यह महज मोदी के 'उदय' और आडवानी के ‘अस्त’ होने का संघर्ष नहीं है,,,,,,,/श्रीराम तिवारी*
एलके अडवाणी, नमो और बीजेपी के अध्यक्ष इं दिरा युग में कुछ कालखंड के लिये एक दुष्प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा था। ये तब की बात है जब 'इंदिरा इज इंडिया' का उद्घोष चल रहा था। हालाँकि 1971 में पाकिस्तान पर भारत की विजय ने इंदिरा जी को ‘दुर्गा अवतार’ घोषित कर दिया था। यह उपाधि तब ' अटल बिहारी वाजपायी' ने इंदिराजी को प्रदान की थी। वे इतनी आत्ममुग्ध हो गयीं कि अपने सारे व्यक्तिगत फैसले देश पर लादने लगीं। दिखावे मात्र के लिये देश की लोकतान्त्रिक संस्थाओं को सिर्फ मुहर लगवाने तक ही सीमित कर दिया गया। बाद में दुनिया ने जाना कि उन्हें ‘प्रभुता पाय काहि मद नाहीं‘ से भी आगे आपातकाल का कलंक धारक होना पड़ा। जेल भी जाना पडा। संघ परिवार के सर्वेसर्वा भी अब उसी रास्ते पर चल रहे हैं। सब कुछ पहले से नागपुर में तय हो जाता है। दिखावे के लिये भाजपा संसदीय बोर्ड या केन्द्रीय कार्य कारिणी की आम सहमति का ढोंग किया जाता...