अत्यंत दुखद समाचार /रंजन ज़ैदी
ए नबीटी के भाई दीपक गुप्ता के समाचार से पता चला कि कादम्बिनी और साप्ताहिक हिंदुस्तान का प्रकाशन अब लगभग बंद कर दिया गया है. एक धक्का सा लगना स्वाभाविक था. ऐसा लगा जैसे मेरे ही घर में दो बड़े जिस्मों का अवसान हो गया हो. इसी बिग-हॉउस से ही तो मैंने अपने जीवन के संघर्ष की शुरुआत की थी. तब के दिनों में कितना कुछ लिखा होगा मैंने. कितनी यादें जुड़ी हुयी हैं इस बिग-हॉउस से. शायद एक किताब की शक्ल में आये कभी. आज भी जब विश्राम वाचस्पति या उस बिग-हॉउस के मित्रों से सीधे या फेसबुक पर संपर्क होता है, तो ऐसा लगता है मानो मैं विदेश में हूँ और वहां मेरा कोई देश से आया मेहमान मिल गया हो. कितना आनंदित हो जाता हूँ मैं. उन दिनों के लोग कितना स्नेह करते थे. स्वर्गीय दुर्गा प्रसाद शुक्ल से जब भी हम मिलते, कादम्बिनी का एक नया असाइनमेंट मिल जाता. मानो, वही मेरी नियति थी. स्वर्गीय राजेंद्र अवस्थी जी तो गॉड-फ़ादर जैसे थे, लेकिन ग़ज़ब के दोस्त भी थे. परिवार के एक सदस्य की तरह मैं उनके घर जाता था. ...