : "दुनिया की हर इबादतगाह की बुनियाद ज़मीन में होती है. उसी ज़मीन प़र बैठकर या खड़े होकर आम इंसान सिजदा करता है, पूजा-प्रार्थना करता है. ये प्रार्थ..."

दुनिया की हर इबादतगाह की बुनियाद ज़मीन में होती है/ranjan zaidi

दुनिया की हर इबादतगाह की बुनियाद ज़मीन में होती है. उसी ज़मीन प़र बैठकर या खड़े होकर आम इंसान सिजदा करता है, पूजा-प्रार्थना करता है. ये प्रार्थनाएं, आराधनायें, इबादतें, आम इन्सान अपनी और इंसानियत की भलाई और सुरक्षा के लिये करता है. कुछ लोग उसी ज़मीन प़र खड़े होकर अहंकार की तलवार और हिंसा का भाला उठा लेते हैं. ज़मीन का बटवारा कर उसपर खड़े होकर गर्व करने लगते हैं. वह भूल जाते हैं कि जिस ज़मीन प़र वे खड़े हैं, उस ज़मीन के नीचे कोई ज़मीन नहीं है. जो ज़मीन बिना ज़मीन के हवा में घूम रही है और आधारहीन है, उसे  इबादत के लिये न मंदिर की ज़रूरत है, न मस्जिद की. न गिरजे जी. न कलीसाओं की. न पंडित की, न मौलवी और पादरी की. वह जानती है कि जिस संसार को उसपर बसाया गया है, उसे जिंदा रखना है. इसी लिये वह सारी दुनिया की माँ है.लेकिन  अपने स्वार्थवश  इंसान अपनी माँ को भी बाटने लग जाता है जबकि इंसान जानता है कि वह खुद आधारहीन है. ज़मीन के टुकड़ों की जंगें शताब्दियों से लड़ी जा रही हैं. अयोध्या ने भी सैकड़ों आधारहीन जंगें देखी हैं. उसने देखा कि भगवान् कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया तो चमत्कार कहलाया, बाहुबली हनुमा...

यहां अब दलितों की सरकार है/अनिल पांडेय

दलित...यह एक ऐसा शब्द है, जो सदियों से नफरत और हिकारत का पर्याय रहा है. हजारों सालों से वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से शोषित होता आ रहा है. वह अपने वोट की ताकत से लोगों को सत्ता में पहुंचाता रहा, लेकिन खुद सत्ता से बहुत दूर, सामाज के अंतिम पायदान पर खड़ा रहा. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार दलितों के राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है. यहां अब दलितों की सरकार है. बसपा सरकार के शासन में दलित खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं, क्या उनके जीवन में कोई बदलाव आ रहा है...इसी का जायजा लेने द संडे इंडियन के प्रमुख संवाददाता अनिल पांडेय और फोटोग्राफर मुकुंद डे निकल पड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश के देशाटन पर.... मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटी उस पच्चीस साल की दलित विधवा सुनीता की सूरत बार-बार आखों के सामने आ जाती..वह दो बच्चों की मां थी. ऐसे बच्चे, जिनके सिर से बाप का साया उठ चुका है. दिसंबर की गुलाबी ठंड में बिना गर्म कपड़ों के वे बच्चे... "जब बाप ना बाय, तो गरम कपड़ा के दिआई???" एक मां की दुख भरी आवाज बार बार ...

alpsT-Politics: इसराइली राजदूत : दरगाह की ज़ियारत/नारायण बारेठ

alpsT-Politics: इसराइली राजदूत : दरगाह की ज़ियारत/नारायण बारेठ : "बीबीसी हिंदी संवाददाता, जयपुर, इसराइली राजदूत (चित्रः दीपक शर्मा) ऐसा पहली बार हुआ है कि इसराइल के राजदूत दरगाह की ज़ियारत करने आए हों. अज..."

इसराइली राजदूत : दरगाह की ज़ियारत/नारायण बारेठ

बीबीसी हिंदी संवाददाता, जयपुर,  इसराइली राजदूत (चित्रः दीपक शर्मा) ऐसा पहली बार हुआ है कि इसराइल के राजदूत दरगाह की ज़ियारत करने आए हों. अजमेर शरीफ़ में सूफ़ी संत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर एक अलग ही नज़ारा देखने में आया जब भारत में इसराइल के राजदूत मार्क सोफ़ेर ने वहाँ जा कर अक़ीदत के फूल पेश किए और अमन के लिए दुआ की. सदियों पुरानी इस पवित्र दरगाह में ये पहला मौक़ा था जब किसी इसराइली राजदूत ने अपनी हाज़री दी हो.खुद सेफ़ोर ने कहा कि सूफ़ीवाद की तालीम और उसूलों से पूरे जहाँ को एक धागे में पिरोया जा सकता है. सोफेर अपने साथियों के साथ अचानक दरगाह पहुंचे तो ख़ादिमों की संस्था अंजुमन के पदाधिकारियों ने उनकी अगवानी की.     एक खादिम के नाते हमने उनकी अगवानी की, ज़ियारत करवाई और मुसलमान होने के नाते हमने अपने जज़्बात से उन्हें रूबरू करवाया. सरवर चिश्ती इसराली राजदूत ने मज़ार शरीफ में चादर और अकीदत के फूल पेश किए. उस वक़्त रोज़ा इफ्तार का लम्हा आया तो दरगाह परिसर के आरकाट दालान में रोज़ेदारों ने रोज़ा खोला तो इसराइली राजदूत भी इसमें शरीक हुए. एक खादिम के मु...

आजतक पर हमला /AJTAK PAR HAMLA

आजतक  पर  हमला  लोकतंत्र प़र फासीवाद का हमला है. इसकी पुरजोर भर्त्सना की जानी चाहिए. इसतरह के हमले हमें शर्मसार करते हैं. भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में जब इस तरह के हमले होने लगें तो समझ लेना चाहिए कि सब कुछ सामान्य नहीं है. हमें गहराई से पड़ताल करना चाहिए कि फासीवाद का सहारा लेकर देश की लोकतान्त्रिक अस्मिता को कौन लोग दागदार करना चाह रहे हैं? मुस्लिम दुश्मनी से कोई हल निकलने वाला नहीं है.इस्राईल की शैली को अपनाकर भारत में मुसलामानों के विरूद्ध लगातार दुष्प्रचार करते रहना भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है. अब अतिवादियों को संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर भारतीय-लोकतंत्र को मज़बूत करने की शुरुआत करनी चाहिए. विनाशकाले विपरीत बुद्धि....

ओबामा से आशाएं?/शनिवार, २० फरवरी २०१०

मैंने २३ जनवरी , 2009 के ब्लॉग में जो कुछ लिखा था , अब वही अक्षरशः सत्य होता जा रहा है। अमेरिका के ४४ वें राष्ट्रपति। बराक हुसैन ओबामा। दुनिया ने बहुत उम्मीदें लगा रखी हैं। भारत ने भी। अच्छा है , लेकिन ओबामा चाह कर भी अमेरिका की १० वर्ष आगे की उन नीतियों की लक्ष्मण रेखा लाँघ नहीं पाएंगे , जो पहले से खींच दी गयी हैं। अमेरिका अपनी आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए किसी भी हद को पार कर सकता है। अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए वह अफगानिस्तान का कब्जा नहीं छोडेगा । वह इराक के तेल का दोहन जारी रखेगा क्योंकि अब तक उसने तेल के आधुनिक रास्ते निर्मित कर लिए हैं । साम्यवादी देशों को अब वह उभरने नहीं देगा। इस्राईल की सेना के प्रभुत्त्व को कम नहीं होने देगा।वह उसके सामरिक हितों को साधने वाला देश है और अमेरिका की ३६ % इकोनोमी जूस की ...