मनुष्य को अहंकार से बचना चाहिए/ रंजन ज़ैदी
हम नहीं जानते कि रात का बारीक पर्दा चाँद और सूरज को कैसे ढांप लेता है. विज्ञान कहता है कि धरती घूमती है. हम नहीं जानते कि धरती, सूरज, चाँद और सितारे ब्रह्माण्ड में एक विशेष फासले पर कैसे लटके हुए घूमते रहते हैं.
विज्ञान बताता है कि यह गुरुत्वाकर्षण है. इसके आगे न बूझे जाने वाले अनेकानेक सवाल हैं, जिनके उत्तर क़ुरआन देता है, इससे पहले वेद, बाईबिल, इंजील और तौरेत भी जवाब देते रहे हैं. क़ुरआन और आगे के रहस्योद्घाटन कर पुष्टि करता है लेकिन हम में बहुत अहंकार है कि सत्य को सत्य नहीं कह सकते. मूर्खता के साथ आडम्बरों में उलझे रहते हैं. जो इस मर्म को समझते हैं वे सितारों की चालों को पकड़ लेते हैं. क़ुरआन ने ऐसे विद्वानों को 'सितारापरस्त' कहा है. यही सितारापरस्त ज्योतिषी या ज्योतिषचार्य कहे जाते हैं.
सत्य अपने विभिन्न रूपों में करोणों वर्षों से गर्दिश कर रहा है. मूर्ख यही बात नहीं समझ पाते कि समय
किसी को भी एक सीमित मुद्दत के बाद जीवित रहने की अनुमति नहीं देता है. ज़िन्दगी की उम्र बहुत थोड़ी सी होती है. इसीलिए हर जानदार और बेजान वस्तु नश्वर कही गई है. 30 लाख साल पहले के लोग आज नहीं हैं, माया संस्कृति लुप्त हो चुकी है. सभ्यताएं बनती बिगड़ती रहती हैं. लिपियाँ भी जीवित नहीं रह सकी हैं. मोहनजोदड़ो की लिपि आज तक नहीं पढ़ी जा सकी है.
किसी को भी एक सीमित मुद्दत के बाद जीवित रहने की अनुमति नहीं देता है. ज़िन्दगी की उम्र बहुत थोड़ी सी होती है. इसीलिए हर जानदार और बेजान वस्तु नश्वर कही गई है. 30 लाख साल पहले के लोग आज नहीं हैं, माया संस्कृति लुप्त हो चुकी है. सभ्यताएं बनती बिगड़ती रहती हैं. लिपियाँ भी जीवित नहीं रह सकी हैं. मोहनजोदड़ो की लिपि आज तक नहीं पढ़ी जा सकी है.
मनुष्य को अहंकार से बचना चाहिए. अहंकार ने पृथ्वी के बड़े-बड़ों को गुम कर दिया. हर भाषा, धर्म और जातियों-प्रजातियों में अहंकारी जन्मे, मिट गए. कोई श्रेष्ठ नहीं है. कुबेर जैसा धनाढ्य आज नहीं है. आज के कुबेर भी कल नहीं होंगे. आज मैं हूँ, कल नहीं हूँगा. यही जीवन का चक्र है. प्रकृति की ऊर्जा से जीवन चलता है, इसमें धर्म नहीं है, उसे हम अपनी आवश्यकताओं के तहत स्थापित और परिभाषित करते हैं.
शेर जंगल का राजा बताया जाता है, प्रकृति ने उसके लिए घास नहीं पैदा की है, उसकी ऊर्जा के लिए गोश्त का प्रबंध किया है. ये गोश्त वनस्पति खाने वाले पशुओं में होता है. शेर, दूसरे शेर को मार सकता है, खा नहीं सकता, मुर्दार के लिए छोड़ देता है. लेकिन वही शेर मरी हुई नीलगाय, जंगली भैंस या दूसरे जानवरों की मुर्दा लाशें ज़मीन खोदकर नोच खाता है.
जंगली सभ्यता ने मनुष्य को खाने, रहने और जीने के संस्कार दिए. जंगल से बाहर आकर उसने अपनी अलग सभ्यता और संस्कार गढ़े. यहीं से समाज का जन्म हुआ. अस्तित्व के स्थायित्व की जंग शरू हुयी, क़बीले बने और ज़मीनें बांटी गयीं. ज़मीनें कम पड़ीं तो युद्ध लड़े गए. युद्ध में जब नेतृत्व का समय आया तो राजा और राजधर्म को जन्म दिया गया और यहीं से अहंकार ने जन्म लिया लेकिन तब भी जीवन चलता रहा.
मुहम्मद साहब के दामाद और अपने समय के महान दार्शनिक खलीफा हज़रत अली से एक मुसाहिब ने
पूछा, या अमीरुल मोमिनीन! हम इंसानों की समझ में नहीं आता कि हम किस परिंदे का गोश्त खाएं? हज़रत अली ने कहा, इस्लाम में वह परिंदा हराम है जो पंजे में दबाकर नोचते हुए खाये. वह परिंदा हलाल है जो सीधे चोंच से चुग कर खाये. इसी तरह वह जानवर इस्लाम में हराम है जो पिछली टांगों से बैठता हो और वह जानवर हलाल है जो अगली टांगों से बैठता हो. सवाल है कि ऐसी व्यवस्था क्यों की गयी? जवाब हो सकता है कि मुर्दार खाने वाले जानवर और परिंदे रबीजग्रस्त होते हैं, घास और वनपतियाँ खाने या चुगने वाले पशु और परिंदे मांसाहारियों को नुकसान नहीं पहुंचाते. लेकिन मनुष्य प्रकृति के विधान को समझ नहीं पाता, वह मांसाहारी जानदारों को भी घास खिलाना चाहता है. संपादक
पूछा, या अमीरुल मोमिनीन! हम इंसानों की समझ में नहीं आता कि हम किस परिंदे का गोश्त खाएं? हज़रत अली ने कहा, इस्लाम में वह परिंदा हराम है जो पंजे में दबाकर नोचते हुए खाये. वह परिंदा हलाल है जो सीधे चोंच से चुग कर खाये. इसी तरह वह जानवर इस्लाम में हराम है जो पिछली टांगों से बैठता हो और वह जानवर हलाल है जो अगली टांगों से बैठता हो. सवाल है कि ऐसी व्यवस्था क्यों की गयी? जवाब हो सकता है कि मुर्दार खाने वाले जानवर और परिंदे रबीजग्रस्त होते हैं, घास और वनपतियाँ खाने या चुगने वाले पशु और परिंदे मांसाहारियों को नुकसान नहीं पहुंचाते. लेकिन मनुष्य प्रकृति के विधान को समझ नहीं पाता, वह मांसाहारी जानदारों को भी घास खिलाना चाहता है. संपादक
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