नरेंद्र मोदी, मुसलमानों को नज़रअंदाज़ कर सत्ता के शीर्ष तक नहीं पहुँच पाएंगे /रंजन ज़ैदी

(दायें से बाएं) लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी 
म्र के लम्बे समय तक भाई नरेंद्र मोदी आरएसएस के 
प्रचारक रहे.जो सिखाया गया, उसी का गांव-गांव प्रचार करते रहे. बताया गया कि कर्मफल की आकांक्षा किये बिना कर्म करता रह. कर्म का अर्थ है, पूर्व-जन्म में किये गए कार्य।

गोलवरकर ने 'महाराष्ट्र टाइम्स'  में कहा,'जाति-प्रथा दैवीय-रचना है, इसलिए ईश्वर-प्रदत्त है'. तब सवाल 

इस देश में आतंकवाद यहाँ के मासूम मुसलमानों की वजह से नहीं गश्त कर रहा है. जहाँ से इसके परनाले गिर रहे हैं, भावी प्रधान मंत्री पद के दावेदार 'नरेंद्र मोदी' को  पहले उन छतों की मुंडेरों को सही करना होगा, क्योंकि वह उन छतों की  गांठों वाली घास से ढके सूराखों और कच्ची मिटटी की  फिसलन भरी ढलानों को भलीभांति पहचानते हैं।

उठा कि नरेंद्र मोदी अपने भाषण में अपनी सरीखी जातियों, वर्गों और पिछड़ी जातियों के साथ होते रहने वाले शोषण और अन्याय का रोना क्यों रोते फिर रहे है?  क्यों वह गोलवरकर के उस वक्तव्य को दलितों के सामने नहीं लाना चाहते जिसमें उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के उस प्रस्ताव का विरोध किया था, (इंडियन एक्सप्रेस,२ जनवरी १९७३)  जिसमें उन्होंने दलितों, गिरिजनों और आदिवासियों को १० वर्षों के लिए कुछ विशेष सहूलियतें दिए जाने  की  बात कही थी. 

वह यह भी भूल गए कि बिहार जनसंघ के तत्कालीन उपाध्यक्ष (पैट्रियाट,९ अगस्त,१९७० के अनुसार) ठाकुर प्रसाद ने भूपतियों से आह्वान किया था कि दलित और पिछड़े वर्गों के भूमिहीनों के आंदोलन का वे सशस्त्र विरोध करे.
बीजेपी के घोषित प्रधानमंत्री पद के दावेदार भाई नरेंद्र मोदी जब आरएसएस के चाल, चरित्र और समय आने पर बहुरूपी चेहरे को छुपाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं तो उनकी अहंकारी मुस्कान, भाव-भंगिमा और नेत्रों में उमड़ती नफरत किसी से भी छुपती नज़र नहीं आती है. ऐसी ही उलझी और रहस्यमयी विशेषता लालकृष्ण अडवाणी में भी है जिसका नतीजा यह है कि वह देश के प्रधानमंत्री नहीं बन पाये।

प्रधानमंत्री तो भाई नरेंद्र मोदी भी नहीं बन पाएंगे क्योंकि आरएसएस का सुप्रीमो राज सिंहासन पर उसे ही बिठाएगा जो सवर्ण हो और जो संघ के हितों की रक्षा करने में सक्षम हो.  उनके लिए यह भी जानना ज़रूरी होगा कि आरएसएस फ़िलहाल उनकी क्षमताओं का इस्तेमाल कर रही है. राजनीति के विद्वान जानते है कि समय आने पर आरएसएस अपने-पत्ते खोलकर देश को आश्चर्य-चकित कर देगा। श्यामाप्रसाद मुकर्जी का अतीत हमारे सामने है.

भाई नरेंद्र मोदी के पास इस देश के २० करोड़ मुस्लमान हैं. मुसलमानों को नज़रअंदाज़ कर सियासी-ताकत वह नहीं जुटा पाएंगे। उन्हें सार्वजनिक रूप से बिना छल के इस समुदाय को बताना होगा कि पिछले १० सालों से गुजरात में दंगे नहीं हुए हैं और वहाँ की तरक्की में मुसलमानों की उपेक्षा नहीं की गई है. उन्हें जानना और मानना होगा कि इस देश में आतंकवाद यहाँ के मासूम मुसलमानों की वजह से नहीं गश्त कर रहा है. जहाँ से इसके परनाले गिर रहे हैं, उन्हें पहले उन छतों की मुंडेरों को सही करना होगा क्योंकि वह उन छतों को पहचानते हैं। मुस्लमान इस देश की आज़ादी और अस्मिता के लिए मर सकता है, इसे नुकसान नहीं पहुँच सकता। जो अतिवादी हैं और जिन्हे वहाबियत के प्रसार के लिए विदेशों से पैसा मिलता है, उन्हें रोका जा सकता है लेकिन मुस्लिम-दुश्मनी के रूप में नहीं, अतिवादी संगठनों द्वारा फैलाये जाने वाले आतंकवाद की कमर तोड़ने के उद्देश्य से.
   
मैं जनता हूँ कि भारतीय मुस्लमान कहीं तक दिल के साफ़ होते हैं, शिया-सुन्नी अपने धार्मिक मतभेदों के बावजूद परस्पर शादियाँ कर लेते हैं. पडोसी देश कि तरह मलालाओं पर गोलियां नहीं बरसाते है और न ही मस्जिदों में पढ़ते नमाज़ियों पर मशीन-गनें चलाते हैं. भारत इस वातावरण में भी अपने दुश्मन को माफ़ करना जानता है. अपने जवानों को क़ुर्बान करके भी सरहद की तरफ मुहब्बत की उम्मीद से देखता है.

इस देश के ज़ख़्मी मुस्लिम समुदाय से माफ़ी मांगने पर भाई नरेंद्र मोदी को वे माफ़ कर देंगे। इसमें अहंकार
डॉ. रंजन ज़ैदी -लेखक 
की गुंजाईश नहीं रहनी चाहिए। ऐसा करने पर इस देश का मुस्लमान उनके लिए अपनी जान तक देने में पीछे नहीं हटेगा। लेकिन पहले उसे विश्वास में लेना ज़रूरी होगा।

इन सबके बावजूद राजनीति का यह तमाशा मेरे लिए दिलचस्प है. 
अभी तो राजनीति की शुरूआत है. अभी तो भावी इतिहास का रचयिता यही कह सकता है कि भाई नरेंद्र मोदी! 
'हुनूज़ दिल्ली दूरस्त।' 
   
संपर्क : http://ranjanzaidi@yahoo.co.in/  alpsankhyaktimes94gzb.com Mob.: +91 9350 934 635
 

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