संदेश

फ़रवरी, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यह महज मोदी के 'उदय' और आडवानी के ‘अस्त’ होने का संघर्ष नहीं है,,,,,,,/श्रीराम तिवारी*

चित्र
एलके अडवाणी, नमो और बीजेपी के अध्यक्ष            इं दिरा युग में कुछ कालखंड के लिये एक दुष्प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा था। ये तब की बात है जब 'इंदिरा इज इंडिया' का उद्घोष चल रहा था। हालाँकि 1971 में पाकिस्तान पर भारत की विजय ने इंदिरा जी को ‘दुर्गा अवतार’ घोषित कर दिया था। यह उपाधि तब ' अटल बिहारी वाजपायी'  ने  इंदिराजी  को प्रदान की थी। वे इतनी आत्ममुग्ध हो गयीं कि अपने सारे व्यक्तिगत फैसले देश पर लादने लगीं। दिखावे मात्र के लिये   देश की लोकतान्त्रिक संस्थाओं को सिर्फ मुहर लगवाने तक ही सीमित कर दिया गया। बाद में दुनिया ने जाना कि उन्हें ‘प्रभुता पाय काहि मद नाहीं‘ से भी आगे आपातकाल का कलंक धारक होना पड़ा। जेल भी जाना पडा।            संघ परिवार के सर्वेसर्वा भी अब उसी रास्ते पर चल रहे हैं।                   सब कुछ पहले से नागपुर में तय हो जाता है। दिखावे के लिये भाजपा संसदीय बोर्ड या केन्द्रीय कार्य कारिणी की आम सहमति का ढोंग किया जाता...

नरेंद्र मोदी, मुसलमानों को नज़रअंदाज़ कर सत्ता के शीर्ष तक नहीं पहुँच पाएंगे /रंजन ज़ैदी

चित्र
(दायें से बाएं) लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी  उ म्र के लम्बे समय तक  भाई नरेंद्र मोदी  आरएसएस के  प्रचारक रहे.जो सिखाया  गया, उसी का गांव-गांव प्रचार करते रहे. बताया गया कि कर्मफल की आकांक्षा किये बिना कर्म करता रह. कर्म का अर्थ है, पूर्व-जन्म में किये गए कार्य। गोलवरकर  ने 'महाराष्ट्र टाइम्स'  में कहा,' जाति-प्रथा दैवीय-रचना है, इसलिए ईश्वर-प्रदत्त है'.  तब सवाल  इस देश में आतंकवाद यहाँ के मासूम मुसलमानों की वजह से नहीं गश्त कर रहा है. जहाँ से इसके परनाले गिर रहे हैं, भावी प्रधान मंत्री पद के दावेदार 'नरेंद्र मोदी' को  पहले उन छतों की मुंडेरों को सही करना होगा, क्योंकि वह उन छतों की  गांठों वाली घास से ढके सूराखों और कच्ची मिटटी की  फिसलन भरी ढलानों को भलीभांति पहचानते हैं। उठा कि  नरेंद्र मोदी  अपने भाषण में अपनी सरीखी जातियों, वर्गों और पिछड़ी जातियों के साथ होते रहने वाले शोषण और अन्याय का रोना क्यों ...

केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण का लेटेस्ट संस्करण है./डॉ.रंजन ज़ैदी

चित्र
अ गर मैं यह कहूँ कि अरविंद केजरीवाल जयप्रकाश नारायण का लेटेस्ट संस्करण है यानि शक्तिशाली भारत का भावी स्वप्न, जिसे एक बड़ी वैचारिक-राजनीतिक क्रांति की ज़रुरत है, तो गलत नहीं होगा, लेकिन उनमें भी कुछ कमियां हैं. वे ऐसे लोगों से घिरे हैं जो उनके प्रति भी वफादार नहीं हैं. अनुभवहीन, बड़बोले, स्वार्थी और आरएसएस की शाखाओं से निकले अवसरवादी सलाहकारों के मोह में ग्रस्त लोगों से घिरे हैं. उनके पास अच्छे राजनीतिक सलाहकार नहीं हैं। जो हैं, वे दूरी बनाकर नज़र बनाये रखते हैं.  ऐसे लोगों को केजरीवाल की नीयत पर संदेह नहीं है लेकिन वे उनके कॉकस को खतरनाक मानते हैं. इमर्जेंसी से पहले श्रीमती इंदिरा गांधी इसी तरह के कॉकस का शिकार हो गई थीं.  यही कॉकस अरविंद केजरीवाल को आने वाले समय में सत्ता से बाहर करने में मददगार साबित होगा। ' आ म   आदमी   पार्टी '   सही   गति   से   अपने   लक्ष्य   की   ओर   बढ़   रही   थी   कि ...