मनुष्य और आतंकवाद /रंजन जैदी
मैं समझता हूँ कि उन सवालों पर विचार ही न किया जाय जो सवाल उपहासास्पद हों. जो बुद्धिमान होते हैं, वे चिंतन करते है. जो अज्ञानी हैं, वे धर्म के लेबिल लगे खाली डिब्बों की तरह हैं, जिनमें कंकड़ पड़े हुए हैं. थोडा हिलाते ही वे आवाज़ करने लगते है. वास्तविकता यह है कि धर्म जीवन जीने की एक शैली है. शैलियाँ भिन्न हो सकती है. मनुष्य को अपनी शैली से मोह हो सकता है. मोह का सम्बन्ध मायावी है. मोह की आत्मा का नाम आस्था है. आस्थाएं अडिग नहीं रहती हैं, इसलिए उसमें विचलन पाया जाता है. शैलियाँ परम्पराओं को जन्म देती हैं. परम्पराएं अच्छी-बुरी हो सकती है. इनकी स्वीकारोक्ति का आर्थिक आधार होता है. दाढ़ी रखना परंपरा में शामिल है, किन्तु यह परिस्थितिजन्य स्वीकारोक्ति की एक स्थिति है. दुनिया में सभी धर्म के लोग अपनी पहचान के अंतर्गत दाढ़ी रखते है. सभी न तो मुसलमान होते हैं और न ही आतंकवादी. आतंकवाद के जन्म के कारणों का जानना ज़रूरी है. हर युग में आतंकवाद रहा है. कभी हमने आतंकवादियों को राक्षस कहा तो कभी बाग़ी या टेररिस्ट. जो वर्ग सम्बंधित लागू व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता, वह अपना अलग रास्ता चुनता है. आतंकवाद भी असंतुष्टों और अतिवादियों के संघर्ष का एक रास्ता है. गाँधी जी और मार्टिन लूथर इसके विरोधी थे, लेकिन माओत्सेतुंग इसके समर्थक. इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के खिलाफ जब कुर्दों और शियों के एक वर्ग ने विद्रोह किया तो तानाशाही ने हजारों लोगों कों मौत के घाट उतार दिया. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के जब निजी हितों को चोट पहुंची तो उसने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम का ही तख्ता पलट दिया. यासिर अराफात की शुरूआत आतंकवाद की कोख से ही हुई थी. बाद में क्या हुआ, सब जानते है. जब इन्कलाब-ए-ईरान वहां के तत्कालीन शाह के खिलाफ शुरू हुआ तो, तत्कालीन सरकार द्वारा अल्लामा खुमैनी को आतंकवादी घोषित कर दिया गया. जब शाह का तख्ता पलटा तो खुमैनी ईरान की नयी रेवोलुश्नरी पार्टी और सरकार के काएद बन गए. वह राष्ट्रवादी घोषित कर दिए गए. मिस्र सहित दुनिया के असंख्य देशों की जेलों में असंख्य बागी या विद्रोही अतिवादी बंद हैं. उदहारण और भी बहुत हैं.. तो मालूम हुआ कि सारी जंगें, झडपें और संघर्ष अस्तित्व के अस्थायित्व के लिए होती हैं. इसमें सफलता भी है और विफलता भी. जहाँ तक व्यक्ति का प्रश्न है, वह न बुरा होता है न अच्छा, वह तो परिस्थितियों का दास है. जंगली पशुवों की तरह उसका भी जीवन-संघर्ष चलता रहता है. लाखों वर्षों से इस तरह के संघर्ष चल रहे हैं, आगे भी इसी तरह से चलते रहेंगे. यही मानवी-जीवन का चक्र है. यही मानव-समाज की प्राकृतिक नियति है. 09350934635
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें