मंदिर-मस्जिद विवाद/ज़हीर जैदी


Zaheer Zaidi, CP-Shia Point 
 अयोध्या मंदिर-मस्जिद विवाद को देखते हुए इलाहाबाद  हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के 30 सितम्बर के  फैसले  के  खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट  में अपील  करना  ज़रूरी  है. यह इस देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के लिये भी ज़रूरी है. राष्ट्रीय संस्था शिया प्वाईंट से जुड़े  देश के लगभग दो करोड़ शियों की भी यही राय है. हालांकि सुन्नी वक्फ बोर्ड मस्जिद मुद्दे को सुन्नी मुसलमानों की भावनाओं के मामले से जोड़ते हुए इसे शियों से अलग रखने में ही अपनी बेहतरी मानता आया है. जबकि शियों ने इस मुद्दे को भी इस देश के अल्पसंख्यकों का मुद्दा मानकर इसे अपना पूरा समर्थन दिया. क्योंकि शिया समुदाय राष्ट्र-हित में इस मुद्दे को निबटाना चाहता है. कारण यह है कि जब दंगे होते हैं तो नुकसान खालिस सुन्नी मुसलमानों को ही नहीं होता है, शियों को भी पंक्ति में लाकर उन्हें नुकसान पहुंचाया जाता है. अवसरवादी राजनीति के ख़िलाड़ी मुहम्मद अदीब जैसे सांसद  ऐसी वैमनस्यता का भरपूर लाभ उठाते हैं. इसका एक उदाहरण ५ अगस्त, २००६ को श्रीमती सोनिया गाँधी के निवास प़र जो बैठक हुई थी उसमें साफ तलाशा जा सकता है. उस बैठक में फिल्म निदेशक महेश भट्ट, शिया आलिम मौलाना सय्यद अकील गार्वी और चन्द दूसरे सुन्नी मौलवी शामिल थे. मीटिंग के दौरान एक सुन्नी मौलाना ने श्रीमती सोनिया गाँधी से स्पष्ट शब्दों में कहा कि आप आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का अध्यक्ष की पोस्ट बेशक किसी हिन्दू को  दे दें, मगर बराय मेहरबानी के शियों का फेवर न करें.ज्ञातव्य हो कि श्रीमती गाँधी तब इस पद प़र एक शिया मौलाना को पदासीन करना   चाहती थीं.बात सही भी थी कि इस देश का राष्ट्रपति मुसलमान हो सकता है तो आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड का चैरमैन शिया समुदाय का व्यक्ति क्यों नहीं हो सकता है? तब इस मुद्दे प़र मीटिंग में काफ़ी विवाद उठ खड़ा हुआ था.  .हालाँकि जब देश के अल्पसंख्यक मुसलमानों की संख्या की बात आती है तो दो करोड़ शिया २० करोड़ मुसलमानों में जोड़ लिये जाते हैं और AIMPLB यानी आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सबकी आवाज़ बन जाता है जिसकी मोहम्मद अदीब और राबे नदवी जैसे लोग नुमयिन्दगी करने लग जाते हैं तथा हज कमिटी इनके स्वार्थ-सिद्धि का केंद्र बन जाता है.आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के पहले अध्यक्ष अली मियाँ नदवी थे. सन १९७१ के आम चुनाव में AIMPLB ने श्रीमती इंदिरा गाँधी को मुसलमानों का समर्थन जुटाया था. १९७३  AIMPLB  कांग्रेस के और करीब आई और इससे जुड़े नेता अपने स्वार्थों की सिद्धि में जुट गए. अली मियाँ नदवी के बाद उनके रिश्तेदार राबे हसन नदवी अध्यक्ष बने, जबकि डॉ0 सय्यद कल्बे सादिक न केवल उनसे सीनियर और उपाध्यक्ष थे बल्कि अकादमिक, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के प्रबुद्ध चिन्तक, विचारक और प्रतिष्ठित शिया समुदाय-गुरू भी थे. राबे हसन नदवी देश के सुन्नी मतावलंबियों में वहाबियों के गुरू हैं.वहाबियत का केंद्र सऊदी अरब माना जाता है. ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि भारत कि २० करोड़ मुसलमानों की सोच का प्रवक्ता आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड  कैसे बन सकता है? क्या देश के २० करोड़ मुस्लिम मतदाताओं ने एक मत से इन्हें अपना प्रवक्ता नियुक्त किया है? या ऐसे बोर्ड के १०० सदस्यों अथवा कुछ  कथित नेताओं को अपनी तकदीर के फैसले करने का अधिकार सौंप दिया है ? AIMPLB  के वरिष्ठ ओहदेदार कमाल फारूकी कुछ समय पहले तक  तमाम एजेंसियों को यह कैसे यकीन दिलाते रहे कि मुसलमान सुप्रीम कोर्ट नहीं जायेंगे और वे मिल-बैठकर मामले को सुलझा लेंगे. यदि मामला इतना ही आसान था तो यही बात पहले अमल में क्यूँ नहीं लायी गयी, अदालत के फैसले के बाद ही क्यूँ? और फिर कमाल फारूकी मुसलमानों के प्रवक्ता कैसे बन गए? कहीं उनकी निगाह फिर किसी ओहदे प़र तो नहीं टिकी हुई है? शुक्र है कि इस देश के मुसलमानों ने षड्यंत्र को समय रहते भांप लिया और कमाल फारूकी को एक तरफ कर दिया और वे चुप हो गए अन्यथा....?  मेरे विचार से यह भी एक तरह का भारतीय मुसलमानों के साथ किया जाने वाला कथित खाप पंचायती षड्यंत्र है. इस षड्यंत्र के तहत मुसलमानों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक विकास को नज़र अंदाज़ कर दिया जाता रहा है. ऐसे कथित मुस्लिम नेता राजनीतिक षड्यंत्रकारियों की शतरंज के मोहरे के सिवा कुछ भी नहीं हो पाते हैं. इस देश के आम अवाम भी शिया प्वाईंट के इस दृष्टिकोण से कहीं तक सहमत हैं.क्योंकि हमारे देश के अवाम इस तरह के विवादों और झगड़ों से मूलतः ऊब चुके हैं. यही स्थिति हमारे देश के युवाओं की भी है जो देश का विकास चाहते हैं और उसमें अपनी भागीदारी भी. यदि इस तरह के मामलों को बढाया जाता रहा तो ३०० मस्जिदों से सम्बंधित विवाद देश की दो बड़ी कौमों को कभी सुकून से नहीं रहने देंगे और अवसरवादी तत्व इन झगड़ों से निरंतर लाभ उठाते रहेंगे. लोकतंत्र को कमज़ोर करते रहने का अतिवादियों का यह एक सोचा-समझा षड्यंत्र है.जैसा कि मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में धार्मिक आस्था का सम्मान तो किया जा सकता है, न्याय-व्यवस्था में फैसले नहीं किये जा सकते. यही हमारी न्याय-व्यवस्था की पाकीजगी और उसका चरित्र रहा है जिसे अव्यवस्थित और अस्थिर नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि यही हमारे देश के लोकतंत्र की शक्ति है. न्यायालय का जो फैसला हुआ, वह संविधान के अनुरूप न होकर राजनीत से प्रेरित कहा जा सकता है. मेरे इस विचार से शायद सलमान खुर्शीद, अहमद पटेल और राज्य सभा के सांसद मुहम्मद अदीब भी सहमत होंगे.
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*लेखक भारतीय 'शिया अल्पसंख्यक समुदाय' की संस्था शिया प्वायंट  के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. संपर्क : मोबाईल : 9810711172

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