अत्यंत दुखद समाचार /रंजन ज़ैदी

     

नबीटी के भाई दीपक गुप्ता के समाचार से पता चला कि कादम्बिनी और साप्ताहिक हिंदुस्तान का प्रकाशन अब लगभग बंद कर दिया गया है. एक धक्का सा लगना स्वाभाविक था.  ऐसा लगा जैसे मेरे ही घर में दो बड़े जिस्मों का अवसान हो गया हो. 

      इसी बिग-हॉउस से ही तो मैंने अपने जीवन के संघर्ष की शुरुआत की थी. तब के दिनों में कितना कुछ लिखा होगा मैंने. कितनी यादें जुड़ी हुयी हैं इस बिग-हॉउस से. शायद एक किताब की शक्ल में आये कभी.  आज भी जब विश्राम वाचस्पति या उस बिग-हॉउस के मित्रों से सीधे या फेसबुक पर संपर्क होता है, तो ऐसा लगता है मानो मैं विदेश में हूँ और वहां मेरा कोई देश से आया मेहमान मिल गया हो. 

      कितना आनंदित हो जाता हूँ मैं. उन दिनों के लोग कितना स्नेह करते थे. स्वर्गीय दुर्गा प्रसाद शुक्ल से जब
भी हम मिलते, कादम्बिनी का एक नया असाइनमेंट मिल जाता. मानो, वही मेरी नियति थी. स्वर्गीय राजेंद्र अवस्थी जी तो गॉड-फ़ादर जैसे थे, लेकिन ग़ज़ब के दोस्त भी थे. परिवार के एक सदस्य की तरह मैं उनके घर जाता था. 

      शायद हर शाम  घंटों तक हम अवस्थी जी की अम्बेसडर में गंगा प्रसाद विमल, (एक ज्योतिषी और एक वैद्य के साथ) मंडी हॉउस में घूमते रहते, वभिन्न विषयों पर बहसें होती रहतीं, (ज़्यादातर अवस्थी जी ही बोलते थे). 2006, 7,8 मेरे व्यस्ततम वर्ष रहे थे. उनदिनों मेरा शोध भी अंतिम चरण पर था. उन्हीं दिनों अवस्थी जी ने मुझे डॉ. बिंदेश्वरी पाठक की नई हिंदी पत्रिका 'सुलभ शौचालय' का संपादन करने के लिए भेजा था. 

      तब एक तरफ़ वहाँ साप्ताहिक हिंदुस्तान की सपादक श्रीमती मृणाल पांडेय थीं. बहुत स्नेह था उनका. उन दिनों चुनाव के दिन थे. मंदिर का मुद्दा गर्म था. मुझे कवर स्टोरी दी गयी. एक बार एएमयू पर भी कवर स्टोरी दी गयी.  साप्ताहिक हिंदुस्तान में फीचर्स, समीक्षाएं, लेख कहानी, गरज कि सब तरफ़ मैं फैलता जा रहा था. कादम्बिनी में मैं इतिहास पर लिख रहा था. सब कमाल के लेख थे. आज मैं आश्चर्यचकित हूँ. समय मिला तो कभी उन लेखों का संकलन प्रकाश में लाऊंगा. 

      ऐसा ही हाल टाईम्स बिल्डिंग में था, सारिका के दफ्तर में था. वामा में भी था. पता नहीं वे दिन सब कहाँ चले गए. एक वर्ष तक दैनिक जागरण में रहा तो ऊब गया, टाईम्स का माहौल वहां नहीं था. कुछ न कुछ कर गुजरने का मन हुआ करता था. कुछ न कुछ कर गुजरने का वहाँ अवसर नहीं था. निकल आया.  
    धर्मयुग बंद हुआ, उसके आखरी अंक में मेरी कहानी थी, सारिका बंद हुई उसमें भी मेरी कहानी थी. साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी में तो इतना लिखा कि आज खुद मुझे आश्चर्य होता है. इन दोनों पत्रिकाओं के बंद होने का दुःख शायद मैं कभी न भुला पाऊंगा . अफ़सोस!  
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